भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 10

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 10

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“ब्रिटिशों का गुप्तचर विभाग सतर्क हो गया और रानी लक्ष्मीबाई के झांसी राज्य में एक हफ़्ते में भारतीय वंश के 50 प्रशिक्षित गुप्तचर भेजे गये। उनके साथ बहुत सारी धन-दौलत दी गयी थी। 

झांसी की रियासत 30-40 साल पहले ही ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में आ चुकी थी। ब्रिटिशों के द्वारा नियुक्त किये गये स्पेशल ब्रिटिश अफसर की सम्मति से झांसी के राजा को हर एक कार्य करना पड़ता था। झांसी के राजा ‌‘गंगाधरराव‌’ की उम्र लगभग पचास के आसपास थी और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था। ऐसी स्थिति में उनका विवाह तांबे घराने की ‌‘मनकर्णिका‌’ नाम की लड़की के साथ हुआ। तब मनकर्णिका केवल 8-9 साल की थी। 14 साल की हो जाने के बाद उसे झांसी लाया गया। एक-दो साल के बाद उसे पूरी परिस्थिति का अंदाज़ा अच्छी तरह आने लगा। 

विवाह के बाद मनकर्णिका का नाम ‌‘लक्ष्मीबाई‌’ रखा गया था। रानी लक्ष्मीबाई बचपन में ही नानासाहब पेशवा और तात्या टोपे जैसे साथियों के साथ युद्ध के खेल खेलती थीं। उनकी खेल में रहनेवाली निपुणता देखकर उनके पिता ने ‌‘उन्हें पेशवा की सम्मति से नानासाहब के साथ युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त हो सके‌’ ऐसा प्रबंध किया था। 7 से लेकर 14 वर्ष तक यानी कुल मिलाकर सात वर्ष तक लक्ष्मीबाई युद्धकला और राजनीति के पाठ सीख रही थीं। तात्या टोपे और नानासाहब पेशवा दोनों भी लक्ष्मीबाई से भले ही उम्र में बड़े थे, लेकिन बाकी मामलों में उन्हें कम ही अनुभव था। लक्ष्मीबाई उन दोनों को राखी बाँधती थीं। 

झांसी से परिचित होने में दो साल लग गये। लेकिन उसके बाद रानी लक्ष्मीबाई मंदिरों में दर्शन करना, शहर की प्रमुख महिलाओं से मिलना, जनता (प्रजा) की शिकायतें सुनना ऐसे काम करते करते समाज के विभिन्न गुटों में घुल-मिलने लगीं। रानी ही होने के कारण उनके आदेश के अनुसार बिलकुल सरकारी अफसर से लेकर व्यापारियों तक हर एक को उनसे मिलने के लिए आना ही पड़ता था।

धीरे धीरे रानी लक्ष्मीबाई की समझ में आने लगा कि उनके पति विभिन्न व्याधियों से  ग्रस्त हैं और इसके बावजूद भी भारी कोशिशों के साथ राज्य का कार्य अच्छे से कर रहे हैं। लेकिन उनके पास होनेवाले अधिकार सीमित (लिमिटेड) हैं। उनका राज्य केवल नाम के लिए स्वतंत्र रियासत है। उनके पति को ब्रिटिश कंपनी सरकार ने सभी ओर से जकड़कर रखा है।

इस कारण राज्य में सर्वत्र घूमते हुए वे जनमानस का (प्रजा के मन का) अच्छी तरह अनुमान लगाने लगीं। उनकी समझ में आ गया कि राजा गंगाधरराव की फ़ौज के वे अधिकारी, जो ब्रिटिशों के अंकित हैं, ब्रिटिशों के साथ ही खड़े होनेवाले हैं और इन अधिकारियों के द्वारा गंगाधरराव की अथवा रानी की आज्ञा मानी जाना संभव ही नहीं है। इसी तरह ब्रिटिशों के विभिन्न व्यापारों में सम्मिलित रहनेवाले व्यापारी भी हमेशा ब्रिटिशों का ही साथ देनेवाले हैं।  

इस वास्तविकता का एहसास हो जाते ही रानी लक्ष्मीबाई ने, झांसी राज्य के किसान, गाँव में बढ़ईगिरी (कार्पेंन्टर का काम), कुम्हार का काम, लुहार का काम इस प्रकार से 12 तरह के काम करनेवाले बारह प्रकार के व्यावसायिक, खेत में काम करनेवाले मज़दूर, निर्माणकार्य करनेवाले मज़दूर ऐसे आम नागरिकों के साथ आम विषयों पर बातचीत करना शुरू किया। 

लोगों के साथ व्यवस्थित रूप से उनकी जान-पहचान बढ़ाने में उन्हें उनकी एक सेविका का बहुत उपयोग हुआ। उस सेविका का नाम था ‌‘झलकारीबाई‌’। उस समय मछुआरे माने जानेवाले समाज की उस महिला की क्षमता को रानी लक्ष्मीबाई ने अच्छी तरह भाँप लिया था। झलकारीबाई रानी लक्ष्मीबाई से उम्र में बड़ी थीं। लेकिन वे पढ़-लिख सकती थीं और रानी लक्ष्मीबाई के साथ युद्ध का अभ्यास करने का मौका मिलने के कारण झलकारीबाई को युद्धकला भी अच्छी तरह आने लगी थी। झांसी की सेना के एक ब्रिटिश सोल्जर को रिश्वत देकर रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारीबाई को झांसी के तोपखानें में सफाई करने का काम दिलवाया और उसकी आड़ में उस ब्रिटिश सार्जंट ने झलकारीबाई को तोंप चलाने का, तोंप के लिए आवश्यक होनेवाला गोला-बारूद और अन्य सामग्री इनके विषय में डेढ़ साल तक प्रशिक्षण दिया। कभी कभी स्वयं रानी लक्ष्मीबाई भी भेस बदलकर, झलकारीबाई की बहन बनकर उस विभाग में आती जाती थीं और उन्होंने भी तोंप चलाने में निपुणता प्राप्त की थी और बंदूक चलाने में भी। 

यह सब चल रहा था, तभी रानी लक्ष्मीबाई गर्भवती हुई और उन्हें विश्राम करने की सलाह दी गयी।  

इस गर्भावस्था (गर्भिणी अवस्था) की अवधि का फायदा उठाते हुए लक्ष्मीबाई विभिन्न प्रजाजनों को उनके घर की महिलाओं के साथ मिलने के लिए बुलाने लगीं और जनमानस का उन्हें अच्छी तरह अंदाज़ा आने लगा।  

एक दिन संभाषण के दौरान रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारीबाई से एकान्त में कहा, “हमारे राज्य का एक भी नागरिक सुखी नहीं है। सभी जाति के आम नागरिक और विशेष रूप से किसान और खेत में मज़दूरी करनेवाले, ब्रिटिशों द्वारा की जा रही दखलअंदाज़ी के कारण अक्षरश: पीसे जा रहे हैं। कुछ करना चाहिए। हम दोनों मिलकर राज्य की बुद्धिमान साहसी महिलाओं का एक संगठन स्थापित करते हैं। ‌‘महिलाएँ ऐसा कुछ काम करेंगीं‌’ ऐसा शक भी ब्रिटिश अफसरों को नहीं होगा।” इसके साथ तुरंत ही झलकारीबाई काम में जुट गयीं और ‌‘दुर्गादल‌’ की स्थापना हुई। ‌‘मोतीबाई‌’ नामक एक महिला युद्धकला और गुप्तचर शास्त्र में निपुण बन गयीं और ‌‘मुंदरबेगम` नाम की महिला कुश्ती सीख गयीं और रानी लक्ष्मीबाई की अंगरक्षक (बॉडीगार्ड) बन गयीं। 

साथ ही दीवान रघुनाथसिंग, लालाभाऊ बक्षी ये झांसी की सेना के उपसेनापति भी रानी के कार्य में सहयोग करने लगे। ‌‘खुदाबक्ष बशरत अली‌’ नाम का फौज का अन्य अधिकारी अपनी पत्नी के साथ इस कार्य में सम्मिलित होने लगा। उसी तरह कमलकुमारी चौहान, राजकुंवर यादव जैसी मध्यम वर्ग की महिलाओं की रानी लक्ष्मीबाई से बार बार मुलाक़ातें होने लगीं। 

उचित समय पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन बहुत ही छोटी उम्र में उसका देहान्त हो गया। उस दुख से बाहर निकलते समय रानी लक्ष्मीबाई को मोतीबाई, झलकारीबाई और मुंदरबेगम से बहुत ही सहायता प्राप्त हुई।

रानी लक्ष्मीबाई एक दिन अकेली ही रोते हुए अपने महल में बैठी थीं, तब उन्हें दूर पर एक विभाग में ब्रिटिश सार्जंट ऑफिसर झांसी के दस-बारह प्रजाजनों को बेरहमी से मार-पीट कर रहा दिखायी दिया। रानी ने जानकारी प्राप्त करने के लिए मोतीबाई को भेजा। मोतीबाई उस विभाग में रहनेवाली एक झोपड़ी की आड़ में छिपकर रानी लक्ष्मीबाई को जानकारी देने लगीं और यह जानकारी रानी तक पहुँचाने का काम यानी दूत का काम करने के लिए मुंदरबेगम और राजकुंवरबाई को नियुक्त किया गया  

और दुख के कारण रानी लक्ष्मीबाई ने बिलकुल सामान्य वस्त्र पहने हुए थे। उनके शरीर पर एक भी गहना नहीं था। नाक में नथ (नाक में पहने जानेवाली बाली) भी नहीं थी। राजकुंवरबाई ने तेज़ी से रानी के महल में प्रवेश किया। उन्हें ‌‘झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के महल में झलकारीबाई बैठी हैं‌’, ऐसा ही लगा। उन्होंने झट् से कहा, “बहन झलकारी, रानी लक्ष्मीबाई हमारे साथ सम्मान से पेश आती हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम रानी के आसन पर बैठ जाओ।” उसके पीछे पीछे आयी हुई मुंदरबेगम को भी ऐसा ही लगा  

और पहली ही बार उन तीनों की भी समझ में आ गया कि सामान्य भेस में रहनेवाली लक्ष्मीबाई और झलकारीबाई इनमें काफ़ी कुछ समानता है। 

वह ब्रिटिश अफसर छोटी सी ग़लती के लिए और लगान वसूल करने के लिए उन दस-बारह जनों को बहुत मार-पीट कर रहा था, बिलकुल अमानुष तरीके से। 

उस मार-पीट में, बाप की गोद में बैठे छोटे बच्चे की मृत्यु हो गयी थी।

यह समाचार मिल जाते ही रानी लक्ष्मीबाई अपने पुत्रशोक को तुरंत भूल गयीं और उन्होंने तेज़ी से दुर्गादल का कार्य पुनश्च आरंभ किया। झलकारीबाई के पति ‌‘पुरनसिंग कोरी (कोळी)‌’ ये झांसी की सेना के एक छोटे से अफसर थे। इन्होंने झलकारीबाई और अन्य महिलाओं को रानी के गाँव के बाहर रहनेवाले महल में युद्धकला सिखाना शुरू किया। बीमार राजा गंगाधरराव से कहकर पुरनसिंग कोरी की नियुक्ति रानी ने उनकी सेना में ‌‘नाईक‌’ इस पद पर की और वह भी तोपखाने में।

धीरे धीरे दुर्गादल की महिलाओं की संख्या बढ़ती गयी और दीवान रघुनाथसिंग के मार्गदर्शन में किसान और मज़दूर वर्ग तैयार होने लगा। 

ईसवीसन 1856 की विजयादशमी (दशहरा) तक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पास दुर्गादल की दो हज़ार महिला सैनिक और रघुनाथसिंग दीवान के साथ काम करनेवाले ‌‘महादेवशिव‌’ संगठन के सैनिक तैयार हो गये।” 

(कथा जारी है)