भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 8

संपतराव ने ऊँगली उठाते हुए प्रश्न पूछा, “मंगल दिवाकर पांडे इस एक सामान्य सैनिक ने ऐसा क्या घटित करवाया? उसने कुछ पूर्वतैयारी की थी या उतावलेपन या व्यर्थ उत्साह के जोश में वह कुछ कर बैठा? हमने ऐसा ही कुछ सुना है!”

मल्हारराव ने ज़ोर देकर और साफ साफ शब्दों में कहा, “मंगल पांडे के बारे में ब्रिटिशों ने ब्रिटीश-परस्त समाचारपत्रों (न्यूज़ पेपर्स) का और सरकारी नौकरों का तथा व्यापारियों का और ख़बरियों का उपयोग कर ऐसी ही ख़बर आगे फैलायी कि ‌‘मंगल पांडे ने भांग पी रखी थी और वह हमेशा अफीम (ओपियम) लेता था और उस नशे में ही उसने अत्यधिक गैरज़िम्मेदाराना बर्ताव किया। उसके पीछे कोई भी भारत से जुड़ा मूल्य नहीं था।‌’  

परन्तु यह सब सरासर और पूरी तरह झूठ है। फडके मास्टर के पिताजी अनंतराव फडके ये भी मंगल पांडे की ही बटालियन में थे और हमारे फकीरबाबा के मामा भी। इस कारण हमारे पास अचूक जानकारी है और वह भी वहाँ उपस्थित होनेवाले लोगों से ही प्राप्त हुई जानकारी। 

सभी लोग ध्यान से सुने। 29 मार्च 1857 के दिन मंगल पांडे ने लड़ाई आरंभ की और हमला भी किया, यह बात सच है। लेकिन वह उनके द्वारा किसी नशे में किया गया कृत्य नहीं था। वे अफीम, गांजा, भांग और शराब तो क्या, यहाँ तक कि बीडी भी नहीं पीते थे। उन्हें सुपारी तक की लत नहीं थी। साधारणत: फरवरी 57 के आख़िरी हफ्ते में ही ‌‘उन‌’ बंदूकों और ‌‘उन‌’ कारतूसों की उनकी छावनी में आपूर्ति की गयी। लेकिन सैनिकों से सच छिपाया गया था। 

मंगल दिवाकर पांडे ये हर रोज़ भोर के समय उठकर 108 बार गायत्री मंत्र का जाप करनेवाले और उसके पश्चात्‌‍ महादेव की आराधना करनेवाले धार्मिक और सत्‌-शील युवक थे। उन्हें अँग्रेज़ी भाषा काफी अच्छे से समझ में आती थी। ‌‘ईश्वरीप्रसाद‌’ नामक उस सेना में रहनेवाले जमादार अँग्रेज़ी भाषा में निपुण थे। उनके साथ रहकर मंगल पांडे ने अँग्रेज़ी सीखी थी। उसी तरह बुरद्वान, नादिया और हुगली विभाग के, जिस ‌‘नंदकुमार‌’ नामक भारतीय बंगाली वंश के दीवान (टॅक्स कलेक्टर) को ब्रिटिशों ने सन 1775 में फाँसी दी थी, बदला लेने की भावना से सुलग रहे उनके पोते, अपना नाम और गाँव का नाम बदलकर ‌‘नवीनचंद्र मुखोपाध्याय‌’ इस नाम से ब्रिटीश गव्हर्न्मेंट की फौज से जुड़ी नौकरी में शामिल हुए थे और वे अँग्रेज़ी भाषा में अत्यधिक निपुण थे। लेकिन उन्होंने अपना कोई भी राज़ कभी भी खुलने नहीं दिया था। उनके बेटे, मंगल दिवाकर पांडे के खास दोस्त बन गये थे। मंगल पांडे अपने इस दोस्त के साथ हमेशा बातें करते रहते थे और उसमें ब्रिटिशों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों के बारे में गुस्सा ज़ाहिर करते थे और वह भी, ‘कुछ करना चाहिए‌’ इस ज़िद के साथ ही। इस कारण नवीनचंद्र मुखोपाध्याय ने मंगल पांडे को एक महीने में अँग्रेज़ी भाषा बोलने-समझने में अच्छे से तैयार किया था और इस बारे में किसी को भी कोई भी जानकारी नहीं थी - ज़ाहिर है कि मंगल पांडे के भरोसेमंद दोस्तों को छोड़कर अन्य किसी को भी। 

एक दिन भोर के समय उठकर जाप करने से पहले स्नान करने कुएँ के यहाँ गये मंगल पांडे को, दो ब्रिटीश अफसरों के संभाषण का एक हिस्सा सुनायी दिया। गाय की चरबी (Cow Fat और बीफ) और सूअर की चरबी (पिग फॅट, पोर्क) ये शब्द सुनायी देने के कारण मंगल पांडे ने चोरी-छिपे पूरा संभाषण सुन लिया और उन्हें ब्रिटिशों के षड्यंत्र का अंदाज़ा आ गया कि इन्हें हिंदू और मुसलमान इन दोनों को भी धर्मभ्रष्ट करना है, क्योंकि हिंदू कभी गोमांस नहीं खायेंगे और सच्चा मुसलमान कभी सूअर की चरबी नहीं खायेगा। 

वहीं से मंगल पांडे के विचारों का चक्र तेज़ी से शुरू हो गया। उन्होंने भोर के समय ही यह समाचार जमादार ‌‘ईश्वरीप्रसाद‌’ और अपने सहकर्मियों को दिया। वे आपस में मिलकर सुव्यवस्थित रूप से योजना बनाने लगे। विभिन्न स्थानों पर स्थित हिंदू सैनिक दोस्तों को इस योजना में शामिल किया जाने लगा। मेरठ की छावनी का हर एक भारतीय सैनिक तो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार था।  

1 अप्रैल 1857 से नये कारतूसों का इस्तेमाल करना अनिवार्य होनेवाला था और इस कारण 28 मार्च की रात तय की गयी। सभी जन एक पल के लिए भी न सोते हुए पूरी रात जाग रहे थे। लेकिन रात भर ब्रिटीश अफसर ‌‘लेफ्टनंट बॉघ‌’ (Baugh) अपने कुछ ब्रिटीश सहकर्मियों के साथ इस पूरी बरॅक पोर (Barrack Pore) छावनी में गश्त लगाते हुए घूम रहा था और उसके साथ बाहर से आये हुए कुछ भारतीय ज़मीनदार थे, ठाकुर थे और काशी जा रहे यात्रीगण भी थे। इस कारण मंगल पांडे ने सब्र रखने का तय किया। लेकिन इन सब लोगों के धीरे धीरे वहाँ से चले जाने के बाद अपने साथ भरी हुई बंदूक (पुरानी) और काफ़ी सारा गोला-बारूद लेकर लेफ्टनंट बॉघ की छावनी पर हमला करने के लिए मंगल पांडे अपने तंबू से बाहर निकले। 

उनकी योजना में शामिल हुए सहकर्मियों के लिए ‌‘संकेत‌’ के तौर पर अस्थायी रूप से लगाया गया लाल रंग के कपड़े का छोटा टुकड़ा एक डरपोक, बुज़दिल सहकर्मी ने तुरंत छिपा दिया और अकेले मंगल पांडे ही लेफ्टनंट बॉघ के निवासस्थान पर जाकर खड़े हो गये और वहाँ से बाहर निकले लेफ्टनंट पर उन्होंने पहली बार गोलियाँ बरसायी। स्वतंत्रता-संग्राम की पहली गोली चलायी गयी यहाँ। लेकिन गद्दारों ने अपना काम किया था, इस कारण लेफ्टनंट बॉघ तैयार ही था। वह तुरंत ही घोड़े पर सवार हो गया और भागने लगा। लेकिन मंगल पांडे ने चलायी दो गोलियाँ लेफ्टनंट के घोड़े के शरीर में घुस गयी और घोड़ा लेफ्टनंट बॉघ को लेकर ही नीचे गिर गया। इसके साथ ही मंगल पांडे तलवार लेकर बॉघ की तरफ दौड़े और उस पर तलवार से सात वार किये। लेकिन ‌‘शेख पलटू‌’ नाम के लेफ्टनंट के खास सिपाही ने मंगल पांडे को पीछे खींचकर गिरा दिया 
और मंगल पांडे की योजना का पता चल चुका ब्रिटीश सार्जंट-मेजर (Sergeant-Major) ह्यूसन (Hewson) वहाँ आ पहुँचा। हार हो रही देखकर ह्यूसन आगबबूला हो गया और उसने जमादार ईश्वरीप्रसाद को मंगल पांडे पर हमला करने की आज्ञा दी। परन्तु ईश्वरीप्रसाद ने उसकी आज्ञा अस्वीकार कर, मंगल पांडे की सहायता करना शुरू किया। ह्यूसन की सहायता करने शेख पलटू दौड़ा आया। वह अन्य सिपाहियों से मदद करने के लिए कहने लगा। लेकिन मंगल पांडे के एकनिष्ठ सहकर्मियों ने उल्टे पत्थरों और चपलों की बौछार की। 

मंगल पांडे और उनके सहकर्मियों ने वह लड़ाई लगभग जीत ही ली थी। मंगल पांडे ऊँची आवाज़ में घोषणाएँ दे रहे थे, 

१) मारो फिरंगी को। (विदेशियों को मार डालो)

२) तुमने हमारे काले रंग की ईमानदारी देखी है, इसके बाद हमारा गुस्सा देखो। (You have tested a black man’s loyalty - now test his fury.)

३) इन कारतूसों को दाँतों से तोड़कर हम सभी धर्मभ्रष्ट हो जायेंगे। पहले ही सावधान हो जाओ!  (By biting these cartridges, we shall become infidels, awake!)

४) मैं हिंदुस्थानी हूँ और मैं ही हिंदुस्थान हूँ। (I am true Indian and I am Hindustan myself.)

उतने में मेजर जनरल जॉन बेनेट हरसे (Hearsey) वहाँ आ पहुँचा। वह साथ में बहुत बड़ा लावलश्कर ले आया था। जनरल ने आज्ञा न माननेवाले हर एक भारतीय सैनिक पर गोलियाँ चलाने की धमकी दी। इस कारण कुछ भी जानकारी न होनेवाले, उसके साथ आये हुए सैनिक आगे बढ़े। जो हाथ लगा उस हथियार से वे आपस में भिड़ गये। सभी तरफ रक्तपात (खूनखराबा) दिखायी देने लगा।  

लेकिन वह कोई आम भिडंत नहीं थी। वह स्वतंत्रता का पहला संग्राम था। ब्रिटिशों के साथ वफ़ादार रहे 600 सैनिक और मंगल पांडे के साथ होनेवाले चौबीस जन इनके बीच का सामना शाम होते होते खत्म हो गया। ईश्वरीप्रसाद ने मंगल पांडे की सूचना के अनुसार अन्य चौबीस सहकर्मियों को जंगल में भेज दिया। 

अंतत: शाम पाँच बजे मंगल पांडे और ईश्वरीप्रसाद को बंदी बनाया गया और खून से सने हुए पांडे फिर भी सीना तानकर चलते हुए ऊँची आवाज़ में घोषणाएँ देते ही रहे। मंगल पांडे को केवल दिखावे के लिए सेना के हॉस्पिटल में रखा गया और सात दिनों के कोर्टमार्शल का नाटक कर मंगल पांडे को 8 अप्रैल 1857 के दिन हज़ारों लोगों के सामने सूली पर चढ़ाया गया और ईश्वरीप्रसाद को 21 अप्रैल के दिन। 

मित्रों! हमारे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ये दो पहले बलिदान हैं। इनके नामोच्चारण के बिना स्वतंत्रता संग्राम की गाथा आरंभ हो ही नहीं सकती।”  

हुतात्मा मंगल पांडे का स्मारक

 


(कथा जारी है)