भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 18

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 18

    काशीबाई ने दुल्हेराव के घर में अपनी आवाजाही जानबूझकर, सिर्फ उसके घर की महिलाएँ जहाँ तक विचरण करती थीं, वहीं तक सीमित रखी थी। क्योंकि दुल्हेराव बहुत ही शातिर था और उसने काशीबाई के साथ तीन महीने काम भी किया था। ऐसा शातिर, चालाक और लालची व्यक्ति उसे आसानी से पहचान सकेगा, इस बात का पूरा यक़ीन काशीबाई को था।

    लमाण महिलाएँ घरेलू दवाइयाँ और वनौषधि देतीं हैं और स्त्रियों के हाथ-पैर दर्द करना, कमर दर्द करना, सिर में दर्द करना और बालों में जुएँ होना इन समस्याओं के लिए अच्छा मर्दन (मालिश) करती हैं, यह सभी को पता होने के कारण काशीबाई और मोतीबाई को दुल्हेराव के घर में काफ़ी सारे काम मिलने लगे।

    दुल्हेराव की ग्यारह पत्नियाँ थीं और बिना शादी की अन्य चार स्त्रियों को उसने रखा था। इन पंद्रह स्त्रियों के आपस में झगड़े होते थे और उन झगड़ों का फ़ायदा उठाकर, महज़ पंद्रह दिनों में काशीबाई और मोतीबाई ने मिलकर दुल्हेराव के घर का कोना-कोना ज्ञात कर लिया और ‌‘दुल्हेराव कहाँ आता-जाता रहता है और उसके अन्य शौक क्या हैं‌’ इन बातों की भी जानकारी हासिल कर ली।

    सरदार मंजुनाथ पहाडी और मुंदरबेगम ने गाँव में जगह-जगह घूमकर, दुल्हेराव की ज़मीनें कहाँ-कहाँ हैं और गाँव के लोग कैसे हैं, यह बारीक़ी से जान लिया। उसमें से एक बात उजागर हुई कि दुल्हेराव ने जागिरदार बनने के बाद से ही यानी पिछले डेढ़ महीने में, गाँव के लोगों में ढेर सारी मिठाइयाँ, अनाज और वस्त्र बाँटे हैं और इस कारण पूरा गाँव उसके अधीन है। साथ ही, गाँव के सभी लोग दुल्हेराव के नज़दीकी और दूर के रिश्तेदार ही होने के कारण, वे दुल्हेराव की ही सहायता करेंगे, यह तय था।

    लेकिन एक जानकारी बहुत ही अचंभित कर देनेवाली थी। दुल्हेराव के उस निवासी घर में उसके नौकर बहुत सारे थे। लेकिन हथियारबंद सैनिक एक भी नहीं था। 

    काशीबाई ने रात की बैठक में सबसे कहा, “दुल्हेराव का घर मूलतः ही, पहले से ही किसी बड़ी हवेली की तरह ही है और गाँववाले उसके समर्थन में हैं और घर में लगभग चालीस से पचास पुरुष नौकर और तीस-चालीस महिला नौकर रहती हैं। रात को भी उनमें से आधे सेवक और सेविकाएँ दुल्हेराव की हवेली में ही रहते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हमने हमला किया, तो पूरा गाँव और सारे नौकर हमारे विरोध में लड़ सकते हैं और खुद दुल्हेराव के पास चार राइफलें हैं और उसके तीन भाई भी लड़ने में उस्ताद हैं। क्या किया जाये?” 

    मोतीबाई ने बहुत ही शांति से कहा, “हमें एक और हफ़्ता रुकना आवश्यक है। बेसब्री से काम नहीं चलेगा। गाँव के घर एक-दूसरे से सटे हुए हैं और कुल डेढ़ सौ (150) घरों से लगभग ढ़ाई सौ (250) पुरुष दुल्हेराव की सहायता के लिए आ सकते हैं और दुल्हेराव उसकी जागिरी में कहीं भी जाते समय कम से कम पच्चास पुरुष साथ लिये बगैर जाता ही नहीं और उस हर एक नौकर के पास कुछ ना कुछ हथियार होता ही है। हम सिर्फ़ 65 लोग हैं।” 

    कभी भी अपने मन का संतुलन बिगड़ने ना देनेवाले लालाभाऊ बक्षी ने आज पहली ही बार चिड़चिड़े स्वर में पूछा, “दुल्हेराव को अगर गुरिल्ला युद्धनीति से मारने की चाल है, तो वह मुझे बिलकुल भी मान्य नहीं है। हमारा हेतु यह है कि ‌‘इस गद्दार एहसानफरामोश को सब लोगों के समक्ष सज़ा मिलें और वह भी दर्दनाक तरीक़े से‌’। फिर चुपचाप मार देने से क्या हमारा हेतु पूरा होगा?” 

    कभी भी शांत और दृढ़निश्चयी रहनेवाले लालाभाऊ बक्षी को बेचैन हुआ देखकर मोतीबाई को कुछ शक़ हुआ। वे बैठक में से ही सरदार मंजुनाथ पहाडी समेत लालाभाऊ बक्षी को पास ही के तंबू में ले गयीं और उन्होंने लालाभाऊ से सम्मानपूर्वक पूछा, “आपके शौर्य और राजनयिक कुशलता के साथ साथ आपकी रानी लक्ष्मीबाई पर होनेवाली निष्ठा इनके बारे में हमें पूरा यक़ीन है ही। आप हमेशा सब्र से ही पेश आते हैं। लेकिन आपने अभी-अभी जो कहा, उससे मुझे पक्का लगने लगा है कि आप यह कार्य शीघ्र निपटाने की कोशिश में हैं और इसके पीछे एक ही कारण हो सकता है। वह कारण हो सकता है कि आपकी तबियत शायद बिगड़ती चली जा रही है। सच-सच बताइए, आपको रानी लक्ष्मीबाई की सौगन्ध है।”

    उनके इन शब्दों के साथ ही लालाभाऊ बक्षी की आँखों से आँसू बहने लगे, “हाँ। मेरी रीढ़ की हड्डी पर हुए तलवार के घाव का ज़ख़्म अभी तक गहरा है और उसमें से लगातार खून बहते रहता ही है। मुझे अधिक से अधिक कमज़ोरी महसूस होने लगी है और मरने से पहले मैं दुल्हेराव और स्मिथ को मौत के घाट उतारना चाहता ही हूँ।”

    सरदार मंजुनाथ पहाडी ने विनती करके अर्थात्‌‍ लालाभाऊ की उम्र का लिहाज़ करते हुए उनका ज़ख़्म देखा और वे सिटपिटा गये, “कैसे सह पाते हैं आप यह? ये कितने सारे कपड़े ज़ख़्म में ठूँस रखे हैं!”

    मोतीबाई ने काशीबाई और उनकी माँ गंगाबाई को बुला लिया। कोई भी नहीं जानता था, लेकिन गंगाबाई एक उत्कृष्ट एवं कुशल वैद्य स्त्री थीं। गंगाबाई ने ज़ख़्म में ठूँसे हुए कपड़े निकालकर बारीक़ी से देखा और कहा, “क्यों इतने दिन की देर लगायी? मेरे पास दवाइयाँ भी हैं और साथ ही मैं किसी भी ज़ख़्म पर टाँके लगाकर ज़ख़्म सिल भी सकती हूँ।”

    एक पल में लालाभाऊ और मंजुनाथ चौंककर और शक्की नज़र से गंगाबाई की ओर देखने लगे। उन्हें शांत करते हुए मोतीबाई ने कहा, “घरेलू वैद्यकीय ज्ञान गंगाबाई के पास पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आया है और टाँके लेने का काम उन्होंने एक ब्रिटीश डॉक्टर के पास काम करके प्राप्त किया है और वह भी रानी लक्ष्मीबाई के आदेशानुसार ही। इन्होंने फिर पाँच पुरुष और पाँच स्त्रियों को टाँके लेने में माहिर बनाया और उनकी बदौलत ही हम इतने दिनों तक क़िला सुरक्षित रख सके। रानी लक्ष्मीबाई के सात बहुत ही गहरे ज़ख़्मों पर भी टाँके लिये गये थे। लेकिन रानी लक्ष्मीबाई के पास समय कम होने के कारण उन्होंने इलाज में ज़्यादा समय नहीं गँवाया।” 

    तब जाकर लालाभाऊ इलाज करवाने के लिए तैयार हुए और सुबह तक लालाभाऊ बक्षी का आत्मविश्वास पूर्ववत्‌‍ हो चुका था।

    अगले ही दो-तीन दिनों में गाँव के लोगों के बारे में कई जानकारियाँ मिलती गयीं और उनमें से एक अहम बात थी कि गाँव के पुरुषों में कोई भी बुरी लत नहीं हैं और वे लंपट भी नहीं हैं। हाँ, वे लालची ज़रूर हैं और हर एक के मन में, दुल्हेराव की तरह ही ब्रिटिशों की मर्ज़ी रखकर अमीर बनने की मन्शा है।

    यह जानकारी मिलते ही सरदार मंजुनाथ पहाडी ने मुंदरबाई से मन्त्रणा की और वे ‌‘गाँव के बाहर रहनेवाले जंगल में शिकार के लिए आयी हुई ब्रिटीश अफ़सर‌’ बन गयीं और उनकी सेवा में उनके साथ लगभग दस भारतीय सैनिक भी थे। इन हमारे लमाणों की संख्या बढ़कर जल्द ही डेढ़ सौ तक पहुँच चुकी थी।

    जंगल के इस ब्रिटीश अफ़सर (पुरुष को) को खुश करने के लिए गाँव के पुरुष अलग-अलग प्रकार से सहायता करने लगे। मुंदरबाई के पास पुरुष की आवाज़ में बात करने का हुनर था। वे कदकाठी में अच्छी-ख़ासी ऊँची थीं, हट्टीकट्टी थीं और गोरीचिट्टी भी थीं।

    उसने चंद तीन दिनों में गाँववालों से बात करके यह ख़बर फैला दी कि ‌‘इस ब्रिटीश अफ़सर को दुल्हेराव पर नज़र रखने के लिए ही भेजा गया है और इस ब्रिटीश अफ़सर की सहायता करनेवाले को भरपूर ईनाम मिल सकता है। क्योंकि दुल्हेराव ने उस ब्रिटीश अफ़सर के बॉस की पत्नी का विनयभंग किया है।‌’

    महज़ चार-पाँच दिनों में हर एक गाँववाले को यह ख़बर समझ चुकी थी और कोई भी दुल्हेराव की सहायता करने के लिए जानेवाला नहीं था।

    सात दिन बाद पूर्णिमा की रात थी। उस रात सीधे-साधे, खुले आम दुल्हेराव की हवेली पर हमला करने का तय हुआ। लेकिन दुर्गादल की 35 सैनिक महिलाएँ अपने-अपने हथियारों के साथ बतौर ‌‘नोकरानी‌’ प्रवेश कर, हवेली में जगह-जगह पहले से ही छिपीं बैठीं रहनेवालीं थीं। हमला बाहर से भी होनेवाला था और हवेली के भीतर से भी।

    हर किसी के मन में वीरश्री का ज़ोरदार संचार हुआ था। लालाभाऊ बक्षी, मंजुनाथ पहाडी और मुंदरबाई एवं मोतीबाई ये तो हर एक पल जैसे-तैसे गुज़ार रहे थे।

    एक ही व्यक्ति बहुत ही शांत थी - काशीबाई कुंबिन। 

(कथा जारी है)