भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 11

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 11

     इसी बीच, गंगाधरराव का स्वास्थ्य धीरे-धीरे और भी बिगड़ने लगा और इसलिए उन्होंने अपने चचेरे भाई के छोटे बेटे को गोद लिया, जिसका नाम ‌‘दामोदरराव‌था। इस दत्तक विधान के कुछ ही समय बाद गंगाधरराव का निधन हो गया। अपना दुख एक ओर रखकर, महज़ पंद्रह दिनों के भीतर, रानी लक्ष्मीबाई दत्तक पुत्र को गोद में लेकर शासन करने लगीं।

       रानी लक्ष्मीबाई को, चूँकि उनकी पहले से ही शिक्षा हो चुकी थी और पिछले पाँच वर्षों में हुए अतिरिक्त प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक अनुभवों के कारण, शासन करना बहुत ही सहजता से संभव हो रहा था; दरअसल उनके शासनकाल में झांसी की प्रजा को पहली ही बार सुख के चार दिन नसीब हो रहे थे।

 

      

झांसी की रानी को प्रजा से मिलने वाली दुआएँ, प्रशंसा, स्तुति और आशीर्वाद झांसी में मौजूदा ब्रिटिश अधिकारी के तुरंत ध्यान में आने लगे और उसने वैसी शिकायत भी वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी। परंतु उन वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारियों को उनके स्वयं के खास गुप्तचरों से यह जानकारी मिली कि रानी लक्ष्मीबाई सुबह-शाम भगवान की पूजा करने, जाप करने और मंदिर जाने जैसी बातों में ही ज़्यादा मग्न रहती थीं। वे सामान्य नागरिक महिलाओं से बार-बार मिलती हैं और उनमें से केवल ज़रूरतमंद, गरीब, अनाथ और विकलांगों की ही मदद करती हैं और इसी लिए यह स्थिति हो रही है। हालाँकि रानी लक्ष्मीबाई कंपनी सरकार के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान हैं। ऐसी जानकारी देने वाला वरिष्ठ अधिकारियों का गुप्तचर स्वयं दीवान रघुनाथसिंग ही था।

       ऐसी जानकारी मिलने से निश्चिन्त हुए ब्रिटिश अधिकारी, धनसिंह गुर्जर के ठिकानों से मिले सबूतों के कारण सतर्क हो गये। उन्हें पता चल गया था कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई धनसिंह गुर्जर की आर्थिक सहायता करती थीं और झांसी के पचास नागरिक भी धनसिंह गुर्जर के साथ थे

       और इसके साथ ही ब्रिटिश गव्हर्नर हड़बड़ाकर जाग गया और यह खबर ब्रिटिश व्हाईसरॉय को भेजी गयी। (उस समय ‌‘व्हाईसरॉय‌का पद नहीं था। कंपनी सरकार का चीफ ही यानी गव्हर्नर जनरल ही व्हाईसरॉय समझा जाता था।)

       यह जानकारी मिल जाते ही ब्रिटिश सेना के सर्वोच्च अधिकारी काम में जुट गये। धनसिंह गुर्जर द्वारा किये गये प्रचंड सशक्त एवं समर्थ मुकाबले के कारण, उनके हौतात्म्य के बाद कंपनी सरकार ने कुल 34000 नये कानून बनाये थे और उन्हें बहुत ही सटीकता से बनाया भी गया था और कठोरता से लागू किया जा रहा था।

       ब्रिटिश सर्वोच्च अधिकारी की ओर से झांसी रियासत को पत्र आया कि राजा द्वारा किया गया यह दत्तक विधान कंपनी सरकार को मंज़ूर नहीं है। ब्रिटिश अधिकारियों के साथ उचित सहयोग करें, पूरी जानकारी आधिकारिक रूप से (ऑफिशियली) दें और कंपनी सरकार के हाथों में रियासत सौंपने की तैयारी करें।

       रानी लक्ष्मीबाई और उनके प्रमुख सहयोगियों को इस बात का अंदाज़ा तो था ही। हालाँकि ब्रिटिश ‌‘कौन सा कारण सामने करेंगे‌इस विषय में संभ्रम था। दत्तक विधान का कारण आगे करके ब्रिटिशों ने हिंदू वैदिक धर्म की धार्मिक मान्यताओं को नकार दिया था। झांसी की रानी अत्यधिक क्रुद्ध हुई थीं। उन्होंने जान लिया कि यह खुले आम वैदिक धर्म पर, भारतीय रियासतदारों की सत्ता पर और भारतीय जनता की जीवनशैली पर किया गया एक कपटी आक्रमण है।

       दीवान रघुनाथसिंग की मदद से उन्होंने ब्रिटिश वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पत्राचार शुरू किया। लालाभाऊ बक्षी को दूत बनाकर भेजा गया और अधिक से अधिक समय मिले ऐसी व्यवस्था होने लगी। यह सब चल रहा था, तब रानी लक्ष्मीबाई अधिक से अधिक समय मंदिरों में बिताने लगीं। विभिन्न गाँवों में विभिन्न महापूजाएँ आयोजित करने लगीं। वैदिक पठन और पुराणकथन के सत्र आयोजित किये जाने लगे।

       इस प्रकार की मंदिर-यात्राओं, महापूजनों और सत्रों में रानी लक्ष्मीबाई के विभिन्न सहयोगी सभी प्रजाजनों को ‌‘ब्रिटिश क्या कर रहे हैं‌यह सुव्यवस्थित रूप से समझाने का कार्य करने लगे और उसी समय धर्मनिष्ठ और भारतीय अस्मिता जागृत रखने वाले लोगों से निधि जमा की जाने लगी और गुप्त रूप से पूरनसिंग कोरी और खुदाबक्ष विभिन्न शस्त्र और अस्त्र खरीदने लगे।

 

 

       14 मई 1857 को गव्हर्नर जनरल लॉर्ड डलहौसी (Lord Dalhousie) ने दत्तक विधान को गैरकानूनी घोषित कर झांसी रियासत को ज़ब्त करने का आधिकारिक आज्ञापत्र झांसी की रानी को सौंपा और इसके साथ ही उसी रात झांसी में स्थित छावनी के भारतीय सैनिकों ने झांसी शहर में जगह-जगह हमले किये और वहाँ के ब्रिटिश अधिकारियों से लड़कर उन्हें यमलोक भेज दिया। एक भी ब्रिटिशर बच नहीं सका।

       मेजर जनरल ह्यूज रोज़ (Hugh Rose) को रानी लक्ष्मीबाई ने ‌‘यह सिपाहियों का विद्रोह होने‌का यक़ीन दिलाया और बातचीत जारी ही रखी। मेजर ह्यूज रोज़ नवंबर और दिसंबर 1857 में झांसी में ही डेरा डाले हुए था। मग़र उसे, उसके अधिकारियों को और गुप्तचरों को भी रानी लक्ष्मीबाई की गुप्त गतिविधियों की जानकारी बिल्कुल भी नहीं मिल पायी। इसका सारा श्रेय (क्रेडिट) जाता है, स्वयं रानी लक्ष्मीबाई की कूटनीति को और उनके खास सहयोगियों के अपूर्व नियोजन को। दीवान रघुनाथसिंग, लालाभाऊ बक्षी, खुदाबक्ष, पूरनसिंग कोरी, झलकारीबाई, मोतीबाई, मुंदरबेगम, कमलकुमारी चौहान और राजकुंवर यादव ऐसे नौ जनों का समूह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के आदेशानुसार अत्यंत शांतिपूर्वक और फिर भी लगन से हर एक कार्य कर रहा था। दुर्गादल और महादेवशिव दल बहुत ही सुव्यवस्थित रूप से बढ़ रहे थे। मेजर जनरल ह्यूज रोज़ वरिष्ठ अधिकारी से यानी लॉर्ड डलहौसी से मिलने के लिए झांसी से बाहर निकला और उसकी यात्रा के दूसरे चरण में ही उससे झांसी के आस-पास के राज्यों के दगाबाज़ लोग आकर मिले, जो झांसी की रानी की बहादुरी और उत्कृष्ट शासन के कारण उससे ईर्ष्या करते थे। उन्होंने बहुत विस्तार से ह्यूज को झांसी में चल रही रानी की गतिविधियों के बारे में बताया और कुछ सबूत भी दिये।

       इसके साथ ही सारा चित्र पलट गया। मेजर जनरल ह्यूज रोज़ लॉर्ड डलहौसी के सामने जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के पक्ष में बोलने वाला था, उसके बजाय चरम विरोध में जाकर बोला, क्योंकि उसे दो महीने झांसी में डेरा डाले रहने के बावजूद भी कुछ भी पता न चल पाने के कारण उसका अहंकार अपमानित हुआ था। उसने झांसी की रानी को सबक सिखाने और झांसी के राज्य को नेस्तनाबूद करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

       इस समय तक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिशों के विरुद्ध तैयारी कर रहे नानासाहब पेशवा से संपर्क साध ही लिया था और पेशवा के प्रमुख प्रतिनिधि तात्या टोपे दो बार झांसी में आकर ठहरकर भी गये थे। झांसी पर हमला होने पर तात्या टोपे सहायता के लिए दौड़कर आने वाले थे, वह भी अपने तीन हज़ार सैनिकों के साथ।

 

      

 लॉर्ड डलहौसी के आदेशानुसार मेजर जनरल ह्यूज रोज़ ने दस हज़ार सैनिकों के साथ 15 मार्च 1858 को झांसी पर आक्रमण किया। घमासान युद्ध शुरू हो गया।

       मेजर एरस्किन (Erskine) मुख्य सेनापति था। उसके साथ लड़ते हुए भी लालाभाऊ बक्षी और दीवान रघुनाथसिंग ने मेजर एरस्किन के साथ संवाद जारी ही रखा था। परन्तु रानी लक्ष्मीबाई बिलकुल भी बेख़बर नहीं थीं।

       रानी लक्ष्मीबाई के दुर्गादल की 3500 वीरांगनाओं ने सीधे मेजर एरस्किन की छावनी पर ही हमला कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई और झलकारीबाई ने दो दिशाओं से आक्रमण किया था

       और ब्रिटिशों के 4000 सैनिकों को मारकर ही दुर्गादल लौटा था। 

(कथा जारी है)