भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 28

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लाला लजपतराय और बिपिनचंद्र पाल इन दोनों ने पंजाब प्रांत और बंगाल प्रांत में तिलकजी के दौरे आयोजित किये। उस समय के पंजाब प्रांत में, वर्तमान समय में भारत में स्थित पंजाब, हरियाणा और वर्तमान समय में पाकिस्तान में स्थित पंजाब का शेष भाग शामिल था और उस समय के बंगाल प्रांत में, आज का पूरा बांग्लादेश, भारत में स्थित पश्चिम बंगाल और आसपास के कुछ प्रदेश सम्मिलित थे।
कलकत्ता में तिलकजी की सभा उस समय के समाचारपत्रों के लिए चर्चा का एक बहुत बड़ा विषय बन गयी थी। हर एक सभा में अक्षरश: पाँच-पाँच हज़ार लोग उपस्थित रहते थे और कभी-कभी तो यह आँकड़ा उससे दुगुना या तिगुना भी हो जाता था। कलकत्ता और पंजाब प्रांत के लोग तिलकजी को खुले दिल से ‘भारत का सर्वोच्च नेता’ मानने लगे और ऐसा उल्लेख भी वहाँ के नेताओं के भाषणों में होने लगा।
भारत की ब्रिटिश गव्हर्नमेंट ने सन १८९७, १९०९ और १९१६ में तिलकजी को राजद्रोह और ब्रिटिशों के खिलाफ असंतोष भड़काने के आरोपों में डेढ़-डेढ़ साल के लिए जेल भेज दिया। सन १८९७ के राजद्रोह के केस में और एक व्यक्तिगत स्तर के केस में भी बॅरिस्टर महंमद अली जिना ने तिलकजी का वकालतनामा सम्मान के साथ स्वीकार किया। सन १९१३ और १९१६ के केस में तो तिलकजी को इन आरोपों से बरी करवाने में जिना सफल रहे।
जिना एक अत्यंत उच्चशिक्षित और आधुनिक विचारों वाले काँग्रेस के नेता थे और उन्हें तिलकजी के प्रति बहुत आदर था। इस कारण सुशिक्षित मुस्लिम युवा वर्ग तिलकजी के समर्थन में खड़ा होने लगा। तिलकजी की जनप्रियता पंजाब और बंगाल प्रांतों से सर्वत्र फैलने लगी और यह देखकर ब्रिटिशों का गुस्सा खौलने लगा और उनके कपट-कारस्तान भी शुरू हो गये और इस कारण लॉर्ड कर्झन इस अत्यंत कूटनीतिज्ञ, कपटी और क्रूर स्वभाव वाले व्यक्ति को भारत भेजा गया और इस शख्स ने हिंदु-मुसलमानों में दुश्मनी पैदा करना और हिंदु-मुसलमानों के दंगे भड़काना, इन दो मुख्य मुद्दों को अपने लक्ष्य के रूप में सामने रखा।
इस कारण उसने संयुक्त बंगाल प्रांत का ‘मुस्लिम बहुल पूर्व बंगाल’ और ‘हिंदु बहुल पश्चिम बंगाल’ के रूप में विभाजन करवा दिया। लॉर्ड कर्झन को यक़ीन था कि इसमें कोई भी भूमिका अपनायी जाने पर तिलकजी का नुकसान ही होगा और भारत भी बँट जायेगा। लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
लोकमान्य तिलकजी ने बिपिनचंद्र पाल की मदद से पूरे बंगाल प्रांत में ब्रिटिशों के खिलाफ ही एक उग्र आंदोलन खड़ा कर दिया। ब्रिटिश सरकार से मिले हुए कुछ लालची भारतीयों ने कुछ जगहों पर हिंदु-मुसलमान दंगे भड़काने के प्रयास भी किये। लेकिन तिलकजी के अनेक सहयोगियों ने सड़कों पर उतरकर और गाँव-गाँव घूमकर लोगों को तिलकजी की भूमिका समझायी और बंगाल के इस विभाजन को हो रहे विरोध को अधिक ही ज़ोरदार कर दिया। अंतत: यह विभाजन सन १९११ में रद कर दिया गया।

उसी समय ‘अरोबिंदो घोष’ नामक बंगाली गरम दल के नेता आगे आये और तिलकजी की ओर से पूरे उत्तर भारत में प्रचार-प्रसार करने लगे। इन्हीं अरोबिंदो घोष ने आगे चलकर पाँडेचरी में एक आश्रम बनाकर एक अनोखी और फिर भी पूरी तरह वेदों का अनुसरण करने वाली आध्यात्मिक कॉलनी की स्थापना की।

उसी समय ‘चिदंबरम पिल्लाई’ दक्षिण भारत में तिलकजी का प्रतिनिधित्व करने लगे और इस कारण पूरे दक्षिण भारत के बिलकुल सामान्य और अशिक्षित नागरिक को भी यह दृढ़ता से लगने लगा कि ‘तिलकजी हमारे नेता हैं और हमें उनका समर्थन करना ही चाहिए और उनके कार्य में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए’।
दिन-प्रतिदिन तिलकजी की जनप्रियता बढ़ती ही रही और तिलकजी ने धीरे-धीरे ‘हर एक भारतीय आसानी से ब्रिटिशों का विरोध कर सके’ ऐसे स्वतंत्रता-संग्राम के मार्ग लोगों के सामने रखे।
१) पहला मार्ग था विदेशी माल का बहिष्कार - ख़ासकर ब्रिटन से आने वाले माल का बहिष्कार। भारत से कच्चा माल ब्रिटिश बहुत सस्ते में ले जाते और उसी से ब्रिटन में बना पक्का माल भारतीयों को चौगुने दाम पर बेचते थे। कभी-कभी तो यह प्रमाण दस गुना भी होता था।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत तिलकजी ने लोगों को ब्रिटिश माल बेचने वाली दुकानों के सामने जाकर ‘पिकेटिंग’ करने को कहा और लोग वैसी पिकेटिंग करने भी लगे। लोगों के लिए यह बात सीधी और सरल थी - विदेशी माल की दुकान में जानेवाले लोगों को रोकना, उन्हें ब्रिटिशों की नीति समझाना और फिर भी यदि लोग न मानें, तो देशभक्तों के समूह मानव-शृंखला बनाकर दुकान में जाने का रास्ता बंद कर देते थे। इसके कारण ब्रिटिश माल की बिक्री पचास प्रतिशत कम हो गयी और ब्रिटिश सरकार तथा ब्रिटिश उद्योगपतियों को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।
२) स्वदेशी आंदोलन - यह आंदोलन लोकमान्य तिलकजी ने ही भारत में पहली बार शुरू किया। इसके लिए उन्होंने अपने भाषणों में घोषित किया कि केवल ब्रिटिश माल का बहिष्कार करने से काम नहीं चलेगा, उस माल की जगह भारत में बना माल मिलना आवश्यक है। और इसके परिणामस्वरूप कराची से लेकर मद्रास तक अनेक छोटे-बड़े भारतीय उद्यमी उत्साह से भारत में माल बनाने लगे।
यह सब देखकर क्रोधित हुए लॉर्ड कर्झन ने अपने कुछ खास खरीदे हुए भारतीय पत्रकारों को तिलकजी की कलकत्ता सभा के बाद की प्रेस कॉन्फरन्स में घुसा दिया।
इन ब्रिटिश-परस्त पत्रकारों ने एक साथ शोर मचाकर तिलकजी से प्रश्न पूछना शुरू किया। उनका सवाल यह था - “मिस्टर तिलक! १८१८ से पहले दो-तिहाई भारत पर मराठों का राज था। आप भी मराठी ही हैं। आपको वैसा ही अपना मराठा राज्य भारत पर लाना है ना?”
तिलकजी को गैर-मराठी भाषियों से तोड़ने का यह एक चालाकी भरा प्रयास था।

लेकिन लोकमान्य तिलकजी ने बिलकुल सुस्पष्ट शब्दों में और सार्वजनिक रूप से माइक से उत्तर दिया, “यह कल्पना अब कालबाह्य हो चुकी है। इस आधुनिक युग में भारत के सभी प्रांतों का प्रतिनिधित्व करने वाली जनतांत्रिक सरकार आयेगी और मेरे गुट में बंगाली नेता हैं, पंजाबी नेता हैं, तेलुगु, कन्नड़ और मद्रासी (तमिल) नेता हैं और हमारे कार्यकर्ता भी दूर-दूर तक फैले हुए हैं।
इसलिए ब्रिटिशों के भारत छोड़कर चले जाने पर किसी एक विशिष्ट समुदाय का राज्य स्थापित नहीं होगा; बल्कि ‘राजा-प्रजा’ की यह व्यवस्था ही समाप्त हो जायेगी और लोगों की सरकार बनेगी।”
तिलकजी के इस सार्वजनिक एवं सुस्पष्ट उत्तर के कारण लॉर्ड कर्झन की कूटनीति पूरी तरह असफल साबित हुई और पूरा भारत तथा समस्त भारतीय, लोकमान्य तिलकजी को ही अपना एकमात्र सर्वोच्च नेता मानने लगे।
१९०७ में सूरत में हुए काँग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में नामदार गोपाल कृष्ण गोखले और उनके सहयोगियों ने तिलकजी को परास्त करने के लिए बहुत प्रचार-प्रसार किया। उन्हें गरम दल का अस्तित्व ही मान्य नहीं था। तिलकजी के समर्थक डटे रहे, लेकिन काँग्रेस को तोड़ने में गोखले सफल रहे। काँग्रेस के ‘गरम दल’ और ‘नरम दल’ ऐसे दो भाग अस्तित्व में आ गये।

१९०७ के मार्च महीने में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ये तिलकजी के दो बंगाली समर्थक पहले तिलकजी से कलकत्ता में आकर मिले और बाद में तीन बार तिलकजी से मिलने पुणे आये। ‘तिलकजी ने उनकी निश्चित रूप से क्या सहायता की’ यह तो भगवान ही जाने।
लेकिन इन दोनों ने बहुत बड़ा इतिहास रचा।
(कथा जारी है)
