भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 19

हमारी लमाण बस्ती के स्त्री-पुरुष, दूध बेचने उस गाँव के लगभग हर एक घर में जाते थे। क्योंकि उनके पास के दूध में बूँद भर भी पानी मिलाया नहीं होता था और इसलिए गाँव के सभी को इन लमाणों के पास का दूध बहुत ही पसन्द आने लगा था।
काशीबाई अकेली ही शांति से दुल्हेराव की हवेली से बिलकुल नज़दीक होनेवाले एक झील के किनारे बैठी थीं। उनके मन में अनगिनत विचार उमड़ रहे थे। उन्हें किसी भी तरह से दुल्हेराव का घात तो करना ही था, लेकिन उनका असली निशाना था, ब्रिगेडियर स्मिथ। क्योंकि ब्रिगेडियर स्मिथ का निवास जब डेढ़ साल पहले झाँसी में था, उस समय वह झाँसी के कई निवासियों के साथ बहुत ही अच्छा रिश्ता बनाये था और उनमें से कुछ लोगों को उसने विभिन्न मार्गों से वश में कर लिया था और उन्हीं में से कुछ लोगों की सहायता से वह रानी लक्ष्मीबाई को युद्ध के व्यूह में इस तरह फँसाकर ऐसी जगह ले आया, जहाँ से वह रानी लक्ष्मीबाई को आसानी से मार सकता था। उस दुर्गम स्थान को उसने स्वयं ही खोज निकाला था और वहाँ बड़े-बड़े पत्थरों की विशाल रचना कर रखी थी। जैसे ही लक्ष्मीबाई उन पत्थरों के सामने आयीं, उन पत्थरों के पीछे छिपे हुए स्मिथ ने पत्थर पर लपककर, लक्ष्मीबाई की पीठ में तलवार आरपार भोंक दी। रानी लक्ष्मीबाई के प्रिय घोड़े की अर्थात् बादल की चारों टांगों में गोलियाँ इस ब्रिगेडियर स्मिथ ने खुद ही मारी थीं।
यह सारा समाचार काशीबाई को उनकी ‘सुंदरबाई’ नाम की एक ख़ास सहेली ने तीन दिन पहले ही दिया था।
ये सुंदरबाई हमेशा मुंदरबेगम यानी मुंदरखातुन के साथ ही सदैव विचरण करती थीं।
लेकिन लड़ाई के उस आख़िरी चरण में सुंदर ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिर गयीं और एक घोड़े की लात लगने के कारण उन पत्थरों के ढ़ेर की आड़ में जा गिरी थीं। उनके हाथ की तलवार दूर जाकर गिर जाने के कारण वे किसी मृत सैनिक का हथियार हासिल करने के लिए धीरे धीरे सरकते हुए आगे बढ़ रही थीं और उसी समय स्मिथ ने रानी लक्ष्मीबाई पर खुनी और कायर हमला किया।
दोनों पैरों से ज़ख़्मी हो चुकीं सुंदरबाई के लिए उठकर खड़ा रहना संभव ही नहीं हो रहा था और इस कारण वे बदले की भावना से अधिक ही खौलकर, फिर से उन पत्थरों के पीछे जाकर छिप गयीं और पूरे एक दिन तक वहीं छिपी रहीं। उसके बाद, अर्थात् ब्रिटीश सैनिक वहाँ से चले जाने के बाद सुंदरबाई अगली रात को रेंगते-रेंगते ही पास की एक आदिवासी बस्ती में गयीं और वहाँ पैरों का इलाज़ कर वे इन लोगों को ढूँढ़ते हुए उस लमाण बस्ती में तीन दिन पहले ही आ पहुँची थीं।
सुंदरबाई के लिए अभी भी दस-बीस कदमों से ज़्यादा चलना संभव नहीं हो रहा था और उनके मन में तो बदले की भावना अत्यधिक प्रबल थी। काशीबाई ने सुंदर को वचन दिया था कि वे स्वयं ही दुल्हेराव और स्मिथ इन दोनों को भी उनके घोर पापों की सज़ा देंगी।
काशीबाई आज झील के पास प्रतीक्षा कर रही थीं, ‘रामदीन वाल्मीकि’ की। वे ही सुंदरबाई को यहाँ ले आये थे और वे आज मध्यरात्रि के समय झील के पास आनेवाले थे, ब्रिगेडियर स्मिथ का पूरा अता-पता लगाकर।
रामदीन वाल्मीकि ये ‘शहीद मातादीन वाल्मीकि’ के ज्येष्ठ पुत्र थे। मातादीन वाल्मीकि ये मंगल पांडे की छावनी में साफसफाई का काम करनेवाले सेनाकर्मचारी थे। उन्होंने ही मंगल पांडे को, ब्रिटिशों से मिलनेवालीं नयी रायफलों के बारे में ‘कुछ तो संदेहास्पद बात है’ ऐसा बताया था और इसी कारण मंगल पांडे ने उन्हीं की सहायता से, कारतूसों के बारे में गहरी जानकारी हासिल की थी।
कई सैनिक मातादीन को ‘मातादीन भंगी’ ऐसा संबोधित करते थे, क्योंकि वे भंगीकाम (साफसफाई का काम) करते थे। लेकिन मंगल पांडे, इस घटना के बाद उन्हें ‘मातादीन वाल्मीकि’ कहकर बुलाने लगे। इन मातादीन को मंगल पांडे के साथ ही, ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ते समय ही ब्रिटिशों ने गिरफ़्तार किया था और आगे चलकर फाँसी पर चढ़ाया था।
इस कारण पिता के नक़्शेकदम पर चलते हुए रामदीन वाल्मीकि, पहले धनसिंह गुर्जर से जा मिले थे और धनसिंह गुर्जर की मृत्यु के बाद झाँसी की रानी की सेना में आकर दाखिल हुए थे और मोतीबाई तथा काशीबाई की सूचना के अनुसार ही ब्रिटीश छावनी में साफसफाई का काम कर रहे थे और मोतीबाई की ही योजना के अनुसार ब्रिगेडियर स्मिथ की छावनी में ‘सफाई कामगार’ के तौर पर कार्यरत थे।
काशीबाई बेसब्री से रामदीन वाल्मीकि की प्रतीक्षा कर रही थीं। ठीक मध्यरात्रि के समय रामदीन वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने ब्रिगेडियर स्मिथ की छावनी का अतापता विस्तारपूर्वक काशीबाई को समझाकर बताया।
काशीबाई ने उन्हें फिर से ब्रिगेडियर स्मिथ की छावनी में ही भेज दिया और पूर्णिमा की रात तक अर्थात् आठ दिनों तक स्मिथ की छावनी में ही उनकी प्रतीक्षा करने के लिए कहा।
पूर्णिमा की रात दुल्हेराव के घर में दुर्गादल की 40 स्त्रियाएँ कुळंबिणियों के भेस में घुसकर बैठी थीं। उसकी उस विशाल हवेली में कितने सारे नौकरचाकर हर रोज़ शामिल होते थे और इस कारण कितने भी लोग अंदर घुस सकते थे
और दूसरा अहम कारण यह था कि पूर्णिमा के दिन शाम को दुल्हेराव की पहली पत्नी के पहले पुत्र का नामकरण होनेवाला था और इसलिए भारी संख्या में रिश्तेदार अपने-अपने नौकरों और कुळंबिणियों के साथ ठहरने के लिए ही आये हुए थे।
रात को दुल्हेराव की हवेली में सब कुछ शान्त होने के बाद इन 200 लमाण स्त्री-पुरुषों ने, भीतर से और बाहर से एक ही समय ज़ोरदार हमला किया।
ज़ोरज़ोर से शंख फूँककर मोतीबाई और सरदार मंजुनाथ पहाडी ने सबको पहले पूरी तरह जगाया था। वे सोये हुए किसी को भी मारना नहीं चाहते थे। साथ ही, गाँववालों के लिए ‘ब्रिटीश अफ़सर’ रूपी मुंदरबेगम ने बताया हुआ संकेत था कि शंखनाद होने के बाद कोई भी दुल्हेराव की सहायता के लिए ना आयें।
इस हर एक लमाण स्त्री-पुरुष के पास कम से कम दो हथियार तो थे ही। लालाभाऊ बक्षी और मुंदरबाई के पास दो-दो रायफ़लें थीं और वे दोनों दुल्हेराव के लोगों को चुन-चुनकर मारनेवाले थे - केवल दुल्हेराव को छोड़कर।
ज़ोरदार घमासान जंग छिड़ गयी। दुल्हेराव के आये हुए रिश्तेदार, नौकर-चाकर भी इस ज़ोरदार हमले से डरकर भागने लगे। उसके जो नौकर और सिपाही लड़ने लगे, उनमें से हर एक को सपासप घाव करके मार गिराया गया।
अन्त में अकेला दुल्हेराव बचा और उसके हाथ-पैर बाँधकर रस्सी से खींचते-खींचते उसे उस हवेली के बहुत ही बड़े प्रवेशद्वार के सामने रहनेवाले एक विशाल वृक्ष की शाखा से लटकाया गया।
उसके शरीर पर हर एक जन एक-एक फटका मार रहा था और उस हर एक प्रहार के साथ उसका लटक रहा देह इधर-उधर झूल रहा था।
ज़ोर-ज़ोर से लेकिन अलग अंदाज़ में फिर एक बार शंख बजने लगे और इस संकेत के साथ गाँव के सारे गाँववाले वहाँ इकट्ठा हुए। हवेली में से दुल्हेराव की सभी स्त्रियाएँ यह सब कुछ देख ही रही थीं।
हमारा प्रत्येक लमाण सैनिक धीरे धीरे दुल्हेराव के देह में अपनी-अपनी तलवार की नोक बार-बार चुभोकर उसे तड़पाने लगा। तभी मोतीबाई ने खुद हाथ में कोड़ा उठाकर दुल्हेराव को कोड़े लगाना शुरू किया। दुल्हेराव की हुई यह हालत गाँववालों से देखी नहीं जा रही थी। लेकिन हमारे दो सौ हथियारबंद लमाणों को महज़ अधिक शस्त्र ही नहीं, बल्कि दुल्हेराव के घर के अस्तबल से एक-एक घोड़ा भी मिला था और इस घुड़सवार सेना का सामना करने की ताकत किसी में भी नहीं थी।
तीन घंटे तक उसे इस तरह बेहाल करने के बाद उसके पेट में स्वयं मोतीबाई ने और मुंदरबेगम ने तलवारें भोंककर उसका आँत-पोथरा बाहर निकाला और वे सभी लमाण सैनिक तेज़ी से वहाँ से निकलने लगे।
सबसे अन्त में निकले सरदार मंजुनाथ पहाडी ने अपनी दमदार आवाज़ में वहाँ के उपस्थितों से कहा कि ‘भारतमाता के साथ और रानी लक्ष्मीबाई के साथ गद्दारी करने की यह सज़ा है और ऐसी ही सज़ा हर एक गद्दार को मिलती रहेगी।’
इस तीव्र और सुस्पष्ट संदेश में इतनी ताकत थी कि उसने स्वयं ब्रिटीश व्हाईसरॉय को भी महज़ सात दिनों में उस स्थान पर आने के लिए विवश कर दिया।
हमारे लमाण सैनिक घोड़ों पर सवार होकर दौड़ते हुए जंगल में से स्मिथ की छावनी की दिशा में निकले थे। लेकिन सबके मन में एक ही सवाल था - ‘काशीबाई कहाँ हैं?’
(कथा जारी है)
