भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 27

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जिस योजनाबद्ध और अनुशासनबद्ध तरीके से कमिशनर रँड और लेफ्टनंट आयर्स्ट को भरी सड़क पर, आस-पास भारी भीड़ होते हुए भी और वह भी एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दिन में गोलियाँ दागकर मार दिया गया, उससे ब्रिटिश सरकार को पूरा यकीन हो गया था कि यह काम केवल तीन चाफेकर बंधु और उनके ‘महादेव रानडे’ नाम के कोई रिश्तेदार नहीं कर सकते।
१८५८ के बाद पहली ही बार इतने खुले आम बहुत ही ऊँचे ओहदे पर स्थित ब्रिटिश अफसरों पर जानलेवा हमला हुआ था
और वह दिन था २२ जून १८९७ यानी ब्रिटिश रानी व्हिक्टोरिया के हीरक महोत्सव के समारोह का दिन। (Diamond Jubilee of Queen Victoria)
पुणे के गव्हर्न्मेंट हाउस में यह समारोह हुआ था और वहाँ से लौट रहे कमिशनर रँड पर गोलियाँ दागी गयीं। ब्रिटिशों का गुस्सा एक और बात से अधिक बढ़ गया था, क्योंकि लेफ्टनंट आयर्स्ट (Ayerst) ने तो मौके पर दम तोड़ दिया, लेकिन कमिशनर रँड ने बारह दिन तक मौत से जूझते हुए ३ जुलाई १८९७ को ससून हॉस्पिटल में आख़िरी साँस ली
और उसकी सेहत की खबरें देने के बहाने तिलकजी के ‘केसरी’ और ‘मराठा’, इस क्रान्ति की ज्योति को और अधिक उज्वल करते रहे।
सारी जनता के मन का असंतोष इस घटना के माध्यम से प्रकट हुआ था और यह सच भी था। प्लेग की महामारी को रोकने के लिए स्वास्थ्यसंबंधी सावधानियाँ बरतना ज़रूरी ही था, लेकिन कमिशनर रँड ने इस कार्य के लिए ब्रिटिश सैनिकों को उतारा और आपातकाल घोषित करके सैनिकों के हाथ में सारे अधिकार दे दिये।
इन ब्रिटिश सैनिकों ने क्या नहीं किया? ये सैनिक घर-घर घुसकर, घर के बूढ़े-बुज़ुर्ग व्यक्तियों से लेकर छोटे बच्चों तक किसी को भी खींचते हुए बीच सड़क पर ले आते थे और घर की फर्श उखाड़ी जाती थी, घर का सामान जलाया जाता था, क़ीमती वस्तुएँ, गहने, चाँदी के पूजा के उपकरण और पैसे खुले आम लूटे जा रहे थे और सबसे भयानक बात यह थी कि स्त्रियों की आबरू लूटी जा रही थी।
जगह-जगह लोग इसका विरोध कर ही रहे थे, लेकिन ऐसे विरोध करनेवालों को क्रिमिनल प्रॉसिक्युशन का सामना करना पड़ता था और सज़ा ज़ाहिर है, भयंकर होती थी।
जिस गणेशखिंड में इन दोनों यूरोपीय अफसरों पर हमला हुआ, उस जगह सैंकड़ों लोग अगले ही दिन से सुबह-शाम इकट्ठा होने लगे। कुछ लोग तो वहाँ की मिट्टी उठाकर माथे पर लगाने लगे।
३ जुलाई को रँड की मृत्यु हुई और इसके बावजूद भी ब्रिटिशों को ‘अपराधी कौन है’ इस बात का बिलकुल भी पता नहीं लग सका था; लेकिन ७ अक्तूबर १८९७ को ‘द्रविड़’ उपनाम (सरनेम) के दो भाइयों ने ब्रिटिश पुलिस अफसरों से पैसे लेकर खबर दी कि ‘दामोदर हरि चाफेकर’ का इन हत्याओं से संबंध है। ८ अक्तूबर को दामोदर हरि चाफेकर को गिरफ्तार किया गया और १८ अप्रैल १८९८ को उन्हें फाँसी दी गयी। बालकृष्ण हरि चाफेकर भूमिगत हो गये थे, लेकिन उनके बारे में भी उनके एक जिगरी दोस्त ने ही गद्दारी करते हुए बता दिया और उन्हें जनवरी १८९९ में गिरफ्तार किया गया।

बाद के समय में वासुदेव हरि चाफेकर, महादेव विनायक रानडे और खंडो विष्णु साठे इन तीनों ने ९ फरवरी १८९९ को द्रविड़ बंधुओं का वध कर दिया, लेकिन इन तीनों को भी जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया।
खंडो विष्णु साठे तो महज़ पंद्रह साल का था, लेकिन उसे भी दस साल की सश्रम कारावास की सज़ा दी गई।
इस घटना के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स, सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड जैसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के अखबारों ने खबरें छापीं और ब्रिटिशों की हर जगह बदनामी होने लगी।
काँग्रेस के नरम दल के वरिष्ठ नेता गोपाल कृष्ण गोखलेजी सरकार के निमंत्रण पर ब्रिटन गये हुए थे, तब उन्होंने मॅनचेस्टर गार्डियन दैनिक को साक्षात्कार (इंटरव्ह्यू) दिया और ब्रिटिश सैनिकों को भारतीयों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को कुचलने के लिए दोषी ठहराया। जीवन में पहली ही बार उन्होंने, ‘ब्रिटिश सैनिकों ने क्या-क्या गंदे अपराध किये’ इस बारे में सार्वजनिक मत व्यक्त किया।
लेकिन गोखलेजी का यह साहस कुछ ही दिनों तक टिका रहा। उनके ब्रिटिश मित्रों ने उन्हें ‘सीधा कर दिया’ और आखिर में गोखलेजी ने बिना शर्त माफ़ी माँग ली और अपनी गिरफ्तारी टाल दी। इस एक बात की वजह से भारतीयों के मन से नरम दल काँग्रेस पूरी तरह उतर गयी और संपूर्ण भारतीय जनता ‘आधार और नेता’ के तौर पर ‘लाल-बाल-पाल’ की ओर ही देखने लगी।
कुछ दिन पहले ही आगरकरजी का बीमारी के कारण कम उम्र में निधन हो गया था और गोपाल कृष्ण गोखलेजी भारतीयों के मन से उतर चुके थे। उन दो सालों में काँग्रेस के अधिवेशनों में एक भी ब्रिटिश-विरोधी ज़ोरदार प्रस्ताव पास नहीं होने दिया गया और इसी वजह से काँग्रेस का नेतृत्व अपने-आप ही जी-तोड़ परिश्रम करने वाले बाल गंगाधर तिलकजी के पास ही आ गया।

ब्रिटिश सरकार तिलकजी से जितनी नफरत नहीं करती होगी, उससे कई गुना तिलकजी से नफरत काँग्रेस के नरम दल और समाजसुधारों के नाम पर जननेता बनकर घूमनेवाले कुछ भारतीय लोग कर रहे थे और इसी में से लोकमान्य तिलकजी पर अनेक निजी मुक़दमे दर्ज होने लगे। ‘ताईमहाराज मुक़दमा’ सबसे अधिक चर्चित रहा। यह एक गोद लेने की व्यक्तिगत बात थी और तिलकजी केवल एक ट्रस्टी थे। परन्तु ‘तिलकजी को नामशेष कर देना है’ इस निश्चय से भड़के हुए ये तथाकथित सुधारक कुछ जगह सफल हो गये और तिलकजी को दो बार इस प्रकार के छोटे कारणों के लिए जेल जाना पड़ा।

लेकिन लोकमान्य तिलकजी ने ऐसी परिस्थिति में भी ब्रिटिशों का विरोध करना जारी ही रखा। तिलकजी कारावास में थे, तब न. चिं. केळकर और धोंडोपंत विद्वांस (तिलकजी के दामाद और भांजे) ने तिलकजी के अख़बार एवं कार्य को निष्ठापूर्वक जारी रखा।
(कथा जारी है)
