भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 7

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 7

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मल्हारराव इन सभी लोगों को लेकर विठ्ठल मंदिर के जिस गुप्त कमरे में गये थे, वह कमरा बहुत ही बड़ा था। उसमें लगभग दो सौ जन बैठे हुए थे और वह भी बिना किसी भीड़-भाड़ के। मुख्य बात यह थी कि शिव मंदिर और विठ्ठल मंदिर में इस प्रकार के कार्यों के लिए उपयोग में लाये जाने वाले कमरे ध्वनि-बंद (Soundproof) पद्धति से बनाये गये थे। इस कारण वहाँ का एक शब्द भी, यहाँ तक कि दीवार से कान लगाकर बैठे व्यक्ति को भी, कभी भी पता नहीं चल सकता था। मुख्य बात यह है कि इन कमरों तक पहुँचना ही, हमेशा वहाँ आने-जाने वाले व्यक्ति के लिए भी बहुत कठिन था।

मल्हारराव ने उनसे पूछे गये प्रश्न का उत्तर देने का वचन उन सभी को दिया। उन दो सौ लोगों में 18 से 40 वर्ष की आयु के लगभग सौ-सवा सौ लोग थे। बाकी के लोगों में 40 से 75 वर्ष की आयु-वर्ग के (एज-ग्रुप के), विभिन्न जातियों के विचारशील, समझदार और देशभक्ति की भावना से भरे हुए लोग थे। 

गुप्त सीढ़ी से फडके मास्टर और फकीरबाबा के वहाँ पहुँच जाते ही, मल्हारराव ने बोलना शुरू किया, “सब कुछ बताता हूँ। यह हमारी मातृभूमि का गौरवशाली इतिहास है। लेकिन मैं बेवजह बहुत गहराई में नहीं जाऊँगा। हमारे कार्य के लिए जितना आवश्यक है, उतना निश्चित रूप से बताऊँगा। 

मुख्य बात यह है कि हम इस स्वतंत्रता-संग्राम के नेताओं का इतिहास तो देखेंगे ही। लेकिन फकीरबाबा और फडके मास्टर आपको यह भी बतायेंगे कि ‌‘पिछले 65 वर्षों में सामान्य जनों ने किस तरह विभिन्न प्रकारों से स्वतंत्रता-संग्राम में अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभायीं‌’; क्योंकि आप जैसे सामान्य सैनिकों को और अधिक बल प्राप्त होने के लिए इन सामान्य नागरिकों के कार्यों को समझना अधिक आवश्यक है।” 

हमारे भारतीय नागरिकों में अर्थात्‌‍ सामान्य जनसमूह में ब्रिटिशों ने यह गलतफ़हमी (भ्रम) फैला दी है कि  १)ब्रिटिशों की सत्ता यहाँ से हटना संभव ही नहीं है।  २)ब्रिटिशों का विरोध करने पर मृत्यु को ही गले लगाना पड़ेगा या ‌‘काला पानी‌’ जैसी भयानक सज़ाओं का सामना करना पड़ेगा और ये सज़ाएँ मौत से भी ज़्यादा भयंकर होती हैं। ३) जिन्हें सज़ा हुई है ऐसे स्वतंत्रता-सेनानियों की पत्नी और बच्चों की तरफ इस संग्राम के भारतीय नेतागण ज़रा भी ध्यान नहीं देते और उनका आगे चलकर बहुत बुरा हाल होता है। ४) ब्रिटिशों के कारण ही भारत में सुधार हुए हैं, नहीं तो भारत जंगली ही रह जाता। 

इस बात में थोड़ी-सी सच्चाई है। भारत में रानी का शासन प्रस्थापित होने से पहले ही ब्रिटिश ही भारत में रेलवे यानी रेलगाड़ी (ट्रेन) ले आये। ईसवीसन 1853 में ही मुंबई में बोरीबंदर से ठाणे तक पहली रेलगाड़ी दौड़ी और फिर सब जगह फैल गयी।

ब्रिटिशों ने ही डाक विभाग (पोस्ट डिपार्टमेंट) शुरू किया और इस कारण यात्रा की बहुत बड़ी सुविधाएँ हुईं और दूर रहने वाले रिश्तेदारों से आसानी से संपर्क साधा जा सका।

ब्रिटिशों ने ही पक्की सड़कें बनवाईं, मोटरगाड़ियाँ और बसगाड़ियाँ ले आये और मुंबई-पुणे जैसे शहरों में तो बिजली से चलने वाली लाइटें भी आयीं।

पानी लाने के लिए किसी नदी या कुएँ पर जाना नहीं पड़ता। घर बैठे ही पाइप से पानी आ जाता है। इस कारण से शहरों में रहनेवाले स्त्री-पुरुष ब्रिटिश सरकार पर खुश हैं।

हमारे यहाँ ग्रंथ और पुस्तकें हाथों से लिखी जाती थीं। ब्रिटिशों ने छापखाने (प्रिंटिंग प्रेस) लाकर हर एक व्यक्ति को तैयार पुस्तक उपलब्ध करा दी।
मुख्य बात यह है कि जगह-जगह हज़ारों सरकारी नौकरियाँ उपलब्ध की गयीं और इस कारण अक्षरश: लाखों मध्यमवर्गीय (मिडल-क्लास) लोगों की गृहस्थी सुख से चलने लगी।”

आगे की पंक्ति में बैठा हुआ ‌‘संपतराव‌’ नाम का पच्चीस वर्षीय जोशीला युवक खड़ा होकर बोला, “इतनी सारी सुविधाएँ ब्रिटिश सरकार ने हमें दी हैं, तो हम उनके साथ कृतघ्न (एहसान-फरामोश) क्यों बनें? क्या उन्होंने हमारे साथ कोई ठगी की है?”

मल्हारराव ने कहा, “बिलकुल सही कहा। तुमने एकदम सही सवाल पूछा। ये सारी सुविधाएँ ब्रिटिश सरकार इसलिए कर रही है, ताकि मूल रूप से उनकी सेना की आवाजाही सुव्यवस्थित रूप से हो सके, उनकी सेना को गोला-बारूद और अनाज ठीक से मिल सके और उनके ब्रिटिश अफसरों और उनके परिवारों को तैयार नौकर मिल सकें।

ये सभी सुविधाएँ ब्रिटिश गवर्नमेंट भारतीयों के ही पैसे से कर रही है। ब्रिटिशों का एक पौंड भी कभी भारत में नहीं आया है। बल्कि भारत से बहुत बड़ी धनराशि और प्राकृतिक संपत्ति की और सोने-चाँदी की लूट ब्रिटिशों ने इतने वर्षों तक जारी रखी है और उसके लिए भी भारतीय मनुष्य-बल ही इस्तेमाल किया जा रहा है।”

ऊपर से कितना भी सभ्य होने का दिखावा करें, फिर भी ये ब्रिटिश पूरी तरह से असभ्य (असंस्कृत) हैं। हम भारतीयों के साथ अत्यंत घटिया दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। इन्हीं कारणों से ब्रिटिशों का विरोध करना आवश्यक है और था। क्यों संपतराव, मान गये?”

‌‘भारतमाता की जय‌’, ‌‘भगवान रामभद्र की जय हो‌’ कहकर संपतराव बोलने लगा, “यह जानकारी देश भर में फैलाना आवश्यक है। होता यह है कि मेरे जैसे शहर में नौकरी करने वाले या पढ़ने वाले व्यक्ति को ये बातें पता ही नहीं चल पातीं और ब्रिटिशों के स्कूल, उनके अस्पताल और उन्होंने हमारे धर्म के बारे में जो प्रश्न उठाये हैं; इन सबके कारण हम ब्रिटिशों के प्रशंसक बन जाते हैं और उनके द्वारा किये जा रहे अन्याय को कठोर अनुशासन (स्ट्रिक्ट डिसिप्लिन) मानकर, ब्रिटिशों से डरकर और उनका आदर रखकर व्यवहार करने लगते हैं। मैं मुंबई की नौकरी छोड़कर भी पूरा समय इस कार्य के लिए देने को तैयार हूँ।” 

सबको सन्तोष ठीक से हो जाने के बाद मल्हारराव आगे बोलने लगे, “सबसे पहले ब्रिटिश सरकार भारत पर राज नहीं कर रही थी। भारत पर राज कर रही थी, ब्रिटिशों की एक व्यापारी कंपनी - ‌‘ईस्ट इंडिया कंपनी‌’। इस ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले कलकत्ता, सूरत और कोने में पड़ी हुई मुंबई के सात द्वीपों पर अपने भंडारगृह (वेअरहाऊसेस), गुदाम और उपनिवेश बनाये और फिर धीरे-धीरे नियोजनपूर्वक भारत के एक-एक राज्य पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया।

ईसवीसन 1674 में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के समय इस ब्रिटिश कंपनी के सर्वोच्च अधिकारी बहुत ही लाचारी से पेश आ रहे थे। परन्तु शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज के कालखंड के बाद भारत में सत्ता स्थापित करने की ब्रिटिशों की इस कंपनी की इच्छा प्रबल होने लगी और वे वैसे मौकों का फायदा उठाने लगे।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई राजाओं को, समाज के कुछ विशेष गुटेों को और स्वार्थी व्यापारियों को धन का लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया, साथ ही नेपाल के उस समय के राजा को ढेर सारा धन देकर उससे एक विशाल सेना बनवा ली और भारत के एक-एक राज्य को हड़पना शुरू कर दिया और ईसवीसन 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत का सबसे बड़ा, शक्तिशाली और मज़बूत पेशवाओं का राज्य जीत लिया और फिर उन्हें सब कुछ आसान लगने लगा।

ब्रिटिशों के अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। कोई भी सामान्य ब्रिटिश वंश का सिपाही (सोल्जर) भी श्रेष्ठ भारतीय को लात से कुचल सकता था। असंतोष की चिंगारी धीरे-धीरे भड़कने लगी थी। कुछ रियासतदार (संस्थानिक) भी जागृत होने लगे थे।

उसी दौरान 1857 में कलकत्ता के पास ब्रिटिशों का एक शिविर (छावनी) था। वहाँ ‌‘बंगाल नेटिव्ह इन्फन्ट्री‌’ की 34वीं बटालियन कार्यरत थी। उसमें ‌‘मंगल दिवाकर पांडे‌’ नाम का एक अत्यंत धार्मिक ब्राह्मण शामिल था। इस बंगाल नेटिव्ह इन्फन्ट्री बटालियन 34 में केवल ब्राह्मणों को ही शामिल किया जाता था।

ये मंगल दिवाकर पांडे उत्तर प्रदेश के ‌‘बलिया‌’ ज़िले के ‌‘नगवा‌’ नामक गाँव के पुजारी ‌‘दिवाकर पांडे‌’ के पुत्र थे और कट्टर सनातनधर्मी थे।

इस बटालियन को ‌‘पॅटन 1853 एनफील्ड‌’ बंदूकें दी गयीं, जो अत्यंत शक्तिशाली और सटीक निशानेबाज़ी की थीं। लेकिन इन बंदूकों में कारतूस भरते समय दाँतों से खोलना पड़ता था और उस कारतूस के बाहरी आवरण में गाय और सूअर के मांस की चर्बी इस्तेमाल की गयी थी।

अंग्रेज़ी भाषा काफी हद तक समझने वाले मंगल पांडे को यह ख़बर ऐन वक़्त पर पता चली और उनका धार्मिक मन विद्रोह कर उठा। उन्होंने ब्रिटिश सेना में जगह-जगह बिखरे हुए सभी प्रांतीय भारतीय वंश के सैनिकों से संपर्क साधने के लिए एक यंत्रणा बनायी। मंगल पांडे मूलत: ही अध्ययनशील और वीरता से भरे हुए थे। उन्होंने सुव्यवस्थित रूप से योजना बनायी और 29 मार्च 1857 को कलकत्ता के पास स्थित अपने शिविर (छावनी) से विद्रोह की शुरुआत की। उन्हें जगह-जगह से ज़ोरदार प्रतिसाद (समर्थन) मिला।” 

(कथा जारी है)