भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 24

“बाल गंगाधर तिलक ये बचपन से ही अत्यधिक स्वतंत्र विचारों के, लड़ने का प्रण लेनेवाले और अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े रहनेवाले थे।
वे जब १६ साल के थे, तब उनके पिता गंगाधर तिलक का छोटी सी बीमारी से सन १८७२ में देहान्त हो गया। तब बाल गंगाधर तिलक की उम्र केवल १६ वर्ष थीं और उनका विवाह भी हो गया था। उनकी पत्नी का मायके का नाम ‘तापीबाई’ था और ससुराल का नाम ‘सत्यभामाबाई’ था।
लोकमान्य का विवाह होने के बाद मात्र छह महीने के भीतर ही गंगाधरराव तिलक का देहान्त हो गया, इस कारण उनके कुछ आप्त (रिश्तेदार) और कुछ ग्रामस्थ (गाँववाले) सत्यभामाबाई को दोष देने लगे। उनके विवाह कर तिलकजी के घर आने के बाद हुए अपशगुन के कारण ही उनके घर (तिलकजी के घर) आने के बाद एक साल के भीतर ही ससुरजी की मृत्यु हुई। उस ज़माने में इस तरह की गलत मान्यताएँ भारत में सर्वत्र फैली हुई थीं और ऐसी घटनाओं में उलझी महिला को ‘मनहूस’ (जिसके कहीं पहुँचते ही तबाही-बरबादी आ जाये ऐसी), अशुभसूचक, कुलक्षणी और बुरा शगुन ले आनेवाली’ कहकर उन्हें नीचा दिखाया जाता था।

यह बात लोकमान्य के, उनके पिता की तेरहवीं का कार्य करते समय विशेष रूप से ध्यान में आयी; क्योंकि उस दिन सत्यभामाबाई जब खाना परोसने आयीं, तब कोई भी, भोजन का कोई भी पदार्थ उनके हाथों से थाली में परोस नहीं ले रहा था और वहीं (खाने की) चीज़, वहीं (भोजन का) पदार्थ अन्य कोई महिला परोसने के लिए ले आती थी, तो वह उसके हाथों से अपनी थाली में परोस लेते थे।
लोकमान्य स्वयं भी भोजन करने बैठे लोगों की पंक्ति में खाना खाने बैठे थे, क्योंकि मृत व्यक्ति के करीबी आप्त (रिश्तेदार) का, विशेष रूप से परिवार के सदस्य का तेरहवीं के समय के भोजन की पंक्ति में होना आवश्यक होता था। उस व्यक्ति द्वारा पहला निवाला ग्रहण किये जाने के बाद ही अन्य व्यक्ति भोजन करना शुरू करते थे। लोकमान्य की बारीक नज़र ने सत्यभामाबाई की विवशता देखी। लेकिन एक तो उनकी खुद की उम्र बहुत छोटी थी और ऐसे विचार होनेवालों की संख्या बहुत अधिक थी। तिलकजी ने किसी को भी आहत किये बिना इस प्रसंग में समस्या का समाधान निकाला।
लोकमान्य ने, एक कोने में मायूस होकर खड़ी हुई १४ साल की सत्यभामाबाई को आँखों से ही समझाया और वडे परोसने के लिए आने का इशारा किया। वे जब वडे परोसने के लिए आयीं, तब तिलकजी ने एकदम शांति से अपने पत्तल (पत्तों से बनी थाली) पाँच-छह वडे परोस लिये और वह भी सत्यभामाबाई के हाथों से ही।
पहले वे बहुत ही डरी हुई थीं, उनका हाथ काँप रहा था। लेकिन तिलकजी ने बिलकुल ज़ोरदार आवाज़ में भोजन की भरी पंक्ति में कहा कि “मैं बिना वजह की गलतफहमियों और अंधश्रद्धाओं को तनिक भी महत्त्व नहीं देता। मेरे पिता हमारा विवाह तय होने से पहले से ही बीमार चल रहे थे। आपके गृहप्रवेश (इस घर में आ जाने) के कारण कुछ भी अशुभ नहीं हुआ है।”
तिलकजी द्वारा इन शब्दों का सुस्पष्ट रूप से उच्चारण किये जाने के बाद अन्य भी कुछ समविचारी लोगों ने, सत्यभामाबाई से जानबूझकर वडे माँगकर परोस लिये। उनकी (तिलकजी की) ज़ोरदार आवाज़ और विचारों की स्पष्टता का यह परिणाम हुआ कि अन्य कोई भी आपत्ति नहीं उठा सका।
उस रात अपने मित्रों के साथ इसी विषय पर बातें कर रहे तिलकजी को, उनके मित्रों ने बातों बातों में यह एहसास करवाया - “बाल! तुम्हारा निश्चयी चेहरा, तुम्हारी ज़ोरदार आवाज़ और विचारों की सुस्पष्टता इनके सामने बिलकुल दुराग्रही और कर्मठ (रूढ़ीनिष्ठ) रहनेवाले विरोधक भी चुप ही हो गये। तुम आगे चलकर बड़े नेता बन सकते हो।” तिलकजी इस बात पर केवल मुस्कुराये और कहा, “इतनी सी छोटी बात से तुमने मुझे एकदम भारत का नेता बना दिया। मैं तो इस गाँव का केवल मॅट्रिक पास हुआ लड़का हूँ।”
उतने में तिलकजी के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें शाबाशी देते हुए, तिलकजी के पीछे से आगे आये हुए उनके अध्यापक चिंतामणि बर्वे ने आगे बढ़ते हुए कहा, “बाल! तुम्हारे इन मित्रों का कहना बिलकुल सच है। यह प्रसंग जब घटित हुआ, तब मैं भी वहीं पर था। मैं पिछले २५ सालों से रत्नागिरी ज़िले के मुख्य स्कूल में अध्यापक के तौर पर पढ़ाता रहा हूँ और पिछले दो सालों से इस गाँव में स्वयं आया हूँ।
तुम्हारे जैसे आत्मसम्मानी स्वभाव का और सुस्पष्ट विचारों का एक भी छात्र (स्टुडंट) अथवा अध्यापक अथवा प्रौढ नागरिक नहीं दिखायी दिया। लोग घर में झगड़े बहुत करते हैं; परन्तु एक वैचारिक मुद्दे के बारे में दृढ़तापूर्वक विचार रखकर, सभी का विरोध करने का पैंतरा अपनानेवाला तुम्हारे अलावा अन्य कोई भी मुझे नहीं दिखायी दिया।
बाल! तुम सच में भारत के भाग्यविधाता बन सकते हो। मैं मन:पूर्वक कहता हूँ कि तुम रत्नागिरी छोड़कर पुणे अथवा मुंबई जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करो।
इन ब्रिटीश कॉलेजेस में सीखते समय विश्व की घटनाओं की जानकारी मिलने लगती है और इस कारण हमारे अनुभवविश्व का विस्तार होने लगता है।
साथ ही इन अँग्रेज़ी कॉलेजों में बड़े-बड़े ग्रंथालय (Libraries) हैं। उनमें होनेवाली पुस्तकें विश्व भर का ज्ञान देती हैं, ऐसा मैंने सुना है। तुम इन ग्रन्थों अध्ययन कर तुम्हारी इस आत्मसम्मानी वृत्ति को अधिक परिपक्व बना सकते हो।
ब्रिटिशों ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, रावसाहब पेशवा और तात्या टोपे के साथ क्या किया? तुम यह इतिहास जानते ही हो। मैंने ही तो तुम स्टुडंटस् को पिछले दो साल सिखाया है।
ब्रिटीश भारत को अक्षरश: लूट रहे हैं और भारतीय संस्कृति का भी हनन कर रहे हैं। तुम्हारे जैसे नेता की भारतीय जनता को अत्यधिक आवश्यकता है। हमारे राजा-महाराजा सीमित अधिकारों में खुश हैं और खुद को ब्रिटीश मानने लगे हैं।
लेकिन ध्यान में रखना कि तात्या टोपे को किस प्रकार फाँसी दी गयी, मंगल पांडे का भी वही हाल हुआ और वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई भी छल-कपट से मारी गयीं और उसके बाद आयी ब्रिटीश सरकार ने बदला लेने की भावना से, भारत के अलग अलग ज़िलों में कई स्वतंत्रता-सैनिकों को फाँसी पर चढ़ाया। इस कारण तुम अपना मार्ग सावधानी से सुनिश्चित करना, क्योंकि ब्रिटिशों की सत्ता बहुत ही ताकतवर बन चुकी है।”

बर्वे सर और बाल के मित्र वहाँ से चले जाते ही बाल गंगाधर तिलक अकेले ही आँगन में सोचते हुए बैठे थे। उन्हें बर्वे सर का कहा पूर्ण रूप से मान्य हो चुका था और उनके मन में अपने आगे के जीवन के बारे में अनेक विचार सुसूत्रता से आने लगे थे, क्योंकि तिलकजी के अपने मन में भी इसी प्रकार के विचार एक-दो वर्ष निरंतर आ रहे थे।
रात भर तिलकजी जागते ही रहे। उन्होंने पुणे जाने का निर्णय लिया और १८७३ में वे पुणे के डेक्कन कॉलेज के छात्र बन गये और उस कॉलेज से ही उन्होंने ‘बी.ए. मॅथेमॅटिक्स’ (फर्स्ट क्लास) यह डिग्री संपादित की।
तिलकजी डिग्री के लिए गणित का अध्ययन अवश्य कर रहे थे; परन्तु डेक्कन कॉलेज की समृद्ध लायब्ररी में बैठकर पॉलिटिक्स, फिलॉसॉफी इनके अध्ययन के साथ साथ संस्कृत ग्रन्थों का भी अध्ययन वे करते रहे।
उन्होंने १८७७ में ही एम.ए. में अॅडमिशन ली और अध्ययन शुरू किया। अध्ययन के अन्त में उनकी एक राय निश्चित हो चुकी थी - ‘धर्म, अध्यात्म और व्यावहारिक जीवन इन्हें एक-दूसरे से बिलकुल भी अलग नहीं किया जा सकता। केवल स्वयंकेन्द्रित वृत्ति से जीने के बजाय स्वयं के राष्ट्र को स्वयं का परिवार मानना आवश्यक होता है और इस समय इसी बात की अत्यधिक आवश्यकता है। देशसेवा के बाद की सीढ़ी है मानवता, सेवा अर्थात् दीनदुर्बलों की सेवा और सर्वोच्च सीढ़ी है व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, राष्ट्रसेवा और मानवसेवा इन सभी मार्गों पर चलते समय ही भगवान से अनुसन्धान साधना।’
तिलकजी ने ब्रिटीश प्रोफेसर्स और अन्य ब्रिटीश अधिकारियों का बर्ताव देखकर राजनीति में प्रवेश करने का निर्णय पक्का कर लिया था और इसलिए उन्होंने एम.ए. का अध्ययन अधूरा छोड़कर मुंबई के ‘गव्हर्न्मेंट लॉ कॉलेज’ में अॅडमिशन ली।”
(कथा जारी है)
