भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग – १

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग – १

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू

 

 भारत के स्वतंत्रता संग्राम का जो इतिहास हमें सामान्यतः ज्ञात है, वह एक अत्यंत व्यापक और गहन महागाथा का मात्र एक छोटा-सा अंश है। कुछ सर्वपरिचित नामों और इतिहास में दर्ज गौरवशाली चरणों से परे भी एक विशाल, अनकहा इतिहास छिपा हुआ है—ऐसा इतिहास जिसे उन स्त्री-पुरुषों ने गढ़ा, जिनके त्याग किसी भी दृष्टि से कम नहीं थे; बल्कि अनेक बार वे त्याग दिव्य स्तर के थे। फिर भी न तो उनका उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में मिलता है और न ही उनका स्मरण समाज में किया जाता है।

 

दैनिक प्रत्यक्ष’ में प्रकाशित अपने शोधपूर्ण अग्रलेखों के माध्यम से डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी, इसी अज्ञात और अनकहे इतिहास को प्रकाश में लाते हैं। मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा और अदम्य साहस के साथ, समर्पित भाव से राष्ट्रकार्य में योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों, विचारकों तथा पर्दे के पीछे रहकर गुप्त रूप से स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने वाले व्यक्तियों के जीवन को वे इस अग्रलेख-श्रृंखला में उजागर करके हमारे सामने रखते हैं। कई बार सामान्य जनसमूह से ही उभरे हुए ये असामान्य व्यक्तित्व, समाज के लिए दीपस्तंभ के समान मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं। जैसे-जैसे यह इतिहास आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे असंख्य अपरिचित नाम सामने आते हैं — ऐसे व्यक्तित्व, जिनका जीवन - पराक्रम, त्याग और स्वतंत्रता-प्राप्ति के अडिग संकल्प से सुघटित हुआ था।

 

इन अग्रलेखों में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसी महान विभूतियों के साथ-साथ, उनके समान ही पराक्रमी सहयोगियों का भी परिचय मिलता है — ऐसे सहयोगी, जिनका शौर्य किसी भी प्रकार से कम नहीं था, किंतु जिनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हुए। इसके पश्चात यह इतिहास धीरे-धीरे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलकजी के कालखंड में प्रवेश करता है और उनकी सर्वपरिचित सार्वजनिक छवि से कहीं अधिक गहन एवं व्यापक उनके अज्ञात आयाम हमारे सामने आते हैं। आगे चलकर, तिलकजी से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने वाले असंख्य अल्पपरिचित क्रांतिकारी, संगठक और निष्ठावान कार्यकर्ता हमारे सामने आते हैं। उनके मौन त्याग, मानसिक एवं बौद्धिक संयम तथा निर्भीक कृतियों ने स्वतंत्रता संग्राम की रीढ़ को सुदृढ़ किया; किंतु तथाकथित इतिहासकारों की उपेक्षा के कारण इन सच्चे ‘अनाम नायकों’ का कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता।

 

यह केवल इतिहास का लेखा-जोखा नहीं है; बल्कि उन अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को अर्पित एक श्रद्धांजलि है, जिनके त्यागों पर भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पूरी संरचना खड़ी हुई। शौर्य, समर्पण और नैतिक बल से परिपूर्ण कथाओं से ओत-प्रोत यह इतिहास, हमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वास्तविक गहनता का नए सिरे से बोध कराता है और उन त्यागमूर्तियों के सामने नतमस्तक होने की प्रेरणा देता है, जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व पूर्णतः निरपेक्ष भाव से समर्पित कर दिया।

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भाग – १

लेखक – डॉ. अनिरुद्ध धै. जोशी 

 

मल्हारराव माथे पर आया हुआ पसीना पोंछते हुए खेत के छोर पर जाकर खड़े हो गये। आज दिन भर उन्हें बहुत ही काम करना पड़ा था। उनके खेत में काम करनेवाले लगभग सौ मज़दूर आज नहीं आये थे और फसल तैयार होकर फसल काटने का काम, मड़ाई (कटी फसल को झकझोरकर उसके पके दानों को अलग करने का काम), दँवरी (दानों को भूसे से अलग करने का काम) ये सारे काम तेज़ी से चल रहे थे। गेहूँ, बाजरा, मका इनके साथ ही मल्हारराव के खेतों में अरहर (तुअर), उड़द, मूँग, मटकी, चना आदि फसलें भी होती थीं। खरीफ फसलें यानी जून महीने में जिन्हें बोया जाता है ऐसी फसलें और रबी फसलें यानी नवंबर के बाद जिन्हें बोया जाता है ऐसी फसलें।

इसके अलावा मल्हारराव की बाग़ायती ज़मीन (जहाँ सिंचाई की सुविधा होती है, ऐसी ज़मीन) भी बहुत बड़ी थी। ड़ेढ सौ एकड़ का तो उनका आम का बग़ीचा ही था। इसके अलावा केले के बग़ीचे, अनार (पॉमग्रेनेट) के बग़ीचे, पपीते के बग़ीचे, अमरूद (ग्वाव्हा) के बग़ीचे ये करीब करीब आठ सौ एकड़ ज़मीन पर फैले थे। अन्य ज़मीनें भी थीं यानी पथरीली और बंजर रहनेवाली ज़मीनें भी कई जगह थीं, जहाँ घास उगायी जाती थी और उससे पशुखाद्य बनाकर वह पशुओं के लिए बेचा जाता था। सात जंगलों का स्वामित्व भी उनके पास था। उन जंगलों में रहनेवाले बड़े-बड़े पेड़ काटकर, उनसे लकड़ी के लट्ठे और तख्तियाँ बनाने के कारखाने भी मल्हारराव ने बनाये थे। ईंधन की लकड़ी (जलाने के लिए इस्तेमाल की जानेवाली, खाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जानेवाली लकड़ी) का मल्हारराव का व्यवसाय भी बिलकुल ज़ोरों से चल रहा था।

इसके अलावा दो सौ एकड़ ज़मीन पर गायों को, भैसों को, बकरियों को पाला गया था। दूध का धंधा भी बेहद फायदेमंद था और पिछले साल से रामचंद्र ने, मल्हारराव के इकलौते लाड़ले बेटे ने मुर्गियाँ पालने के लिए (पोल्ट्री फार्म के लिए) खास जगह खरीदी थी। वहाँ वैसी सारी व्यवस्था भी की थी और इसी क्षेत्र के (पोल्ट्री फार्म क्षेत्र के) एक व्यावसायिक के यहाँ नौकरी करनेवाले और उस नौकरी से अपमानित होकर बाहर निकले हुए गोविंददाजी नामक एक अनुभवी कर्मचारी को उसने वहाँ का प्रबंधक नियुक्त किया था।

आज थोड़ी गड़बड़ी हो गयी थी; क्योंकि उनके खेत में काम करनेवाले अधिकांश मज़दूर पास ही के एक गाँव से आते थे और उस गाँव में ब्रिटीश (अँग्रेज़) अफसर जाँच करने आये थे, इस कारण सभी को गाँव से बाहर निकलने की मनाही की गयी थी। वह क्रांतिकारियों का ही ज़माना था और मराठी भाषा बोलनेवाले कुछ युवा क्रांतिकारियों का उस गाँव में आना-जाना लगा रहता था, यह खबर किसी गद्दार (Traitor) ने ब्रिटीश शासकेों को दी थी। भगतसिंग को दो महीने पहले ही ब्रिटीश गव्हर्न्मेंट ने फाँसी दी थी और भारत के कोने कोने में युवाओं का गर्म खून खौल रहा था।

मल्हारराव को आज इसी कारण अधिक काम करना पड़ा था। उन्हें स्वयं को खेतों में उतरकर काम करना पड़ा था। उनका बेटा रामचंद्र पहले मुंबई की एक कॉटन मिल में वरिष्ठ अधिकारी के रूप में नौकरी कर रहा था। लेकिन उसकी बुद्धिमानी और योग्यता (क्वालिफिकेशन) देखकर ब्रिटीश गव्हर्नर ने रामचंद्र को गव्हर्न्मेंट सर्व्हिस के लिए चुना था। वह बड़ा गव्हर्न्मेंट ऑफिसर बन गया था। अधिकृत रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश का दक्षिण हिस्सा और कर्नाटक का उत्तर हिस्सा इन प्रदेशों का वन विभाग उसके अधिकार में था। वह उस विभाग का सर्वेसर्वा (जिसके हाथ में सारे अधिकार हो) था। वह डायरेक्ट गव्हर्नर को ही रिपोर्टिंग करता था। उसके और गव्हर्नर के बीच दूसरा कोई भी ब्रिटीश ऑफिसर नहीं था और भारतीय अधिकारी होने की संभावना ही नहीं थी।

रामचंद्र हमेशा दौरों पर जाता रहता था। मुंबई स्थित ‌‘कोट‌’ (फोर्ट) इलाके (परिसर) में गव्हर्न्मेंट ने उसे दिया हुआ बहुत बड़ा, दर असल विशाल बंगला था। गव्हर्नर से डायरेक्ट मुलाक़ात कर सकनेवाले केवल दो-तीन ही प्रांतीय अधिकारी थे। जिनमें रामचंद्र का नाम सबसे ऊपर था।

इतना ही नहीं, बल्कि पिछले चार वर्षों में उसके द्वारा किये गये विशेष कार्य के कारण इंडिया के व्हाईसरॉय (भारत में ब्रिटिशों का सर्वोच्च ऑफिसर) के साथ उसकी तीन बार मुलाक़ात हुई थी और वह भी जब वहाँ अन्य कोई उपस्थित नहीं था तब, व्हाईसरॉय के स्पेशल दालान में; व्हाईसरॉय, इस इलाके का गव्हर्नर और रामचंद्र इनकी मुलाक़ात। इस कारण रामचंद्र का अच्छा खासा प्रभाव उसके इलाके में तो था ही, साथ ही बहुत बड़े प्रमाण में भारत में अन्यत्र भी था।

केवल मल्हारराव ही जानते थे कि रामचंद्र के पास ऊपरी तौर पर केवल वन और कृषि विभाग था, परन्तु वास्तव में उसके पास उस इलाके में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को कमज़ोर बनाते जाने का काम था। 

जब यह विशेष कार्य रामचंद्र को सौंपा गया था, तब रामचंद्र ने उसके पिता को शीघ्रता से मुंबई बुला लिया था; क्योंकि मल्हारराव लोकमान्य तिलकजी के परमभक्त थे। स्वतंत्रता आंदोलन में भले ही मल्हारराव अपनी भूमिका ज़ाहिर नहीं कर रहे थे, मग़र फिर भी उस कार्य के लिए पैसों की आपूर्ति करना, गुप्त परिपत्रक प्रिंट करवाना, स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाले वीरों को गुप्त रूप से रहने के लिए जगह उपलब्ध कराना, उनके खान-पान और गुप्तता का खयाल रखना और मुख्य रूप से लोकमान्यजी के समाचारपत्र में लिखे हुए अग्रलेख हर रोज़ शाम के समय गाँववालों को पढ़कर सुनाना, ऐसे काम चल ही रहे थे।

लोकमान्यजी का सन १९२० में देहान्त हो जाने के बाद श्री. . चिं. केळकरजी ने उनके समाचारपत्रों का काम जारी रखा था। गांधीजी के अहिंसावादी विचारों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। सन १९२८ में हुई दांडीयात्रा में यानी नमक सत्याग्रह के आंदोलन में मल्हारराव शामिल भी हुए थे। लेकिन ‌‘यह ज़ुल्मी विदेशी सत्ता अहिंसा के मार्ग से आज़ादी देगी‌’, इस पर से मल्हारराव का भरोसा सन १९२८ में ही उठ चुका था; क्योंकि उनकी आँखों के सामने ही कई निहत्थे, बेगुनाह, मासूम मनुष्यों को, यहाँ तक कि बिलकुल वृद्ध और महिलाओं को भी ज़ख्मी होते हुए उन्होंने देखा था और योद्धाओं की परंपरा जिनके यहाँ थी, ऐसे मल्हारराव उस बात को सह नहीं पाये थे। 

परन्तु लोकमान्यजी का तो निधन हो चुका था। गांधीजी अहिंसा मार्ग पर अडीग थे। बंगाल और पंजाब में क्रांतिकारियों के विद्रोह हो रहे थे। लेकिन स्थानीय भारतीयों द्वारा की गयी गद्दारी के कारण सभी क्रांतिकारी पकड़े जा रहे थे और फाँसी दिये जा रहे थे अथवा सीधे सीधे ब्रिटिशों की गोलियों के शिकार हो रहे थे। 

यह देखकर मल्हारराव पिछले तीन वर्षों से सक्रिय संग्राम से दूर हो गये थे। उन्हें मार्ग नहीं मिल रहा था। वास्तव में उन्हें नेता नहीं मिल रहा था। रामचंद्र को यह गुप्त विशेष कार्य ब्रिटिशों के द्वारा सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद ही सौंपा गया था। ब्रिटिशों की रिपोर्ट में लिखा था - ‌रामचंद्र राजनीति से पूरी तरह अलिप्त है। उसके पिता मल्हारराव अत्यधिक अमीर ज़मीनदार, किसान और व्यावसायिक हैं और तिलकजी को पसंद करते थे। लेकिन फिलहाल वे राजनीति से दूर ही थे।‌’ इस रिपोर्ट के कारण ही रामचंद्र को यह ज़िम्मेदारी मिल पायी थी।

रामचंद्र ने थोड़े डर के साथ ही इस नयी ज़िम्मेदारी के बारे में, मल्हारराव के मुंबई आ जाते ही उन्हें बता दिया था। मल्हारराव गुस्सा हो जायेंगे, इस बात का रामचंद्र को पूरा यक़ीन था। उसे भी भारतमाता से द्रोह नहीं करना था। परन्तु इस ज़िम्मेदारी से यदि वह ‌‘इनकार‌’ कर देता, तो ब्रिटिशों का सिक्रेट बाहर न आ जाये, इसके लिए उसे जेल की हवा खानी पड़ सकती थी अथवा संभवत: मौत के घाट भी उतारा जा सकता था। 

मल्हारराव ने सब कुछ शांति से सुन लिया और वे आँखें बंद करके और गर्दन झुकाकर अपनी हमेशा की प्यारी आरामकुर्सी में शांति से बैठे रहे। वह पाँच मिनटों की पूरी शांति रामचंद्र  से सही नहीं जा रही थी। पाँच मिनट बाद मल्हारराव की आरामकुर्सी एक धीमी लय में डोलने लगी। उस ज़माने में डोलनेवाली आरामकुर्सियाँ होती थीं।

लगभग दस मिनट बाद मल्हारराव ने आँखें खोलीं और खड़े होकर उन्होंने रामचंद्र को कसकर गले लगाया, वन और कृषि विभाग भी अच्छी तरह सँभालना। वह भूमाता की रक्षा ही है और ब्रिटिशों से इस गुप्त ज़िम्मेदारी का भी अवश्य स्वीकार करना। लेकिन इस गुप्त ज़िम्मेदारी का फायदा हमारी भारतमाता के लिए ही होना चाहिए, देशभक्तों की सहायता करने के लिए ही होना चाहिए। भले ही इतिहास में तुम्हारा नाम दर्ज न भी किया जाये, मग़र स्वयंभगवान त्रिविक्रम के हृदय में तुम्हें अवश्य स्थान प्राप्त होगा। एक बात ध्यान में रखना। ‌‘वे‌’ एक ही सत्य हैं।” 

आज मल्हारराव खेत के बाँध पर बैठकर रामचंद्र के संदेश का इंतज़ार कर रहे थे। खेती का काम करनेवाले लगभग उन सौ मज़दूरों को गाँव में ही रोककर रखने की योजना भी मल्हारराव के द्वारा ही रामचंद्र को सुझायी गयी थी। पूरे पुलीस दल का ध्यान और बल उस पास के गाँव में ही केंद्रित होनेवाला था और मल्हारराव की आमराई से पिस्तौल और कारतूस (Cartridge) पुणे भेजे जानेवाले थे। (कथा जारी है)