भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 12

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 12

Previous Article 

 मराठी  English  ગુજરાતી  বাংলা  తెలుగు  മലയാളം  ಕನ್ನಡ  தமிழ்

रानी लक्ष्मीबाई ने पहली ही बार स्वतंत्रता-सैनिकों का नेतृत्व, प्रत्यक्ष युद्ध में किया था। रानी लक्ष्मीबाई के द्वारा खुले आम शत्रुता को स्वीकार किया जाना आवश्यक है, यह अच्छी तरह जानकर ही मेजर एरस्किन की सेना पर हमला किया गया था। मेजर एरस्किन, अपने पाँच ब्रिटीश सैनिक और ब्रिटिशों के भारतीय वंश के सौ सैनिक इनके साथ अक्षरश: भाग गया था। वह बिलकुल भी समय न गँवाते हुए मेजर जनरल ह्यूज रोज से जाकर मिला। लेकिन इस सफर के लिए उसे पाँच दिन के बजाय पंद्रह दिन का समय लगा।

 

      पाँच दिन के सफर को पंद्रह दिनों तक विलंबित किया गया, वह रानी लक्ष्मीबाई के, गाँव-गाँव में और जंगलों में रहनेवाली घाटियों-वादियों में छिपाकर रखे गये सैनिकों के गुटों द्वारा विभिन्न तरीके से परेशान किये जाने के कारण। 

 

      ब्रिटीश सेना को अनाज का दाना न मिल पाये‌’ ऐसी कोशिशें भी की गयी थीं। चार-पाँच स्थानों पर तो खाना बनाने के लिए जलाये गये उनके चूल्हों पर ही पानी की बौछार की गयी और भूख-प्यास की हालत में मेजर एरस्किन और उसके सहयोगियों को दूसरे स्थान पर भागना पड़ा था। 

 

      रानी लक्ष्मीबाई की दृष्टि से ये दस-पंद्रह दिन बहुत महत्त्वपूर्ण थे; क्योंकि कालपी इस  यमुना नदी के किनारे पर स्थित एक मुख्य शहर में नानासाहब पेशवा के भतीजे रावसाहब का मुख्यालय था और पेशवा के सेनापति तात्या टोपे, कानपुर के राजा और स्वयं रानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में दस हज़ार सैनिकों की सेना बनायी गयी थी और उनमें से प्रशिक्षित सैनिकों की सहायता झांसी की लड़ाई के लिए आवश्यक थी।

 

      मेजर एरस्किन की छावनी पर हमला कर उसका किया हुआ बुरा हाल देखकर झांसी और आसपास के प्रदेशों से किसान और मज़दूर वर्ग बहुत बड़ी संख्या में झांसी शहर में इकट्ठा होने लगा। उनमें से हट्टेकट्टे लोगों को संभव हो सकें, उतना प्रशिक्षण देकर, उनके हाथ में तलवार, भाला, कसाई का छुरा, बढ़ई (कार्पेंटर) की आरी ऐसे अस्त्र दिये जा रहे थे।

 

   

   यह देशप्रेम से भारित और धर्म की रक्षा करने के लिए तैयार हुआ बहुत बड़ा समूह ‌‘सैनिक‌’ के रूप में युद्ध करने के लिए सक्षम तो नहीं था, लेकिन उनके सीने में जल उठा देशभक्ति का अंगार प्रबल था। वे मारने के लिए भी तैयार थे और मर-मिटने के लिए भी। 

 

      इन्हें प्रशिक्षण दिया जा सके और तात्या टोपे अपने अधिकार में रहनेवाली सेना को रानी लक्ष्मीबाई की सहायता के लिए भेज सके, इन दो कारणों से मेजर एरस्किन के सफर को पंद्रह दिन तक यशस्वी रूप से विलंबित किया गया था।

 

      इस प्रकार छिपकर यानी गनिमी (गुरिल्ला) हमले कर मेजर एरस्किन की सेना को परेशान करना, रानी लक्ष्मीबाई के कुछ सहयोगियों को मंज़ूर नहीं था। उनका कहना था कि ऐसी बातों से मेजर जनरल ह्युज रोज ज़्यादा गुस्सा हो जायेगा और खुद भी बहुत बड़ी सेना लेकर झांसी पर आक्रमण करेगा।

 

      ऐसी सोच होनेवाले सभी निष्ठावान सहयोगियों को रानी लक्ष्मीबाई ने यह समझाया कि हम चाहे कैसा भी बर्ताव करें, फिर भी यह स्वार्थी और कपटी ब्रिटीश कंपनी सरकार, आज या कल हम पर बड़े बड़े हमले करते ही रहेगी।

 

      इन सहयोगियों को समझाने के बाद रानी लक्ष्मीबाई ने लगभग डेढ़ सौ (150) प्रमुख सहयोगियों की बैठक बुलायी और यहाँ रानी लक्ष्मीबाई द्वारा किया गया भाषण, आगे आनेवाले समय में हुए हर एक स्वतंत्रता सैनिक और सेनानी के लिए हमेशा प्रेरणादायी साबित हुआ। 

 

 

     झांसी की रानी ने कहा, पूरे भारतवर्ष को निगलने का यह षड्यंत्र है। इसका विरोध करना कोई आसान बात नहीं है, यह मैं निश्चित रूप से जानती हूँ। लेकिन ब्रिटिशों के पास रहनेवाला बेशुमार गोला-बारुद, प्रचंड ताकतवर और अत्यधिक दूर तक तोप-गोलें बरसानेवालीं सैकड़ों तोपें और उनके पास होनेवाले अक्षरश: लाखों सैनिक इनसे डरकर हम यदि चुप बैठने की सोचें, तो क्या वे हमारे साथ प्यार और सम्मान से बरतनेवाले हैं?

 

      जिस तरह ब्रिटीश कंपनी सेना ने धनसिंह गुर्जर को जान से मार दिया, उनके सैनिकों के क़त्ल किये और केवल और केवल आम भारतीयों के मन में दहशत निर्माण हो इस उद्देश्य से सैकड़ों गाँवों के चौकों में कइयों को फांसी पर चढ़ाया गया, यह देखते हुए झूठे सपने देखने में कोई अर्थ नहीं है। 

 

      हमारे झांसी के राज्य को वे बिलकुल भी स्वतन्त्र नहीं रहने देंगे, किंबहुना हमारा अस्तित्व ही मिटा देंगे। ना झांसी की रियासत रहेगी, ना मैं और आप जैसे झांसी के नेता जीवित रहेंगे और ना ही झांसी के प्रमुख नागरिक जीवित रहेंगे।

 

      मुझे मिली खबरों के अनुसार लॉर्ड डलहौसी ने स्वयं आदेश दिया है कि झांसी के हर एक को चुन चुन कर मार दिया जाये और झांसी में एक भी व्यापारी, ज़मीनदार, पाठशाला और मंदिर अस्तित्व में नहीं रहना चाहिए। 

 

      मुझे बताइए, ऐसे ब्रिटिशों से डरकर और इस कारण चुप रहकर चूहों की तरह मर जाना अच्छा है या इसका विरोध कर ज़ोरदार युद्ध करते हुए आगे बढ़ना श्रेयस्कर है?

 

      लड़ेंगे तो बचने की थोड़ी सी तो उम्मीद है, लेकिन यदि नहीं लड़ते तो सर्वनाश निश्चित रूप से होगा।

 

      लड़ते-लड़ते हमारी हार हुई, हम पकड़ें गये, हम मारे गये, फिर भी मरते-मरते ब्रिटीश कंपनी सरकार को ऐसा सबक सिखायेंगे कि उन्हें भारतीयों की बहादुरी और एकजुटता का धाक निर्माण होना ही चाहिए।

 

      कभी ना कभी तो मरना हर एक को है ही। मैं अमर नहीं हूँ और आप लोग भी नहीं। फिर मरना ही है तो देश के लिए और स्वधर्म के लिए मरेंगे। इसी से आगे चलकर पूरे भारत में लाखों योद्धाओं का निर्माण होगा।

 

      हाँ! अवश्य ही निर्माण होगा; क्योंकि राजकुंवर यादव और उसका भाई बिहारीलाल यादव इन दोनों को मैंने स्वयं प्रशिक्षित किया है। हमारे युद्ध की, हमारी हर एक लड़ाई की और आक्रमण की पूरी तफसील सहित जानकारी रखने के लिए और हम हार जाते हैं, पकड़े जाते हैं या मारे जाते हैं, तो इन दोनों के नेतृत्व में रहनेवाला प्रशिक्षित गुट भारत में सर्वत्र घूमकर हमारी वीरता की गाथा (गीत-कहानी), हमारे प्रयासों की गाथा और हमारी लगन के पीछे रहनेवाली व्यथा को गाँव-गाँव जाकर बतायेंगे और उसी के साथ ‌‘ब्रिटीश कितने निर्दयी और क्रूर हैं‌’ यह भी बतायेंगे।

 

    

 मुंबादेवी‌’ नामक सात द्वीपों के शहर को ब्रिटिशों ने अच्छी तरह विकसित किया है।  वहाँ विभिन्न भारतीय वंशों के व्यापारी मालदार बन गये हैं। ये लोग ब्रिटिशों के ही पक्ष में खड़े होंगे, इसकी पड़ताल मैंने करवा ली है और इसलिए मुंबानगरी के एक अत्यंत सम्माननीय अमीर व्यक्ती ‌‘श्री. जगन्नाथ शंकर शेठ‌’ के साथ मैं हमेशा संपर्क में हूँ। वे गुप्त रूप से हमारी सहायता कर रहे हैं। साथ ही मुंबई नगरी में ही रहनेवाले हवालदार सय्यद हुसेन, नाईक मंगल गुडरिया और वटेश्वर पाठक ये तीन प्रमुख जन भी गुप्त रूप से कार्यरत हैं।

      साथ ही कोल्हापुर से चीमासाहब, सातारा से रंगो बापूजी गुप्ते, नरगुंड से बालासाहब भावे, अहमदनगर ज़िले से भागोजी नाईक और कोल्हापुर की छावनी से हवालदार रामजी शिरसाट ऐसे हमारे खास जन अलग अलग प्रकार से हमारा समर्थन कर रहे हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनके अपने स्थानों पर विद्रोह भी करनेवाले हैं। ये इतने विभिन्न प्रांतों के सामान्य भारतीय नागरिक इस समय एकसाथ खड़े हो रहे हैं, इसका अर्थ अच्छी तरह जान लीजिए - हमारा भारत और भारतीय संस्कृति महान है और ब्रिटिशों को हम आसानी से शासन नहीं करने देंगे। 

 

      मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मैं मारी जाती हूँ, तब भी मैं पुन: भारत में ही जन्म लूँगी और फिर से ब्रिटिशों से लडूँगी और उस समय तो निश्चित रूप से विजयी हो जाऊँगी।”

 

      रानी लक्ष्मीबाई की इस तेजस्वी वाणी और विचारों से भरे भाषण से हर एक उपस्थित व्यक्ति प्रभावित हुआ और और जोश के साथ तैयार हो गया।

 

      इस सभा में मुंबई के जगन्नाथ शंकर शेठ और सातारा के रंगो बापूजी गुप्ते गुप्त भेस में उपस्थित थे। इन दोनों ने महाराष्ट्र के, विशेष रूप से मुंबई के नागरिकेोंं से इकट्ठा की हुई निधि रानी लक्ष्मीबाई के चरणों में अर्पण की और उसके बाद ही वे लौट गये।

 

      इसके बाद ठीक आठ ही दिन बाद मेजर एरस्किन ने पंद्रह हज़ार सैनिकों के साथ झांसी पर चारों तरफ से आक्रमण किया। उसकी पाँच सौ तोपें चारों तरफ से झांसी पर तोपगोलें बरसाने लगीं

 

      और रानी लक्ष्मीबाई ने भरे हुए राजदरबार में घोषणा की, ‌मेरी झाँसी नहीं दूँगी!‌

 

(कथा जारी है)