भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग – 5

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मंदिर में चल रहा गजर समाप्त होते होते यानी ‘पंढरीनाथ महाराज की जय` ये शब्द हवा में विलयित होते होते उस गाड़ीवान (गाड़ी का चालक) की चीख-पुकार मंदिर में उपस्थित बिलकुल हर एक को सुव्यवस्थित रूप से सुनायी दी। मंदिर के सामने वाले रास्ते की दूसरी तरफ ही रामचंद्र धारपुरकर की पोल्ट्री और डेअरी फार्म (मुर्गियों का पालन और गाय, भैंस, बकरियों का पालन और दूध का व्यवसाय) था। वहाँ चौबीस घंटे रहनेवाले मज़दूर भी (चीख-पुकार सुनकर) स्वाभाविक रूप से दौड़ते हुए आकर सबसे पहले वहाँ पहुँच गये थे।
मंदिर में उपस्थित पुरुष वहाँ उपस्थित महिलाओं को मंदिर में ही रहने के लिए आग्रहपूर्वक कहकर तेज़ी से बाहर आ गये। बहुत गड़बड़ी मच गयी। उन मृत हो चुके दोनों की भी पत्नी और अन्य आप्त महिलाओं ने ज़ोर ज़ोर से रोना शुरू कर दिया था। उन्हें अन्य महिलाएँ सहारा दे रही थीं।
कुछ ही समय में धारपुर पुलीस स्टेशन के पुलीस अफसर और सिपाही आकर दाखिल हो गये। पुलीस के पुराने तरीके से विधिवत् पूछताछ शुरू हो गयी और इसी के साथ देखनेवालों की भीड़ अपने आप ही कम होने लगी।
गाड़ीवान ‘कैसे और क्या हुआ` यह सविस्तार बता रहा था। उसने बताया कि चार-पाँच तगड़े और ऊँचे पुरुषों की टोली, गाड़ी रुक जाते ही झट् से आगे बढ़ी और उन्होंने दोनों मालिकों से उनके पास रहनेवाला सारा सोना और पैसे देने के लिए कहा। लेकिन दोनों मालिक हाथापाई करने लगे और चिल्लाने भी लगे। शायद इसी कारणवश उन लुटेरों ने उन दोनों को छुरा भोंक दिया और उनके शरीर पर रहनेवाला सारा सोना और उनके पास के सारे पैसे लेकर वे भाग गये।

वरिष्ठ पुलीस अफसर ने उस गाड़ीवान का गला पकड़ते हुए पूछा, “xxx! फिर तुम क्या कर रहे थे? तुम्हें ही कैसे कोई चोट नहीं आयी? सच बताओ, तुम भी कहीं उन्हीं के साथी तो नहीं हो?”
वह गाड़ीवान गिड़गिड़ाकर कहने लगा, “साहब! मुझे मत मारना। मैं अपनी जगह से उतरकर जब तक नीचे आ जाता, तब तक मेरे दोनों मालिक खून से लथपथ होकर नीचे गिर चुके थे और वे लुटेरे सोना और पैसे निकाल रहे थे। वह देखकर मैं डर गया। डर के कारण मेरी बोलती ही बंद हो गयी। ऐसे में उन लुटेरों में से एक ने मुझे ज़ोर से लात मारी और मैं दूर फेंका गया। उनके यहाँ से चले जाने के बाद ही मैं जैसे तैसे उठ गया और डरते डरते ही गाड़ी के पास आ गया और मुझे रोना ही आ गया। देखिए! अब भी मैं काँप ही रहा हूँ।”
उसी गाँव में रहनेवाले यानी धारपुरनिवासी दो पुलीस सिपाहियों ने कहा, “साहब! इसकी कदकाठी तो देखिए। बिलकुल मरियल (बहुत ही दुबला-पतला और कमज़ोर) है। इसे पूरा गाँव ‘भितरा सख्या` (डरपोक सख्या) के नाम से जानता है। यह एक नंबर का डरपोक इन्सान है। पूछिए कि यह किस बात से नहीं डरता? यह चूहे से डरता है, यह कुत्तों से डरता है, यह सींगवाले गाय-भैंसों से ही नहीं, बल्कि बड़े बड़े बकरों से भी डरता है। दूर से साँप दिखायी दे, तो भी यह चिल्लाने लगता है। यह भला लुटेरों की क्या मदद करेगा!
साथ ही इसके माँ-बाप गुज़र चुके हैं। इस अनाथ लड़के को, अभी जिनकी हत्या हुई है, उन हमारे पुलीस अफसर साहब ने काम के लिए रखा और यह उन्हीं के घर के बरामदे में रहता है। इसका बाप भी घोड़ेवाला ही था। इस कारण यह केवल घोड़ों से नहीं डरता।”
इस जानकारी के कारण वरिष्ठ पुलीस अफसर थोड़े से नरम हो गये, “क्यों रे सख्या! कब से साहब के यहाँ काम कर रहे हो? और क्या उन लुटेरों में से किसी को तुमने पहचाना?”

सख्या ने दोनों हाथ जोड़कर और घुटने टेककर बैठते हुए कहा, “साहब! मैं साहब के ससुराल के गाँव में रहता था। इनके ससुरजी ने ही मेरी सिफारिश करके इनके यहाँ भेजा। पिछले तीन सालों से मैं इनकी घोड़ागाड़ी चलाता एवं सँभालता हूँ और घोड़ों की देखभाल भी करता हूँ।
साहब! एक तो अंधेरा था और ऐसे में उन लुटेरों का चेहरा छोटे कंबल से आधा ढका हुआ था। इस कारण अच्छे से देख नहीं पाया। लेकिन कोई परिचित व्यक्ति नहीं लगा। मग़र जिसने मुझे लात मारी, उस लुटेरे के पैर में बहुत बड़ा कड़ा था। ऐसा पैरों में पहना हुआ मोटा कड़ा मैंने इससे पहले कभी भी नहीं देखा।”
और भी काफ़ी पूछताछ की गयी और पुलीस अफसरों को यक़ीन हो गया कि दूसरे प्रदेश से आयी हुई लुटेरों की टोली होनी चाहिए। उन्होंने मृत शरीर का पूरा परीक्षण लिख लिया और उपस्थित प्रौढ व्यक्तियों की गवाही ली। कोई भी कुछ भी नहीं जानता था। बिलकुल सभी ने केवल गाड़ीवान का चिल्लाना सुना था और मंदिर से बाहर आने पर उन मृत शरीरों को देखा था।
उस मृत पुलीस अफसर की पत्नी ने भी रोते रोते कहा, “यह सख्या मेरे मायके में घोड़ों का ही काम देखता था। वह बहुत प्रेमल और वफादार है। वह साहब का घात नहीं करेगा।”
धीरे धीरे सारी भीड़ तितर-बितर हो गयी। पुलीस अफसर और सिपाही चले गये। दोनों मृत शरीर विधिवत् कार्रवाई के बाद रिश्तेदारों को सौंपे गये। मंदिर के अहाते में केवल गाँव के कुछ चुनिंदा प्रतिष्ठित लोग और मंदिर में हमेशा आनेवाली भजनी मंडली रुके हुए थे।
मल्हारराव ने गाँव के उपाध्याय से प्रश्न पूछा, “हमारे इस पवित्र मंदिर के आँगन में ही ऐसा खून-खराबा हुआ है। हम वारकरी लोग तो मांसाहार तक नहीं करते। फिर अब इस जगह का शुद्धीकरण करना ही होगा ना?” यह सवाल दर असल वहाँ के हर एक के मन में उठा था।
उपाध्याय ने टिमटिमाते दीये के थोड़े से प्रकाश में पंचांग को उलट-फेर करते हुए कहा, “मल्हारराव! मुहूर्त भी अच्छा नहीं था और नक्षत्र तो बहुत ही खराब था। इस कारण शुद्धीकरण और शान्तिपाठ तो करना ही होगा। इस आँगन में ही सारी व्यवस्था करनी होगी। यहाँ चारों तरफ़ से मंडप बनाना होगा। ‘किसी की भी अशुभ छाया न पड़ें` इसलिए मंडप की चारों तरफ़ मोटा तंबू का कपड़ा बाँधना होगा और इस मंडप में केवल चुनिंदा लोगों को ही आने-जाने की छूट होनी चाहिए।” उपाध्यायजी ने आवश्यक सामान की बहुत बड़ी सूची (लिस्ट) बनाकर दे दी।
उपाध्यायजी और मल्हारराव ने मिलकर गाँव के जिज्ञासु वृत्ति के लोगों को ही इस काम के लिए नियुक्त किया। ज़ाहिर है कि उन्हें मंदिर के अहाते से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी।
सभी लोग चले गये। रात के दो बज गये थे। मंदिर के सभामंडप में केवल मल्हारराव, गोविंददाजी, उपाध्याय, जानकीबाई और गाँव के स्कूल के हेडमास्टर रहनेवाले ‘फडके मास्टर` ये लोग ही थे। मंदिर का दरवाज़ा भीतर से बंद करके ये सभी लोग मंदिर के तहखाने से शिवमंदिर के तहखाने में आ पहुँचे। वहाँ फकीरबाबा यानी शिवरामराजन् प्रतीक्षा कर ही रहे थे। हेडमास्टर रहनेवाले फडके मास्टर को कसकर गले लगाते हुए फकीरबाबा ने कहा, “किसी ने भी आपको नहीं पहचाना। आप भजन के लिए जहाँ बैठे थे, उसके सामने ही मैं बैठा था। भजन चलते समय बीच में ही उठनेवाले और दो भजनों के बीच के अंतराल में उठनेवाले अथवा एक गजर समाप्त होकर दूसरा गजर शुरू होने के बीच की अवधि में कई लोग आपके आसपास विचरण कर रहे थे। इस स्कूल में पिछले दस सालों से पढ़ाते होने के बावजूद भी कोई भी आपको पहचान नहीं सका। सच में मँझे हुए अभिनेता (अॅक्टर) हैं आप! और कितनी तेज़ी से उस पेढीवाले के पेट में भोंक दिया आपने! आपका जवाब नहीं!”

फडके मास्टर ने दोनों हाथ जोड़कर भगवान का स्मरण करते हुए कहा, “यह स्वयंभगवान की कृपा से ही हो सकता है। मेरी बात जाने दीजिए। ‘दोनों भाई आये हैं` यह समाचार मिल जाते ही जानकीबाई जिस फुर्ती से चरवाहों का छोटा कंबल पहनकर मेरे साथ शामिल हो गयी, वह आश्चर्यजनक ही था और उसी ने तो उस नीच पुलीस अफसर पर ही कुल्हाड़ी से वार किया।”
मल्हारराव ने कौतुक के साथ अपनी लाड़ली बहू की तरफ देखते हुए कहा, “बेटी! तुम सच में रणरागिणी (युद्ध में पराक्रम करनेवाली) हो। इन दो नीच भाईयों ने ही हमारे ज़िले के कई देशभक्तों को बहुत यातनाएँ दी थीं। वह व्यापारी भाई पुलीस को गुप्त खबरें देता था और स्वतंत्रता-सेनानियों को पकड़वाता था और वह पुलीस अफसर भाई उन सभी को असीम यातनाएँ देता था और वह भी लोगों के सामने। इस कारण प्रचंड दहशत निर्माण हुई थी।”
‘प्रभु रामचंद्र की जय` यह कहकर फकीरबाबा ने अत्यधिक आदर के साथ कहा, “यहाँ की दहशत दूर हो गयी है। कार्य का आरंभ जानकी ने किया है। उसमें उसकी सहायता महादेवराव फडके ने की है और पूरी योजना बनायी थी, रामचंद्र ने। राम, जानकी और शिव इनके एकसाथ आ जाने पर अशुभ का नाश अवश्य ही होगा।”
(कथा जारी है)

