भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 17

मोतीबाई और सरदार मंजुनाथ पहाडी के नेतृत्व में ये सभी लोग लमाणी आदिवासियों के भेस में जंगल में से दूसरी दिशा में बाहर निकलने लगे। मोतीबाई ने लमाणों के वस्त्र, ऐन वक़्त पर उस ‘खून की घाटी’ के एक लमाणी जनजाति के गुट से प्राप्त किये थे और उसके बदले में उन्हें भरपूर धन भी दिया था और वे लमाण भी ब्रिटिशों की छावनी की विरुद्ध दिशा में ही प्रवास कर रहे होने के कारण किसी को उसकी चिन्ता नहीं थी।
लेकिन मोतीबाई अभी उतनी स्वस्थचित्त नहीं थीं। क्योंकि हालाँकि उनके पास लमाणों के वस्त्र और मोटे मणियों के अलंकार थे, मग़र उनके पास लमाणों के साथ हमेशा ही होनेवाले मवेशी जानवर नहीं थे और वह लमाण गुट अपने पास के मवेशी जानवर देने के लिए तैयार नहीं था। मोतीबाई और मुंदरबाई को मिलाकर ये बीस जन, लमाण स्त्री-पुरुषों के भेस में ‘पलधाडी’ गाँव की दिशा में रवाना हुए। उस गाँव जाना मोतीबाई ने क्यों तय किया, इसके बारे में किसी को भी जानकारी नहीं थी। लेकिन किसी ने भी कुछ पूछा नहीं।
भोर होने का समय हुआ ही था कि तभी ये बीस जन पलधाडी गाँव की सीमा तक आ पहुँचे। उस गाँव की सीमा से सटकर ही दुर्गादेवी का छोटा-सा मंदिर था और वह सभी के परिचय का था।
मोतीबाई ने सबको, इस लमाण गुट से मिली सामग्री के आधार पर, इस मंदिर के बाजू में ही पाँच तंबुओं का निर्माण करने के लिए कहा - बिलकुल असली लमाणों के तंबुओं की भाँति; लेकिन वे स्वयं किसी की तो राह देखते हुए अथवा किसी को तो खोजते हुए, उस मंदिर के पीछे ही रहनेवाली एक ऊँची शिला पर चढ़कर बैठ गयीं।
भोर ख़त्म होकर सुबह शुरू होने का समय नज़दीक आया था। पूरी तरह पौ फटने से पहले घोड़ों का प्रबंध करना आवश्यक था, यह हर कोई मानता था। लेकिन किसी को भी कोई भी मार्ग नहीं सूझ रहा था।
अन्य १९ जन लमाण तंबू बनाकर और उनमें लमाणों से ही लिये हुए मिट्टी के छोटे बर्तन, मटकियाँ और टोकरियाँ रखकर, लमाणों की तरह ही सुबह-सुबह चूल्हा जलाने के लिए ईंधन की लकड़ियाँ जमा करने लगे। सौभाग्यवश अभी कोई गाँववाला मंदिर की दिशा में नहीं आया था।
मोतीबाई उस ऊँची शिला से उन सबको इशारा करके नीचे उतरने लगीं और उतने में मंदिर की दाहिनी तरफ़ रहनेवाली घनी झाड़ी में से एक पगली-सी दिखनेवाली और अजीब हरकतें करनेवाली स्त्री दौड़ते हुए ही आगे आयी।
मुंदरबेगम तथा अन्य दो सहयोगियों को कुछ अलग ही शक़ हुआ और वे उसे पकड़ने के लिए उसके बिलकुल क़रीब जा पहुँचे। लेकिन शिला पर से जल्दी में उतर रहीं मोतीबाई ने उन सबको हाथ से इशारा करके रोका और उसी समय पीछे से आ रहे अन्य लोगों में से राजकुंवर यादव चपलता से आगे बढ़ीं।
राजकुंवर ने धीमी आवाज़ में सबसे कहा, “यह ‘काशीबाई कुंबिन’। (कुछ स्थानों पर ‘काशीबाई कुणबीण’ ऐसा भी उल्लेख पाया जाता है।) उसी के पास दामोदरराव (रानी लक्ष्मीबाई का गोद लिया हुआ पुत्र) को सौंपा है और यह पलधाडी गाँव की एक झोंपड़ी में ही ‘एक पगली-सी स्त्री’ का हुलिया बनाकर उसके छोटे-से पुत्र के साथ रह रही है। मैं भी शुरू में इसे पहचान नहीं पायी, इतना बेमालूम इसने भेस बदला है।”
मोतीबाई पास आकर पहुँचते ही उसने काशीबाई को अत्यंत भावावेग के साथ कसकर गले लगाया। उन दोनों में बिलकुल बचपन से ही अटूट गहरी मित्रता थी।
मोतीबाई के उस आलिंगन से काशीबाई समझ चुकी थीं कि ‘रानी लक्ष्मीबाई इस दुनिया में नहीं रहीं।’ उसके लिए आँसू रोकना मुमक़िन ही नहीं हो रहा था। उसे सँभालना मोतीबाई और राजकुंवर के लिए भी मुश्किल हो रहा था। काशीबाई और मोतीबाई ये दोनों भी रानी लक्ष्मीबाई की बहुत ही क़रीबी सहेलियाँ थीं और मुख्य बात, काशीबाई यह मोरोपंतजी की प्रमुख सहायिका थी और यह बात सिर्फ़ मोतीबाई ही जानती थी।
आख़िरकार सरदार मंजुनाथ पहाडी समय की माँग को जानकर आगे आये और बुज़ुर्ग होने के नाते इन दो युवा स्त्रियों से उन्होंने कहा, “तुम दोनों मेरी बड़ी बेटी से उम्र में छोटी हो, इसलिए बुज़ुर्ग होने के नाते कह रहा हूँ कि क्या तुम भी यह नहीं जानतीं कि यह घड़ी शोक करने की नहीं है? ऐसा क्या रहस्य है, जिसके कारण तुम दोनों इतनी मुस्तैदी होकर भी भान खो बैठीं हो?”
इससे दोनों भी सँभल गयीं। मोतीबाई ने सभी से कहा, “रानी लक्ष्मीबाई ने, यदि उसकी मृत्यु हो जाये, तो हम जैसे उसके सहकर्मियों को सहायता मिलें, इसलिए काशीबाई के पास ही स्वयं के आभूषण, वस्त्र तथा सोने के सिक्के और धन से भरी हांडी दे रखी है। इस दुखदायी याद के कारण ही लक्ष्मीबाई की महानता का अधिक ही एहसास हुआ और इसलिए रो पड़ी।”
काशीबाई शांति से सबको लेकर दुर्गामंदिर के पीछे रहनेवाले अपने घर में चली गयीं। वहाँ छह साल के दामोदरराव के साथ खेलते हुए काशीबाई की माँ गंगाबाई बैठी थीं। इन गंगाबाई को दो महीने पहले ही मोरोपंतजी ने इस गाँव में लाकर रखा था और ‘इस गंगाबाई की एक पगली-सी विधवा बेटी है’ यह वृत्त (समाचार) गाँव का हर एक जन जानता था। मोरोपंत ने गंगाबाई को ‘एक सुखसमृद्ध एवं दानी धार्मिक स्वभाव की विधवा का’ रूप दिया था। कहा जाता था कि वह बनारस के एक साधु के आदेशानुसार, पलधाडी गाँव में दुर्गादेवी की सेवा के लिए आकर ठहरी थी।
जैसे ही गंगाबाई को मोतीबाई से लमाणों के पास होनेवाले मवेशियों के मसले का पता चला, तब उसने अपनी बेटी काशीबाई से कहा, “पिछले दो महीनों से श्रीमान मोरोपंतजी ने मुझे अच्छा-ख़ासा तैयार किया है। मैंने गाँव के सभी से सुचारु रूप से संबंध स्थापित किये हैं। मैंने गाँव में बताकर ही रखा है कि ‘इसे भूत ने पकड़ लिया है’। आज मैं बताऊँगी कि ‘भूत ने गाय और भैंसें इस लमाण जनजाति को दान करने के लिए कहा है, क्योंकि भूत लमाण जनजाति की स्त्री का है।’ मैं सुबह-सुबह गाय-भैसें इकट्ठा करूँगी, अर्थात खरीद लूँगी और उन्हें इस लमाण गुट को दान के तौर पर दे दूँगी। लेकिन उसके लिए एक तांत्रिक कहाँ से मिलेगा?”
लालाभाऊ बक्षी तुरंत तैयार हो गये और उन्होंने लमाण भेस त्यागकर, काला चोला पहने हुए तांत्रिक का रूप धारण किया।
दिनदहाड़े इस लमाण बस्ती को भरपूर मवेशियों की प्राप्ति हुई। किसी भी गाँववाले के मन में यह खयाल नहीं आया कि इन लमाणों के पास पहले से मवेशी नहीं थे। क्योंकि गंगाबाई ने ही उन्हें बताया था कि ‘उनके मवेशियों को लेकर एक लमाण जंगल में भोर के समय ही गया है`।
मवेशियों के दान का कार्य तांत्रिक द्वारा पूरा हो जाते ही, गंगाबाई की बेटी काशीबाई की बाधा पूरी तरह दूर हो गयी और वह एक ही पल में सुव्यवस्थित रूप से विचरण करने लगी और इसी के साथ, उस तांत्रिक के पैर छूने के लिए गाँववालों का ताँता लग गया।
जानकार और अनुभवी लालाभाऊ बक्षी ने यह बात ठीक से भाँप ली कि ‘गाँव उनके वश में हो चुका है और इसका फ़ायदा उठाना ही होगा।’ उन्होंने मोतीबाई एवं सरदार पहाडी के साथ बैठकर अगले कार्य के लिए आवश्यक सभी चीज़ों की सूचि (List) तैयार की और अनेक गाँववालों की समस्याओं को हल करने के बहाने लगभग सभी चीज़ें रात तक इकट्ठा कर लीं। अगली बात सबसे महत्त्वपूर्ण थी और वह थी हथियार - तलवारें और बंदूकें। लेकिन उस प्रश्न को भी काशीबाई ने हल किया।
‘पास के गाँव के एक लालची साहुकार के पास लुटारू आते-जाते रहते हैं और वही हथियार बेचते रहता है’ यह बताकर।
रात के अँधेरे में रानी लक्ष्मीबाई का ही धन देकर हथियार ख़रीदे गये और अगदी सुबह यह लमाणों का काफिला मवेशियों समेत अगले प्रवास के लिए रवाना हुआ और तांत्रिक ने वहाँ से जाते समय, गाँव के हर एक को एक-एक तावीज़ अभिमंत्रित करके दे दिया और आठ घंटे घर बंद रखकर भीतर ही बैठने के लिए कहा।
गंगाबाई, स्वस्थ हो चुकी काशीबाई और उसका छोटा पुत्र, ऐसे तीनों जन इस तांत्रिक के साथ ही चले गये। उनके पास का सारा सामान अर्थात् हथियार, लमाणों के पास के गधों की पीठ पर लदा हुआ था।
हर एक के मन में बदले की भावना धधक रही थी। लेकिन काशीबाई और मोतीबाई बहुत ही ठंडे दिमाग से, लेकिन अत्यंत चरमसीमा की बदले की भावना से सोच रहीं थीं।
पलधाडी गाँव से थोड़ा दूर जाते ही उस लमाण टोली ने अपनी दिशा बदल दी। काशीबाई दुल्हेराव का अतापता ठीक से जानती थीं। क्योंकि वह स्वयं भी गुप्तचर ही थीं।
तीन दिन का प्रवास पूरा करके यह लमाणों का काफिला दुल्हेराव की हवेली के सामने वाले खुले मैदान में डेरा डालने लगा। लेकिन इस बार यह काफिला लगभग ५०-६० जनों का था। रानी लक्ष्मीबाई के ‘दुर्गादल’ तथा ‘महादेवशिवदल’ इनके बिखेरे हुए स्त्री-पुरुष सदस्य उनसे आ मिले थे। मुख्य बात, सरदार मंजुनाथ पहाडी लमाण भाषा को ठीक से जानते थे और अन्य सभी को भी उन्होंने सिखाकर अच्छे से तैयार किया था।
दिखने में बहुत ही सुंदर रहनेवालीं और बिजली की तरह किसी पर भी कहर ढा सकनेवालीं २५ साल की काशीबाई दुल्हेराव के घर, ‘दूध लाकर बेचनेवाली लमाण स्त्री’ के रूप में निर्भयतापूर्वक विचरण करने लगी।
(कथा जारी है)
