भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग – २

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भाग – २
लेखक – डॉ. अनिरुद्ध धै. जोशी
रामचंद्र अन्य दो ब्रिटीश अफसरों के साथ उस इलाके के जंगल का सर्वेक्षण (सर्व्हे) करने की आड़ में क्रांतिकारियों की खोज पिछले दो दिनों से कर रहा था। ज़ाहिर है कि रामचंद्र अपने पिता से पहले संपर्क करके उसके बाद ही छापा मारता था और इस कारण छिपे हुए क्रांतिकारियों को पहले ही सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जाता था। आज पास ही के गाँव में ज़ोरदार छापा मारा गया था; क्योंकि वैसी ही टीप (ख़बर) मिलने की बात खुद उन दो ब्रिटीश सहकर्मियों ने ही बतायी थी। ज़ाहिर है कि उन तक खबर पहुँचाने की योजना भी रामचंद्र के यानी मल्हारराव के लोगों ने ही बनायी थी

और यहाँ मल्हारराव के गाँव में यानी धारपुर में मल्हारराव का काम ज़ोर शोर से और बिलकुल दिनदहाड़े चल रहा था और शाम तक सुचारु रूप से संपन्न भी हो गया। सारा माल यानी पिस्तौल, छोटी बंदूकें, कारतूस और अन्य कुछ आवश्यक सामग्री बैलगाड़ियों से पुणे की दिशा में कब की रवाना हो चुकी थी। हर एक बैलगाड़ी का चालक एक-एक स्वतंत्रता-सेनानी ही था।
उन सभी बैलगाड़ियों में आम के पिटारे और टोकरियाँ, साथ ही अचार बनाने के लिए इस्तेमाल में लाये जानेवाले आम भी छोटी छोटी गोनियों में भरे हुए थे और उनकी आड़ में ही वास्तविक सामान भेजा गया था। हर एक चेक-नाके पर और चेक-पॉईंट पर, हर एक अफसर को आम, कैरियाँ अथवा पैसे इनमें से कुछ ना कुछ तो मिलता ही था। इस इलाके के ब्रिटीश अफसर जानते थे कि मल्हारराव केवल पैसों से अमीर नहीं हैं, बल्कि दिल से भी अमीर है और ब्रिटीश सरकार के साथ बहुत ईमानदार हैं और हमेशा ही ब्रिटीश अफसरों का उचित सम्मान करते हैं। इस कारण हर एक पॉईंट पर उस-उस अधिकारी को ‘कुछ ना कुछ भेंट मिलेगी’ इसकी जानकारी होती थी।
यह कोई आजकल की बात नहीं थी। सन 1928 से मल्हारराव ने योजनाबद्ध रूप से काम करके अपनी इस प्रकार की छबि निर्माण की थी। दूसरी तरफ हर रोज़ मल्हारराव के स्वामित्व में रहनेवाले विभिन्न स्थानों से कम से कम सौ बैलगाड़ियाँ तो कुछ ना कुछ माल लेकर बहुत दूर तक जाती थीं। उन बैलगाड़ियों की जाँच कर-करके ब्रिटीश अफसर, ब्रिटीश सार्जंट, भारतीय सिपाही भी ऊब गये थे और मल्हारराव की मुहर रहनेवाले कागज़ात दिखायी देने पर उन बैलगाड़ियों की तरफ कोई ध्यान तक नहीं देता था।
सबसे बेकार काम यह था, मल्हारराव की बैलगाड़ियों से कई बार ईंधन का कोयला, बालू, रेत, बजरी की मिट्टी, जांभा पत्थर (एक प्रकार का लाल रंग का प्राय: कोकण में पाया जानेवाला पत्थर), खड़ी (छोटे-छोटे टुकड़े किये हुए पत्थर), गोबर से बने उपले ऐसी चीज़ें भी भरभरकर भेजी जाती थीं और अहम बात यह थी कि बीच बीच में इस ऐसे सामान के साथ जंगल में मिलनेवाले विभिन्न प्रकार के गोंद होते थे और इन सभी की गंध और धूल ब्रिटिशों को ही नहीं, बल्कि भारतीय अफसरों और सिपाहियों को भी असहनीय होती थी। साथ ही उसमें कभी कभी काम लेने लायक बनाया हुआ जानवरों का चमड़ा भी होता था और अलग अलग तरह की नमकीन सूखी मछली भी होती थी। नमकीन सूखी मछली, काम लेने लायक बनाया हुआ चमड़ा और गोंद की गंध का पता चल जाते ही ब्रिटीश अफसर और सार्जंट्स, उन गाड़ियों से अक्षरश: दूर भागते थे।

केवल दो-चार भारतीय वंश के सिपाही मजबूरन्, अक्षरश: नाक को हाथ से ढककर स्टँप लगाने तक एक पल के लिए खड़े होते थे। ब्रिटीश उन भारतीय वंश के सिपाहियों को ‘सिपॉय’ इस प्रकार से संबोधित करते थे। ब्रिटीश उनके साथ बिलकुल हीन दर्जे का बर्ताव करते थे; परन्तु वेतन (सॅलरी) और अन्य अनेक सुविधाएँ (फॅसिलिटीज़) उन्हें प्राप्त होने के कारण सिपॉय बनने के लिए बहुत बड़ा वर्ग उत्सुक होता था।
उनमें से आधे से ज़्यादा सिपॉयों में, ‘स्वतंत्रता संग्राम क्यों है और क्या है’ इतना समझने तक की भी बुद्धि नहीं होती थी। ऐसे अधिकांश जन अशिक्षित (अनपढ़) या बिलकुल अल्पशिक्षित (कम पढ़े हुए) होते थे। ब्रिटिशों से नाराज़ तो होते थे, लेकिन पेट भरने हेतु और मज़े करने के लिए इस नौकरी को बनाये रखने के लिए उन्हें ब्रिटीश अफसरों को खुश रखना ही पड़ता था और उसके लिए ये भारतीय वंश के सिपॉय संदिग्ध स्वतंत्रता सेनानियों को पीटने में ज़ोर लगाते थे।
मल्हारराव ने रामचंद्र के साथ अच्छी तरह बात करके ऐसे कई भारतीय सिपॉयों को अपने साथ मज़बूती से बाँध लिया था।
उन पिता-पुत्र के पास पैसा अनगिनत था और भारतमाता की सेवा करने का जुनून था। मल्हारराव ने रामचंद्र की उम्र के और अपनी उम्र के कुछ खास दोस्तों को अपने गुप्त कार्य में शामिल कर लिया था। उनमें से कुछ तो इतने वृद्ध थे कि उन्हें देखकर किसी को भी शक नहीं होता कि वे स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के सहकर्मी हैं।

अहम बात यह थी कि वृद्ध और मध्यम आयु की महिलाओं को भी मल्हारराव ने इस कार्य में शामिल कर लिया था और वह भी वारकरी लोगों का आदर्श सामने रखकर ही - बिलकुल नामचीन प्रतिष्ठित घरों की महिलाओं से लेकर अशिक्षित (अनपढ़) महिलाओं तक विभिन्न जाति और जमात की महिलाओं को रामचंद्र की पत्नी ने यानी जानकीबाई ने तैयार किया था।
ऐसे वृद्ध पुरुष, सामान्य दिखनेवाले मज़दूर और इन विभिन्न जमात की महिलाओें को देखकर, ब्रिटीश अफसर ऐसी बैलगाड़ियों की जाँच करते ही नहीं थे, क्योंकि मान लीजिए, किसी वृद्ध की मृत्यु हो जाती और किसी ऊँचे घराने की महिला का अनादर हो जाता, तो पूरा समाज ब्रिटिशों के विरोध में जा सकता था और ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो, इसलिए सभी ब्रिटीश अधिकारियों को उनके वरिष्ठों से बार-बार चेतावनी दी जाती थी। इस कारण मल्हारराव और रामचंद्र का काम बिलकुल सुचारु रूप से होता था।
साथ ही मल्हारराव ठहरे बड़े धार्मिक! उन्हें ब्रिटीश अफसर जानते थे, ‘निरंतर भगवान का नाम लेनेवाले बहुत ही अमीर ज़मीनदार’ के रूप में ही। ये ब्रिटीश अफसर आपस में बातें करते समय मल्हारराव का उल्लेख, ‘चालाक बूढ़ा’ सारे पाप करके स्वर्ग की प्राप्ति करने के लिए भगवान का नाम लेता रहता है, इस तरह करते थे। कारण दो थे।
१) मल्हारराव अलग अलग स्थानों पर रहनेवाले, यहाँ तक कि छोटे छोटे गाँवों में रहनेवाले भी मंदिरों का जीर्णोद्धार (पुराने मंदिर की मरम्मत करना) करते थे और लगातार किसी ना किसी मंदिर में जाते थे और बहुत बड़ा दानधर्म करते थे।
इसी के साथ कई मंदिरों के पास उन्होंने कुएँ और छोटी-छोटी धर्मशालाएँ भी बनायी थीं।
२) वहीं, दूसरी तरफ़ वे बिना चूके, हर एक मेले में रहनेवाले तमाशे (महाराष्ट्र का एक लोकप्रिय नृत्यप्रकार) के स्थान पर जाते ही थे और उनकी हवेली में भी लावणी (महाराष्ट्र की एक लोकप्रिय संगीत शैली, जिसमें गायन और नृत्य होता है) के कार्यक्रम होते थे और वह भी खुले आम और बहुत बार।
वास्तव में, मल्हारराव को ऐसे कार्यक्रमों में बिलकुल भी रुचि नहीं थी, लेकिन मौजमस्ती करनेवाला व्यक्ति होने का नाटक अच्छे से करना आवश्यक था। कामवासना से भूखे ब्रिटीश अधिकारी उनसे (मल्हारराव से) दोस्ती कर ही लें, इसके लिए ऐसा बर्ताव करना आवश्यक था।
रामचंद्र को, सभी ब्रिटिशों में ‘रामचंद्रराव’ अथवा ‘धारपुरकर साहब’ इस नाम से जाना जाता था। उसकी पत्नी जानकीबाई का रहनसहन भी बड़े ओहदे पर रहनेवाले अधिकारी की पत्नी के जैसा ही था। उसे ‘सबसे फॅशनेबल महिला’ के रूप में पूरी मुंबई और पुणे पहचानता था। उसका उठना-बैठना भी ब्रिटीश अधिकारी और उनके परिवार, अमीर पारसी महिलाएँ और सरकार की मर्ज़ी सँभालनेवाले भारतीय अधिकारियों की पत्नियों में ही होता था।
जानकीबाई केवल इक्कीस वर्ष की थी, लेकिन उस ज़माने के लोगों को उसके बारे में आश्चर्य प्रतीत होता था, क्योंकि वह अस्खलित (Fluent) अँग्रेज़ी बोलती थी। गव्हर्नर की पत्नी यह जानकीबाई की खास सहेली थी। गव्हर्नर की यह मेमसाहब किसी भी समारोह में जानकीबाई के बिना जाती ही नहीं थी।
गाड़ियाँ उचित स्थान पर पहुँचने का संदेश मिल जाते ही मल्हारराव, अपने गाँव की बस्ती से बाहर रहनेवाले लकड़ी के गोदाम और कोयला बनाने की भट्टी की ओर रवाना हुए। यहाँ निरंतर धुआँ और धूल होने के कारण गाँववालों का आना-जाना भी नहीं होता था।
लेकिन पूरे गाँव को अच्छी तरह पता था कि इस गोदाम के सामने ही मल्हारराव के द्वारा जीर्णोद्धार किया गया (दर असल बनाया गया, निर्माण किया गया) ‘धारपुरेश्वर महादेव’ का मंदिर था और जिसमें शिवलिंग के साथ ही भगवान त्रिविक्रम के ‘हरिहर’ रूप की मूर्ति भी थी।
(कथा जारी है)

