भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 25

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 25

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सन 1879 में बाल गंगाधर तिलक मुंबई के गव्हर्न्मेंट लॉ कॉलेज से एल.एल.बी. की डीग्री हासिल कर पुणे लौटे और फिर उनका कार्य अधिक तेज़ी से आगे बढ़ने लगा और उनके कार्य का विस्तार भी कई दिशाओं में और अलग अलग रास्तों से होने लगा।

पहली बार उन्होंने सन 1880 में ‌‘न्यू इंग्लिश स्कूल फॉर सेकंडरी एज्युकेशन‌’ इस स्कूल की शुरुआत की। विष्णुशास्त्री चिपळूणकर, महादेव नामजोशी और गोपाळ आगरकर ये तिलकजी के स्कूल के निर्माण में उनके मुख्य सहयोगी थे।

 केवल स्कूल-कॉलेजेस शुरू करना, लोगों को अच्छी तरह शिक्षित करना ऐसे सीमित विचारों से लोकमान्यजी ने उस स्कूल की शुरुआत नहीं की थी। ब्रिटिशों द्वारा शुरू की गयी शिक्षा-प्रणालि (Education System) को ही तिलकजी बदलना चाहते थे। भारतीयों को भारत का गलत इतिहास ब्रिटीश सिखा रहे थे और विभिन्न रास्तों से भारतीयों के संस्कृति-मूल्यों (Cultural Principle & Values) पर निरंतर प्रहार कर रहे थे और यदि इसे रोका नहीं गया तो ब्रिटिशों की मुट्ठी से भारत कभी भी छूट नहीं सकता, यह तिलकजी की दृढ राय थी।

स्कूल को प्रचंड सफलता हासिल हुई और इस कारण तिलकजी ने अपने कई सहयोगियों की सहायता से सन 1884 में ‌‘डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी‌’ (डेक्कन शिक्षा संस्थान) की स्थापना की और एक वर्ष के भीतर पुणे के विख्यात ‌‘फर्ग्युसन कॉलेज‌’ का निर्माण हुआ।

परन्तु केवल चार वर्षों में, तिलकजी को लगने लगा कि ‌‘केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित रहना उन्हें मर्यादित कर रहा है‌’ और स्कूल, कॉलेज और शिक्षा संस्थान अपने सहयोगियों के हाथों में सौंपकर उन्होंने सन 1890 में अधिक व्यापक कार्य करना ज़ोरदार तरीके से शुरू किया। 

 इस कारण तिलकजी के लिए सर्वत्र विचरण करना आसान हो गया। उनका गहन अध्ययन, भारतीय और जागतिक इतिहास का गहरा ज्ञान, अचूक एवं अत्यन्त प्रभावी वक्तृत्व और हृदय को भेदनेवाला लेखन इस कारण तिलकजी के भाषण सुनने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। भले ही उस समय तक पुणे यही उनका (तिलकजी का) मुख्यालय था, फिर भी धीरे धीरे उन्हें अन्य स्थानों पर स्थित विभिन्न विद्वानों द्वारा, देशसेवी संगठनों द्वारा व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया जाने लगा और तिलकजी ने पल भर के लिए भी विश्राम न करते हुए अपने देशभ्रमण का आरंभ किया।

सन 1890 में तिलकजी ने ‌‘इंडियन नॅशनल काँग्रेस‌’ में प्रवेश किया। लेकिन इंडियन नॅशनल काँग्रेस का कार्य देखकर लोकमान्य तिलक बहुत निराश हो गये और इस कारण उदास हो चुके तिलकजी ने अपने विचार रखना आरंभ किया, “सर ह्यूम इस ब्रिटीश अफसर द्वारा शुरू की गयी  इंडियन नॅशनल काँग्रेस, ब्रिटिश जैसा चाहते हैं उस तरह से अथवा ब्रिटिशों को नापसंद न हो इसी तरीके से कार्य कर रही है और यह कार्य भी केवल ‌‘सरकार को खत लिखना, सरकार को विनतिपत्र भेजना और हर वर्ष अधिवेशन का आयोजन करना‌’ इतने तक ही सीमित हो चुका है। ऐसे बहुत ही बेअसर, मृदू (Soft) इलाज से ‌‘ब्रिटीश राज‌’ नाम की बीमारी ठीक होनेवाली नहीं है। उसके लिए हर एक भारतीय को स्वयं के अधिकारों के लिए ब्रिटीश सरकार के साथ बैर मोल लेना चाहिए और बैर उग्र ही होना चाहिए। (Hardliner)”

काँग्रेस में होनेवाला तिलकजी का वर्चस्व और प्रभाव दिनबदिन बढ़ता ही गया और इस कारण ब्रिटिशों से मित्रता रखकर और प्रत्यक्ष कार्य में शामिल न होते हुए केवल खोखले भाषण देकर शेखी बघारनेवाले नेताओं का गुट ‌‘नरम‌’ दल (Softliners) के तौर पर जाना जाने लगा और लोगों से भी दूर जाने लगा; वहीं, लोकमान्य तिलक का ‌‘गरम‌’ दल अत्यधिक ज़ोर से और कृतिशील तरीके से बढ़ने लगा था। इस दल के सदस्य भी नरम दल की अपेक्षा पाँच गुना अधिक थे।

 नामदार गोखले आदि नरम दल के नेताओं ने फिर धीरे धीरे तिलकजी का विरोध करना शुरू किया। दूसरी तरफ़ तिलकजी के पुराने सहयोगी और मित्र गोपाळराव आगरकर ‌‘स्वतंत्रता से पहले सामाजिक सुधार‌’ इस तत्त्व का पुरस्कार कर लोकमान्य से दूर चले गये और तिलकजी का प्रकट रूप से विरोध करने लगे।

पहले कुछ दिनों तक तिलकजी ने इन दोनों दलों को सुव्यवस्थित रूप से प्रत्युत्तर (जवाब) दिये। लेकिन जल्द ही तिलकजी की समझ में आ गया कि उनका बहुत अधिक समय इन लोगों का विरोध करने में व्यय हो रहा है और यह बात निरर्थक एवं निरुपयोगी है। उन्होंने उनके विरोध की दिशा पूरी तरह केवल ब्रिटीश सरकार पर ही केंद्रित रखी थी।

तिलकजी के भाषण मराठी, अँग्रेज़ी और कुछ स्थानों पर हिंदी में भी होते थे। दक्षिण भारत में तिलकजी के अँग्रेज़ी के भाषण, उस संबंधित प्रदेश की भाषा में ट्रान्सलेट करने का काम कोई मुख्य कार्यकर्ता करता था और इस तरह बहुत बड़े समुदाय को, तिलकजी जब सामने खड़े होकर भाषण करते थे, तब उनका भाषण प्रादेशिक भाषा में प्राप्त होने लगा।

तिलकजी द्वारा शुरू किये गये दो समाचारपत्र ‌‘केसरी‌’ (मराठी) और ‌‘मराठा‌’ (English) ये दूर दूर तक पहुँचने लगे। इन दोनों समाचारपत्रों को ब्रिटीश सरकार ‌‘तिलकजी की तोपें’ मानते थे और उस समय के व्हाईसरॉय ने तो इन शब्दों में लंडन खत भेजा था कि ‌‘बाल गंगाधर तिलक ये भारतीय असन्तोष के एकमात्र जनक हैं।‌’ (Tilak is the father of Indian unrest and freedom fight.) 

इस कारण ब्रिटिशों के कई गुप्तचर तिलकजी का पीछा करने के लिए कार्यरत हुए। उन्हें झाँसा देकर, जिनसे चाहिए उन लोगों से मिलने के लिए तिलकजी कई और विभिन्न मार्गों का अवलंबन कर रहे थे।  

इसके लिए उन्होंने तय किया कि वे अपने अख़बार के कार्यालय में और अपने निवासस्थान में भी विभिन्न लोगों की ज़बरदस्त चहल-पहल रखेंगे। परंतु तिलकजी के सहयोगियों ने उनसे सुस्पष्ट शब्दों में कहा, “आपको उसके लिए कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। केवल महाराष्ट्र से ही नहीं, बल्कि भारत के हर प्रांत से बहुत बड़े जनसमूह तिलकजी से मिलने के लिए या कम से कम उनके अख़बारों के कार्यालय देखने के लिए लगातार अनुमति माँगते रहते हैं। उन्हें ‌‘हाँ` कह दिया जाये तो भी काम हो जायेगा।” और वही हुआ। लोकमान्यजी के कार्यालय और कार्यकेंद्र पर लोगों की भीड़ उमड़ने लगी और तिलकजी को उस भीड़ की आड़ में किसी से भी मिलना संभव होने लगा और तिलकजी के मन की क्रांतिकारी योजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए उत्सुक और बलिदान के लिए तैयार रहने वाले युवाओं से मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हो गया।

1895-96 में मुंबई में शुरू हुई प्लेग की महामारी पुणे में भी फैलने लगी और उस महामारी को रोकने का बहाना बनाकर ब्रिटिश सरकार और उनके भारतीय एजंट्‌‍स्‌‍ हर इलाके में ज़बरदस्ती करने लगे। लोगों को, ख़ासकर तिलकजी के समर्थकों को गाँव से बाहर खदेड़ दिया जाने लगा। ब्रिटिश पुलिस दल और सेना को किसी के भी घर में अवैध रूप से घुसकर कुछ भी तोड़फोड़ करने, मारपीट करने का अधिकार ही दे दिया गया था और इसके ख़िलाफ़ शिकायत करने वाले को तुरंत गिरफ़्तार करके एक-आध घंटे की कोर्ट की सुनवाई के बाद जेल में डाल दिया जाता था।

लोगों की यह दुर्दशा देखकर और ब्रिटिशों की क्रूरता देखकर लोकमान्य तिलकजी क्रुद्ध हो उठे। यह महामारी सिर्फ़ मुंबई-पुणे में ही नहीं, बल्कि भारत में कई स्थानों पर फैली हुई थी और वहाँ भी ब्रिटिश इसी तरह का व्यवहार कर रहे थे।

परिणामस्वरूप, तिलकजी की दो तोपें ‌‘केसरी‌’ और ‌‘मराठा‌’ ब्रिटिश अत्याचारियों के ख़िलाफ़ गरजने और दहाड़ने लगीं।

और तिलकजी ने भगवद्‌गीता का संदर्भ लेते हुए अपने लेखन से लोगों से सुस्पष्ट रूप से कहा - ‌‘अन्याय करने वाले सत्ताधीशों का विरोध करने या उन्हें मार डालने (To Kill) से कर्ता को दोष या पाप नहीं लगता।‌’

तिलकजी के लगातार दौरों के कारण तिलकजी का पक्ष और विचार भारत भर में फैलने लगे और 1897 की गुढ़ीपाड़वा के दिन दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव हरि चाफेकर, ये तीन भाई तिलकजी से मिलने आए। तिलकजी के साथ हुई पहली मुलाक़ात से ही ये चाफेकर बंधु ज़बरदस्त रूप से प्रभावित हुए और 1858 में बुझाया गया सशस्त्र क्रांति के मार्ग का एक बार पुन: धैर्यपूर्वक निर्माण किया जाने लगा।

(कथा जारी है)