भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 26

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 26

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धीरे-धीरे तिलकजी के आस-पास लगातार अलग-अलग लोगों की भीड़ रहने लगी। तिलकजी यदि केवल पाँच मिनट की दूरी पर स्थित कार्यालय की ओर जाने निकलते, तब भी उनके साथ कम से कम ५० से १०० लोगों का समूह होता ही था। तिलकजी के इर्द-गिर्द घूमनेवाले ये लोग केवल दर्शक नहीं थे। जिसे भी ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ने की आवश्यकता महसूस होती थी और जो भारत की स्वतंत्रता के सपने देखता था, ऐसा हर व्यक्ति तिलकजी से मिलने आता ही था, क्योंकि उस समय ‌‘इंडियन नेशनल काँग्रेस के नेता‌’ के रूप में खुद को दर्शानेवाले नेताओं पर से विश्वास काफी कम हो गया था।

पूरे भारत में प्रभाव रखनेवाले बाल गंगाधर तिलकजी ही एकमात्र लोकप्रिय नेता थे। इसी लिए ब्रिटिश सरकार का सारा ध्यान लोकमान्य तिलकजी पर ही केंद्रित था।

तिलकजी सार्वजनिक रूप से कभी भी, ‌‘सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाओ‌’ ऐसा खुले तौर पर नहीं कहते थे, क्योंकि तिलकजी ने १८५८ के बाद भारतीयों के मन में बैठ चुकी ब्रिटिशों की दहशत को पहचान लिया था और इसलिए ‌‘पहले भारतीयों के मन से ब्रिटिशों के प्रति रहनेवाले भय को धीरे-धीरे कम करना‌’ यही मार्ग अपनाया। तिलकजी के दोनों समाचारपत्रों के लेख ब्रिटिश सरकार की अत्यंत तीखे शब्दों में ज़ोरदार आलोचना करते थे और सभाओं में दिये गये भाषणों में तिलकजी, ‌‘ब्रिटिश सरकार कैसे ज़ुल्म कर रही है‌’ इस बारे में तीव्र क्रोध व्यक्त करते थे और लोगों को, ‌‘ब्रिटिशों का विरोध करने के लिए सड़क पर उतरने‌’ की सलाह देते रहते थे।

१८९४ में बाल गंगाधर तिलकजी ने सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव शुरू किया। उनकी अपनी ही हवेली में सबसे बड़े गणेशोत्सव का आरंभ हुआ। इसका अनुकरण पुणे, मुंबई, नागपुर, नासिक, नगर, सातारा जैसे महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों में और आज के मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना, बंगाल, पंजाब और उत्तरप्रदेश में भी एक साल के भीतर ही हुआ।

गणेशोत्सव शुरू करने के पीछे तिलकजी के चार प्रमुख उद्देश्य थे। १) यह धार्मिक मामला होने के कारण, रानी के घोषणापत्र के अनुसार ब्रिटिश सरकार यह उत्सव रोक नहीं सकती थी और ‌‘गणपति‌’ ये देवता पूरे भारत में हर पूजा में और मंगल कार्य में भी प्रथम स्थान पर थे।

२) उत्सव के दस दिनों में दोपहर और शाम को विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाने लगे। उदाहरणार्थ - छोटे बच्चों के पौराणिक विषयों पर नाटक, विभिन्न भजन मंडलों के भजन कार्यक्रम, खो-खो, हुतूतू (कबड्डी), लगोरी जैसे खेल, दौड़ने और लाँग जंप की प्रतियोगिताएँ, नकलें और जादू के प्रयोग। ये कार्यक्रम देखने के लिए और गणपति के दर्शन के लिए अक्षरश: बेतहाशा भीड़ होने लगी। इन कार्यक्रमों के लिए आये लोग आपस में विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे। तिलकजी के, तिलकजी ने ही तैयार किये हुए उत्साही, युवा कार्यकर्ता ऐसे लोगों के बीच घूमकर ‌‘ब्रिटिश कैसे बुरे हैं और भारतीय संस्कृति कैसे श्रेष्ठ है‌’ इन तत्त्वों से संबंधित बातचीत को अर्थात्‌‍ चर्चाओं को प्रेरित करने लगे।

लगभग ३०-३५ वर्ष बाद भारतीय इन विषयों पर खुले तौर पर बात करने लगे और अनेक लोग अपने मन का डर त्यागकर तिलकजी के कार्य में शामिल होने के लिए तैयार होने लगे।

३) इस उत्सव के निमित्त से लोकमान्य तिलकजी ने अपने सहयोगियों के माध्यम से उत्सव निधि को इकट्ठा करना शुरू किया और इन पैसों का उपयोग जगह-जगह अखाड़े और व्यायामशालाएँ खोलना, मैदानी खेलों की प्रतियोगिताएँ आयोजित करना और मुख्य रूप से क्रांतिकारियों की सहायता करना इसके लिए होने लगा। इससे महाराष्ट्र, बंगाल और पंजाब में क्रांतिकारियों के नये-नये समूह तैयार होने लगे।

पंजाब से लाला लजपतराय और बंगाल से बिपिनचंद्र पाल ऐसे दो शेर तिलकजी के साथी बने और पूरे भारत में ‌‘भारत-त्रिमूर्ति‌’ अर्थात्‌‍ ‌‘लाल-बाल-पाल‌’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए।

४) इस गणेशोत्सव के कार्य में विभिन्न व्याख्यानमालाएँ (भाषणों की शृंखला) शुरू की गयीं और इसलिए अनेक लोगों को खुले मैदान में आकर भाषण सुनने की आदत पड़ गयी। ‌‘सामान्य व्यक्ति को डर न लगे‌’ इसलिए पहले वर्ष व्याख्यान बिलकुल सामान्य विषयों पर रखे गए। उदाहरणार्थ - शिवाजी महाराज और उनका पराक्रम, महाभारत का युद्ध और गीता, आदिशंकराचार्य और उनका कार्य, विभिन्न व्रत और उनका माहात्म्य और रामायण की कथाएँ। इन रामायण-कथाओं में से, तिलकजी द्वारा विशेष रूप से चुने गए रामायण-कथाकार, रावण को ब्रिटिशों के मूल स्रोत के रूप में खुले तौर पर दर्शाने लगे। परंतु वे ‌‘ब्रिटिश‌’ इस नाम का उच्चारण नहीं कर रहे थे।

एक ही वर्ष में लोगों का, सार्वजनिक सभाओं में उपस्थित रहने का डर पूरी तरह समाप्त हो गया और इससे प्रेरणा लेकर तिलकजी ने १८९५ में ‌‘श्रीशिवाजीमहाराज फंड कमिटी‌’ नाम की समिति स्थापित की। इसका प्रमुख उद्देश्य १) शिवाजी महाराज की जयंती सार्वजनिक रूप से मनाना और ‌‘छत्रपति शिवाजी महाराज‌’ इस नाम का ध्वज बहुत ही ऊँचा फहराना यह था। २) दूसरा उद्देश्य, छत्रपति शिवाजी महाराज की रायगढ़ स्थित समाधि की उत्तम रूप से देखभाल करना और रायगढ़ और राजगढ़ पर युवा स्त्री-पुरुषों की शैक्षणिक (एज्युकेशनल) यात्राएँ आयोजित करना यह था। 

ऐसी हर यात्रा के समय तिलकजी का एक-एक कट्टर एवं जानकार कार्यकर्ता स्वयं उपस्थित रहता था और उन लोगों को, छत्रपति शिवाजी महाराज ने लड़ी प्रचंड लड़ाई के बारे में विस्तार से बताता था।

उसमें भी मुख्य रुख रहता था, विकराल रूप से फैले हुए और पाँच लाख से अधिक सेना वाले मुग़ल बादशाह की ओर और बीजापुर के आदिलशाह से छत्रपति और उनके सैनिक कैसे लड़े और जीते, इस ओर ही।  

इन यात्राओं और ऐसे कार्यक्रमों से सामान्य भारतीयों के मन में रहनेवाली ब्रिटिशों की दहशत धीरे-धीरे कम होने लगी और तिलकजी के विभिन्न कार्यक्रमों में भारी संख्या में भारतीय सम्मिलित होने लगे।

और २२ जून १८९७ की सुबह हुई। गुढ़ीपाड़वा के दिन ही कार्य का शुभारंभ कर चुके चाफेकर बंधुओं ने, प्लेग की महामारी का फायदा उठाकर भयंकर अत्याचार करनेवाले ‌‘कमिशनर रँड‌’ (Rand) और ‌‘लेफ्टनंट आयर्स्ट‌’ (Ayerst) पर गोलियाँ दाग दीं और उनके मृत शरीर सड़क पर पड़े हुए सारी जनता ने देखे। 

इस घटना के फोटोग्राफ्स और खबरें भारत की हर भाषा के समाचारपत्रों, साप्ताहिकों और मासिकों में तुरंत छापे गये।  

इस घटना से भारत का हर ब्रिटिश ऑफिसर, यहाँ तक कि व्हॉईसरॉय भी बुरी तरह हिल गया था और ब्रिटन में बैठी ब्रिटिश गव्हर्नमेंट को बहुत बड़ा झटका लगा था।

‌‘इन हत्याओं के पीछे लोकमान्य तिलकजी का हाथ है‌’ इस बारे में ब्रिटिश सरकार को यक़ीन हो चुका था, परंतु उन्हें एक भी सबूत मिल नहीं सका। क्योंकि चाफेकर बंधु तिलकजी से हमेशा मिलते थे, ग्रामीण, अशिक्षित किसानों के भेस में ही। चाफेकर बंधुओं के अन्य सहयोगी तिलकजी से तेली, तांबोली, सुतार (पांचाल), धनगर, कुम्हार, लोहार, माली और समारोह के लिए फूलों की सजावट करने वाले फूलवाले ऐसे भेस में मिलते थे।

और तिलकजी के पास ऐसी अठारह विभिन्न जातियों का हमेशा ही आना-जाना लगा रहता था। इसी वजह से तिलकजी को ब्रिटिश ऑफिसर्स और काँग्रेसी नरम दल ‌‘तेल्यातांबोळ्यांचा पुढारी‌’ अर्थात्‌‍ ‌‘गरीब कामगारों का नेता‌’ ऐसा कहकर उनका उपहास करते थे। परंतु तिलकजी ने इसे उपहास न मानकर, अपना गौरव ही माना। 

इस भीड़ के माध्यम से तिलकजी के कार्य ने ज़ोरदार गति पकड़ी। चाफेकर बंधुओं के गुप्त रूप से रहने के एक स्थान में ब्रिटिशों को तिलकजी का भगवद्‍गीता पर लिखा वह लेख मिला, जिसमें ‌‘ज़ुल्मी अन्याय करने वालों को मार डालना यह पाप नहीं है‌’ ऐसा लोकमान्यजी ने अपने शब्दों में प्रस्तुत किया था।

सारे सूत्र जुड़ रहे थे। परंतु क्रांतिकारी भी मज़बूती से मौन ही रहे और चाफेकरों के अन्य सहयोगियों ने सारे सबूत नष्ट कर दिये थे, इस कारण ब्रिटिश सरकार तिलकजी को फाँसी पर चढ़ा नहीं सकी। 

(कथा जारी है)