भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 9
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मल्हारराव बातें करते करते पल भर के लिए रुक गये। उनका गला भर आया था और आँखें नम हुई थीं। वहाँ पर उपस्थित सभी की लगभग वही स्थिति हुई थी। उसी कमरे में स्थित, मल्हारराव की बायीं तरफ वाले कोने में बैठी तीनों महिलाओं की स्थिति तो बहुत ही अलग थी।
पहिली महिला थी, इक्कीसवाँ साल पूरा होकर बाईसवें साल में पदार्पण कर चुकी जानकीबाई - ‘आद्य हुतात्मा मंगल पांडे भी बाईस वर्ष के ही थे। मैं भी बाईस साल की ही हूँ। कितना सुंदर लग रहा होगा ना, जब बंदूक की गोली सीने में जा रही होगी। भगवान! मेरे साथ भी ऐसा ही होने दीजिए।’
दूसरी महिला थी, फडके मास्टर की पत्नी कमलाबाई। ये प्रौढ़ा एवं अनुभवी महिला ‘वह क्या क्या कर सकती है’ यह विचार ही कर रही थीं, मग़र दिमाग को शांत रखकर ही।
तीसरी महिला, गोविंददाजी की बेटी श्रीमती मंजुळाबाई थी। उसका ससुराल भी गाँव में ही था। उसका एक साल का एक छोटा बच्चा था और वह उसकी गोद में ही सोया हुआ था। उसकी उम्र भी बाईस वर्ष ही थी। वह पहले से ही गोविंददाजी के मार्गदर्शन में उनकी सभी योजनाओं में पिछले तीन वर्षों से सहायता कर रही थी। वह जानकीबाई की घनिष्ठ सहेली थी। उसका पति ‘वासुदेव गोविंद’ यह रामचंद्र धारपुरकर का उतना ही खास दोस्त था और मुंबई से धारपुर के बीच का मानवीय ब्रिज (पूल) था। मंजुळाबाई के बेटे का नाम ‘मंगलप्रसाद’ यही था - बिलकुल जान-बूझकर रखा गया। उसे ऐसा ही लगता था कि मंगल पांडे ने ही उसकी कोख से जन्म लिया है।
कुछ पाँच मिनट बाद माहौल थोड़ा हल्का हो गया। संपतराव ने थोड़ा घबराकर ही प्रश्न पूछा, “मल्हारराव! मंगल दिवाकर पांडे ने बलिदान किया, यह श्रेष्ठ ही बात है। लेकिन आप उसे ‘पहला बलिदान’ क्यों कह रहे हैं? उन नंदकुमार को भी फाँसी दी गयी थी ना?”
मल्हारराव ने कहा, “नंदकुमार को ब्रिटीश अफसर ने कपटवृत्ति अपनाकर फाँसी पर चढ़ाया था, यह निश्चित है। लेकिन वह कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं था। वह ब्रिटिशों के लिए भारतीय जनता से टॅक्स इकट्ठा करने का काम करता था और उसमें से कुछ हिस्सा भी वह भ्रष्ट ब्रिटीश अफसरों को उनकी मौजमस्ती के लिए देता था। ऐसे ही एक बार प्रसंगवश यानी वास्तव में पैसों की कमी होने के कारण नंदकुमार ने, इकट्ठा हुए टॅक्स में से कुछ हिस्सा अपने ही पास रखना शुरू किया और उसके लिए उसे फाँसी पर चढ़ाया गया।
यह स्वतंत्रता-संग्राम में किया गया बलिदान नहीं था। परन्तु ब्रिटिशों के हिंसक और खूँख़ार ज़ुल्मशाही का उदाहरण था। मग़र थोड़े से पैसों के लिए फाँसी पर चढ़ाना और वह भी ७० वर्ष के बुज़ुर्ग को, यह निश्चित रूप से अन्याय की बात थी, लेकिन बलिदान की नहीं थी।”
संपतराव ने ही फिर से एक प्रश्न पूछा, “मंगल पांडे ने जिस स्थान पर बलिदान किया, उस स्थान पर (उनकी स्मृति के रूप में) क्या एकाद साधारण पत्थर तक रखा गया है?”
मल्हारराव ने भगवान को प्रणाम करते हुए कहा, “मंगल दिवाकर पांडे के बलिदान के केवल एक महीने बाद, उनके एक खास दोस्त ने, ‘धनसिंह गुर्जर’ ने उस स्थान पर एक विशिष्ट आकार का पत्थर ज़मीन में गाड़ कर, उसके पास एक तुलसी का पौधा लगाया। (आगे चलकर स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इसी स्थान पर मंगल पांडे का स्मारक बनाया गया है।)

धनसिंह गुर्जर मेरठ स्थित ब्रिटीश छावनी में कोतवाल के ओहदे पर थे। उनके अधिकार में ५० सैनिक थे। मंगल पांडे ने धनसिंह के साथ मृत्यु से पहले लगातार तीन दिन चर्चा की थी। परन्तु धनसिंह गुर्जर को लेफ्टनंट बॉघ ने तुरंत लौटने की आज्ञा दी थी, इस कारण उन्हें लौटना पड़ा था।
धनसिंह गुर्जर के पास उस समय, उनके साथ केवल एक ही सैनिक था और इस कारण वे शांत रहे। लेकिन मेरठ छावनी में पहुँचने के बाद कुछ ही घंटों में उन्हें ‘बरॅक पोर में मंगल पांडे ने क्या किया’ यह समाचार मिला और मन ही मन गुस्से से खौल उठे कोतवाल धनसिंह गुर्जर ज़ोर-शोर से काम में जुट गये। उन्होंने एक-एक मनुष्य को इकट्ठा करना शुरू किया और स्वयं के पचास सैनिक और अन्य सैन्य-टुकड़ियों के पचास सैनिक ऐसी सौ जनों की छोटी सी सेना बनायी। ९ अप्रैल १८५७ के दिन मेरठ की छावनी में, मंगल पांडे को फाँसी दिये जाने का समाचार आ पहुँचा। छावनी में होनेवाला लगभग हर एक सैनिक क्रुद्ध हुआ था। लेकिन क्या फायदा? उन दो हज़ार सैनिकों में से केवल चालीस सैनिकों ने धनसिंह के गुट में शामिल होने का साहस दिखाया। बाकी के चुप ही रहे।
धनसिंह गुर्जर के एक सौ चालीस सैनिकों को अपने पास रहनेवाले कारतूस देने की हिम्मत भी बाकी के सैनिकों में से केवल तीस-चालीस जनों के ही पास थी। परन्तु धनसिंह गुर्जर की तेज:पुंज वाणी धीरे धीरे औरों पर असर करने लगी और फिर बाद में काफी कारतूस इकट्ठा होने लगे और उनके सैनिकों की संख्या भी २५० तक जा पहुँची। २१ अप्रैल के दिन ईश्वरीप्रसाद को भी फाँसी दी गयी, यह समाचार मिलने के बाद तो अधिक से अधिक सैनिक इनमें शामिल होने लगे और स्वतंत्रता-संग्राम की आग आसपास की अन्य सात छावनियों में भी फैल गयी।
आपस में समाचारों और संदेशों का आदान-प्रदान होने लगा। हर एक छावनी और थाने को उसका अपना लक्ष्य तय करके दिया गया
और १० मई १८५७ के दिन कोतवाल धनसिंह गुर्जर के नेतृत्व में मेरठ छावनी में स्थित उस थाने पर ज़ोरदार हमला किया गया, जिसमें ब्रिटीश अफसर थे।
धनसिंह की ओजस्वी वाणी से और प्रचंड लगन के कारण लगभग ६०० सैनिक अलग अलग थानों से तुरंत मेरठ पहुँचे थे और वह भी शस्त्रों के साथ।
पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, आग्रा, देहरादून, बिजनौर, पंजाब, राजस्थान, झांसी और महाराष्ट्र से क्रांतिकारी विचारों से भारित आम नागरिक कत्ता, खुरपा (हँसिया), आरी, हथौड़ा, कुल्हाड़ी, लाठी ऐसे शस्त्र लेकर मेरठ आ पहुँचे थे और स्वतंत्रता-संग्राम में शामिल हुए थे।
मेरठ के आसपास के गाँवों के अक्षरश: गुर्जर जाति के हज़ारों गाँववाले, जो उपलब्ध हो, वह शस्त्र लेकर वहाँ इकट्ठा हुए थे।
१० मई की रात ९ बजे धनसिंह और उनकी एक टुकड़ी ने मेरठ छावनी में स्थित ब्रिटीश अफसरों की इमारत पर आक्रमण किया और उन सभी को बंदी बनाया। रात दो बजे मेरठ में स्थित मुख्य जेल को तोड़कर ८७६ कैदियों को छुड़ाया गया और अपने में शामिल किया। उसके बाद जेल को आग लगायी गयी।
सुबह तक बाईस ब्रिटीश अफसर मौत के घाट उतारे जा चुके थे, ८० ब्रिटीश सोल्जर्स मारे जा चुके थे और लगभग उतने ही धनसिंह की क़ैद में थे।
‘शहीद मंगल पांडे अमर रहें’ यह घोषणा देते हुए साधारण शस्त्र धारण करनेवाले, देशभर से आये हुए हज़ारों भारतीय नागरिकों ने मेरठ में स्थित, ब्रिटिशों से संबंधित रहनेवाली हर एक इमारत, कागज़ात, पुलीस थाना और इस तरह की कई बातें अक्षरश: जलाकर राख कर दी थी।
उसके बाद उनमें से आधे सैनिक और आधे नागरिक १२ मई के दिन दिल्ली तक जा पहुँचे और विद्रोह मेरठ के आसपास के गाँवों में भी फैल गया।
ब्रिटीश कंपनी सरकार ने ज़ोरदार जवाबी हमले करना शुरू किया। ब्रिटिशों के पास सेना का बल भी बड़ा था और शस्त्र-अस्त्र तो विपुल मात्रा में ही थे और ज़्यादा असरदार भी थे।
‘यह विद्रोह की आग दिल्ली में भी फैल रही है` यह देखकर और उत्तरप्रदेश, पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र और पटना में भी ऐसी ही घटनाएँ हो रही हैं, यह देखकर ब्रिटीश कंपनी सरकार भी भड़क गयी। उसे अपने शासन का अंत होने का खतरा मँडराता दिखायी देने लगा।

कुछ ही स्थानों पर ब्रिटीशों की जीत हो रही थी। लेकिन अधिकांश स्थानों पर स्वतंत्रता-सेनानी जीत रहे थे। हर एक स्वतंत्रता-सेनानी तीन ही घोषणाएँ दे रहा था। ‘१) फिरंगी को मार डालो। २) शहीद मंगल पांडे अमर रहें। और ३) क्रांतिसूर्य धनसिंह गुर्जर की जय हो।’ तीन महीनों तक ये संघर्ष चल ही रहे थे और ब्रिटिशों को काफी मार खानी पड़ रही थी।
अंतत: ब्रिटिशों ने कपटनीति अपनाकर, धनसिंह उस समय जहाँ थे, मेरठ के पास के उस गाँव (पानस्ली अथवा गगोल) पर दस बड़े तोपों से अत्यधिक क्रूर हमला किया और ५०० घुड़सवार सिपाही गाँव में घुसकर सबका क़त्ल करने लगे। अक्षरश: हज़ारों पुरुष और महिलाओं का क़त्ल किया गया और बचे हुओं को फाँसी दी गयी और वह भी हर एक चौक में।
धनसिंह गुर्जर कोतवाल यहीं पर वीरगति को प्राप्त हुए और वह भी करीब करीब सौ ब्रिटीश सैनिकों को मौत के घाट उतारकर ही।
धनसिंह गुर्जर को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का मज़बूत समर्थन होने के सबूत इसी गाँव में ब्रिटिशों के हाथ लगे और एक रात में गरीब स्वभाव की, असहाय, अकेली बेवा रानी लक्ष्मीबाई ब्रिटिशों को उनके लिए बहुत ही बड़ा खतरा महसूस होने लगी।”

(कथा जारी है)
