भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग – 4

जानकीबाई, जैसा कि पहले तय किया गया था, उसके अनुसार ही मुंबई से खास तौर पर फकीरबाबा से ही यानी शिवरामराजन् से ही मिलने आयी थी। शिवरामराजन् पिछले तीन सालों से जानकीबाई को अच्छे से जानते थे। इस ऐसी छोटी उम्र की युवती में बुद्धिमानी, अचूकता से निर्णय लेने की क्षमता, निर्भयता और संयम इन बातों का कितना सुंदर संगम हुआ है, यह फकीरबाबा पूरी तरह जानते थे। उनके पैर छूकर उन्हें प्रणाम करनेवाली जानकीबाई को आशीर्वाद देते समय फकीरबाबा ने कहा, “बेटी! उत्तर हिंदुस्थान में अधिकांश प्रदेश की महिलाएँ अब भी सिर पर रहनेवाला पल्लू चेहरा ढका जाने तक नीचे ओढ़कर यानी चेहरा ढककर ही विचरण करती हैं। यहाँ तक कि शहरों में भी यही बात दिखायी देती है। परन्तु मुख्य शहरों में रहनेवाली कुलीन महिलाओं में कुछ कुछ प्रमाण में आधुनिक दुनिया के अस्तित्व का एहसास होने लगा है। वे महिलाएँ स्वतंत्र रूप से विचरण भी कर रही हैं और सीख भी रही हैं। भले ही मुंबई, पुणे इलाके की महिलाओं के जितनी शिक्षा में प्रगति उत्तर हिंदुस्थान की महिलाओं में न हुई हो, मग़र इसके बावजूद भी कई वकील, डॉक्टर्स, इंजिनियर्स, व्यापारी और गवर्नमेंट ऑफिसर्स के घर की महिलाएँ चेहरे को पूरी तरह ढकने के बजाय केवल सिर पर से पल्लू ओढ़कर विचरण करती हैं और उनमें से कुछ महिलाएँ तो बिलकुल पुणे, मुंबई में स्थित उनके समान सामाजिक स्तर की महिलाओं की तरह ही आधुनिक वेशभूषा, शिक्षा (एज्युकेशन) और समाज-सुधार इनमें धीरे धीरे प्रगति करने लगी हैं।

उसी प्रकार मध्य भारत और दक्षिण भारत की महिलाएँ भी सुशिक्षित (एज्युकेटेड) होने लगी हैं। शहर के कई स्कूलों में लड़कियाँ जाने लगी हैं। कुछ कुछ स्थानों पर तो महिलाओं के लिए अलग स्कूल भी शुरू हो चुके हैं। लेकिन मुंबई और पुणे नगरी की महिलाएँ ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं और स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लेने लगी हैं।
गद्दारों को सबक सिखाने का कार्य करते समय गुप्तता रखना और संयम रखना हमारे लिए अत्यधिक आवश्यक है। साथ ही हमारे द्वारा किया गया यह कार्य आगे चलकर इतिहास में दर्ज तक नहीं होगा, यह जानकर ही कार्य आरंभ करना चाहिए। हमारे इस कार्य में शामिल पुरुषों को भी ज़ाहिर रूप से ब्रिटीश-परस्त (ब्रिटीशों के हित में काम करनेवाले, ब्रिटीशों की चापलूसी करनेवाले) बनकर अकड़ दिखाते हुए घूमना पड़ेगा। कदाचित्, जब कभी स्वतंत्रता प्राप्त होगी (आज़ादी मिलेगी), तब हमारे नाम देशभक्तों की सूची (लिस्ट) में नहीं होंगे, इस बात का एहसास हमारे गुट के हर एक को होना अत्यधिक आवश्यक है। मैंने जगह जगह कई इसी प्रकार के अलग अलग उम्र के पुरुष कार्यकर्ताओं को तैयार किया है और मेरी पत्नी ने इस प्रकार की महिलाओं को हमारे मद्रास इलाके में तैयार किया है।
जानकीबाई! तुम्हारा और रामचंद्रराव का कार्य तो ज़ोरशोर से चल रहा है। तुम्हारी कुछ खास महिला कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात करने का आयोजन तुमने किया है, यह तुम्हारा संदेश मुझे मिला। सभा कहाँ है और किस विषय पर है, यह भी मैं नहीं जानता। तुम ही प्रत्यक्ष यहाँ आयी हो, तो इसका अर्थ क्या सभा यहीं पर है?”
उत्तर मल्हारराव ने दिया, “हाँ! मुंबई, पुणे शहरों में वर्तमान समय में हर एक शिक्षित व्यक्ति पर कड़ी नज़र रखी जा रही है। इस कारण इन शहरों में होनेवाला महिलाओं का सार्वजनिक हल्दी-कुंकुम का समारोह (इस कार्यक्रम में महिलाएँ इकट्ठा होकर एक-दूसरी को हल्दी-कुंकुम लगाती हैं, कभी कभी इसमें यजमान स्त्री के द्वारा खान-पान की व्यवस्था भी की जाती है और कुछ उपहार भी दिये जाते हैं और इसी बहाने महिलाएँ एक-दूसरी से मिलती हैं और उनकी आपस में बातें भी होती हैं), महिला शिक्षा परिषद्, बेवा और परित्यक्ता (पति द्वारा छोड़ी गयी महिला) महिलाओं के लिए आयोजित किये जानेवाले नर्सिंग के शिक्षा सत्र या ऐसी महिलाओं के लिए चलायी जानेवाली सिलाई काम की कार्यशालाएँ इन पर भी नज़र रखी जा रही है। ब्रिटीशों को जितना मुंबई, पुणे और कलकत्ता से डर लगता है, उतना अन्य किसी भी प्रांत से नहीं लगता। क्योंकि अधिक से अधिक क्रांतिकारी और सशस्त्र विद्रोह इन्हीं दो प्रांतो में हो चुके हैं। पंजाब भी धधक ही रहा है। कई सीख युवा तो देश के लिए कभी भी जान देने के लिए तैयार हैं। लेकिन ऐसे युवाओं के ही घात हो रहे हैं और उन घातों को रोकना, यही तो हमारा काम है।
फकीरबाबा! इसी कारण अच्छी तरह सोच-विचार कर सभा का आयोजन इस शिवमंदिर में ही किया गया है। भारत के सभी प्रांतों के समविचारी लोगों का यहाँ इकट्ठा होना पहले ही शुरू हो चुका है। वे सभी वारकरियों के यानी विठ्ठल भगवान के भक्त रहनेवाले मराठी भाषिकों के पहनावे में ही यहाँ आ रहे हैं और आनेवाले हैं।

हमारे इस शिवमंदिर से एक सुरंगी रास्ता जाता है, गाँव की पश्चिम सीमा के बाहर रहनेवाले विठ्ठल मंदिर में ही। वहाँ भी इसी तरह की गुप्त रचना कर रखी है। हमारे इस्टेट मॅनेजर गोविंददाजी ही उस विठ्ठल मंदिर के भक्तों के मुख्य भजनी (भजन करनेवाले प्रमुख व्यक्ति) हैं। आपका हर एक प्रतिनिधि से परिचय कराने का कार्य गोविंददाजी और जानकी करेंगे। फिर आप खुले दिल से सब कुछ बताइए, देश भर में घूमकर आपने जो देखा है, जो गुप्त जानकारियाँ आपने प्राप्त की हैं, उनके बारे में सब कुछ बताइए।”
सुरंगी मार्ग से वे तीनों जन विठ्ठल मंदिर जा पहुँचे। वहाँ नाम-सप्ताह की तैयारी ज़ोरशोर से चल रही थी। यूँ तो, शर्ट-पँट जैसी आधुनिक पोशाक पहनकर विचरण करनेवाले गोविंददाजी आज वहाँ धोती, कुर्ता, गले में वीणा और तुलसीमाला, माथे पर गोरोचन और अभीर का टिका और हाथों में करताल ऐसे रूप में सर्वत्र विचरण कर रहे थे।
पल भर के लिए फकीरबाबा ने भी गोविंददाजी को नहीं पहचाना। दर असल गोविंददाजी और शिवरामराजन् की ही वास्तव में दोस्ती थी। फकीरबाबा मुँह से कबीरपंथ की प्रथा के अनुसार निरंतर रामनाम लेते थे, वहीं, गोविंददाजी वारकरी पंथ की प्रथा के अनुसार निरंतर विठ्ठल नाम लेते थे।
शाम का भोजन हो जाने के बाद, गाँव की परिपाटी के अनुसार भक्त महिलाएँ-पुरुष गोविंददाजी के कीर्तन में शामिल होने के लिए इकट्ठा होने लगे। ज़ाहिर है कि उनमें से 30% जन ऐसे थे, जिनपर भारत को स्वतंत्र करने का जुनून सवार था।
अहम बात यह थी कि गोविंददाजी की पहचान भी इनमें से कइयों के साथ जानकीबाई ने ही करवायी थी। ऐसी मुलाक़ातों के लिए व्यवस्था इस विठ्ठल मंदिर में बिलकुल भक्तों की भीड़ होते हुए भी की जाती थी। वहाँ विठ्ठल मंदिर के गर्भगृह से सटकर ही संस्कृत, वेदपाठ की पाठशालाओं के वर्ग थे और मुख्य रूप से मौन और ध्यान करने के कमरे भी थे। इन कमरों में ही सारी गुप्त मुलाक़ातें हुई थीं।

गोविंददाजी ने ‘जय जय रामकृष्णहरि’ इस संतश्रेष्ठ जगद्गुरु तुकारामजी महाराज के दिव्य मंत्रगजर से आख्यान (कथा) का प्रारंभ किया। प्रजा पर अत्याचार करनेवाले रावण की कथाओं से आरंभ हुआ था। रावण ने कुबेर का राज्य कपटपूर्वक जीतकर, वहाँ के मूल वैदिक धर्म को किस तरह दबाया था और साधु-संतों की हत्याएँ की थीं इसका वर्णन किया जा रहा था। कीर्तन का ‘श्रीरंग’ यानी कथा समाप्त होकर ‘उत्तररंग’ का आरंभ हुआ। प्रभु श्रीरामचंद्र के अवतरण के हेतु समझाये जा रहे थे।
अन्त में ‘राम लक्ष्मण जानकी, जय बोलो हनुमान की` यह गजर ज़ोर ज़ोर से शुरू हुआ। कीर्तन में तल्लीन हो चुके भक्तों को गजर और झाँझ की आवाज़, मृदंग की आवाज़ इनके सिवाय कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था।
कीर्तन के लिए ठीक प्रवेशद्वार के पास ही बैठा कमर में झुका हुआ एक वृद्ध व्यक्ति खाँसते-खाँसते लाठी के सहारे धीरे से बाहर निकला और उस अंधेरे में उस वृद्ध से एक महिला आकर मिली।
हमेशा की तरह कीर्तन समाप्त होते समय शान दिखाने आनेवाले पास ही के बड़े गाँव में रहनेवाला एक पेढी का मालिक और उसका भारतीय पुलीस अफसर भाई ये अपनी घोड़ागाड़ी से मंदिर के अहाते में उतर रहे थे।
नीचे उतरे, इन दोनों के पेट फाड़े हुए मृतशरीर ही। वह वृद्ध और वह महिला फिर एक बार शांति से भजन कर रहे थे और उस घोड़ागाड़ी का गाड़ीवान (चालक) चिल्ला रहा था, “डाका डाला गया! मेरे मालिक को बचाइए!” और इस तरह चिल्लाते चिल्लाते उसने ‘उन दोनों की निश्चित रूप से मृत्यु हो चुकी है` इस बात की पड़ताल कर ली।
मंदिर में जयघोष हुआ - ‘पंढरीनाथ महाराज की जय’। यह इशारा था - एक-दूसरे को किया गया।
(कथा जारी है)
