भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 29

प्रफुल्ल चाकी यह तिलकजी के बंगाल स्थित प्रमुख सहयोगी अरबिंद घोष और भगिनी निवेदिता के भाषणों तथा चर्चासत्रों के प्रभाव से अन्तर्बाह्य (भीतर और बाहर से) ध्येयासक्त हो चुका (ध्येय साध्य करने का जुनून सवार होनवाला) युवक ब्रिटिशों का तख्ता पलट देने के लिए बेचैन हुआ था। ऐसे में तिलकजी द्वारा कलकत्ता में दिया गया भाषण सुनने के बाद और विशेष रूप से उनकी ‘वह’ विख्यात प्रेस कॉन्फरन्स देखने के बाद तो प्रफुल्ल चाकी को यक़ीन ही हो गया कि केवल तिलकजी ही भारत को ब्रिटिशों की ग़ुलामी से मुक्त कर सकते हैं।

इसी कलकत्ता की सभा में उसे एक नया दोस्त मिल गया - खुदीराम बोस। ‘ये खुदीराम बोस कब अरबिंद घोष के सहयोगी गुट के मेंबर बन गये’ इस बात का पता किसी को भी नहीं चल सका, यहाँ तक कि उनके घर में माँ, पिता और तीन बहनों को और ‘बंगाल स्वदेशी मूव्हमेंट’ इस घोषजी के संगठन के ज्येष्ठ सहयोगियों को भी। क्योंकि उन्होंने कार्यकर्ता के तौर पर नाम दर्ज़ ही नहीं कराया था।
यह छोटी उम्र का युवक खुदीराम बोस इतना परिपक्व था कि इसने इस आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू करते समय ही यह जान लिया था कि क्रांतिकारी आंदोलन की सफलता गुप्तता (Secrecy) पर निर्भर होती है। वह संगठन के लिए पत्रक छापना, संदेशों का आदान-प्रदान करना, जहाँ बैठकें होती थीं, उन कमरों को सुव्यवस्थित रूप से रखना और भूमिगत हो चुके नागरिकों को खाने के डिब्बे पहुँचाना ऐसे छोटे-बड़े काम करनेवाला एक सामान्य कार्यकर्ता है, ऐसी ही उस गुट के प्रमुख नेताओं की राय थी।
लेकिन खुदीराम की आँखों में होनेवाले भाव अकेले अरबिंद घोष अच्छी तरह जानते थे और उन्होंने अन्य किसी को भी पता न चलने देते हुए खुदीराम बोस को उनके स्वयं के असिस्टंट के तौर पर नियुक्त किया और यहीं पर खुदीराम का जीवन बदल गया।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी इन दोनों ने ‘बम कैसे बनायें’ इस कार्यशाला में प्रशिक्षण लेना शुरू किया। तिलकजी से मुलाक़ात कर लौट आने के बाद तो इन दोनों ने अलग अलग प्रकार के बम बनाने का काम धड़ल्ले से ही शुरू किया। इन दोनों ने मिलकर पहले एक ‘बुक-बम’ (पुस्तक बम) बनाया। ‘उस’ पुस्तक को ले जा रहा व्यक्ति यानी वह बम ले जा रहा व्यक्ति किसी को भी इन दोनों की तरह लगन से पढ़ाई करनेवाला एक युवा छात्र ही प्रतीत होता। पुस्तक के पहले कुछ पन्ने खोलने के बाद भी पुलिस को ‘इसमें बम हो सकता है’ इस बात का शक नहीं होता।
ये दोनों बम की सामग्री को इतनी निपुणता से उस पुस्तक के मध्यभाग में छिपाया करते थे कि उस पुस्तक का वज़न भी ज़्यादा भारी प्रतीत नहीं होता था।
तीन पुलीस चौकियों पर, दो ब्रिटिश अफसरों पर और ब्रिटिशों का खबरी रहनेवाले एक गद्दार के घर पर इन दोनों के पास रहनेवाले छोटे से बुक-बमों का प्रयोग किया गया। क्योंकि यह केवल टेस्टिंग था और उस टेस्ट में इनके ये बुक-बम पूरी तरह सफल साबित हुए थे।
३० मार्च १९०८ के दिन खुदीराम बोस अकेले ही तिलकजी से मिलने पुणे आये और लौट गये वह उनका पहला शिकार और टार्गेट निश्चित करके ही।
मॅजिस्ट्रेट डग्लस एच. किंग्जफोर्ड (Kingsford) बंगाल का प्रमुख मॅजिस्ट्रेट था और उसके मन में क्रांतिकारियों के प्रति चरमकोटि का विद्वेष था। ‘चीफ प्रेसिडेंसी मॅजिस्ट्रेट ऑफ कलकत्ता अँड मुजफ्फरपुर’ इस उसके अधिकारपद का वह सीधे सीधे अनुचित उपयोग कर रहा था।
केवल शक होने पर और कोई भी सबूत न मिलने पर भी वह बिलकुल वृद्धों को भी खूँख़ार सज़ा देता था और ऐसी सज़ाओं का प्रबंध ब्रिटीश गव्हर्न्मेंट के संविधान (Constitution) में न होने के बावजूद भी वह उन सज़ाओं को देता था।
३० मार्च के दिन जब खुदीराम बोस पुणे आये हुए थे, उससे दो महीने पहले इस किंग्जफोर्ड ने ‘जुगंतर’ (युगांतर) इस बंगाली समाचारपत्र के संपादक को अत्यधिक कठोर सज़ा सुनायी थी। उन्हें जेल में कठोर कारावास के लिए तो भेजा ही था, लेकिन उससे पहले रास्ते में से पीटते हुए और घसीटते हुए गली गली में से उन्हें घुमाने का आदेश भी दिया था।
इस वृद्ध संपादक की असहाय, दर्दभरी चीखें खुदीरामजी के मन को पूरी तरह बेचैन कर गयीं।

उसके बाद २४ मार्च के दिन किंग्जफोर्ड ने ‘सुशीलसेन’ नाम के स्वदेशी के लिए कार्य करनेवाले और वह भी शांति से कार्य करनेवाले केवल पंद्रह वर्ष के अबोध, ८वीं कक्षा के छात्र को गिरफ़्तार किया और वह भी सुशीलकुमार, जुगंतर के संपादक पर हुई क्रूर कार्रवाई का विरोध करने की, निषेध करने की लोगों से विनती कर रहा था इसलिए।
इस किंग्जफोर्ड ने इस केवल पाँच फीट ऊँचे और दुबली पतली कदकाठी रहनेवाले सुकुमार किशोर को, पंद्रह कोड़े मारने की सज़ा सुनायी और वह भी बाजार में भरी भीड़ में रहनेवाले मुख्य चौक में।
हद तो उसके बाद ही हो गयी। हर एक कोड़ा बरसाया जाने के साथ सुशीलसेन, “वन्दे मातरम्” यह ज़ोर ज़ोर से कहता ही रहा और यह देखकर किंग्जफोर्ड आपे से बाहर ही हो गया और उसने हर एक ‘वन्दे मातरम्’ के लिए ‘पंद्रह कोड़ों की सज़ा’ देने का हुक़्म दिया।
लगभग आधा घंटा वह सुकुमार किशोर उम्र का छात्र ‘वन्दे मातरम्’ का घोष करता ही रहा, लेकिन उसकी आवाज़ धीरे धीरे क्षीण होती गयी और आख़िर में वह बेहोश होकर गिर गया और तभी कोड़े बरसाना रुक गया।
इस घटना से खुदीराम और प्रफुल्ल बहुत ही बेचैन हो गये और इसी के साथ हर एक समझदार भारतीय नागरिक भी। ‘सुशीलसेन’ यह ब्रिटीश अत्याचार का प्रतीक बन गया और पूरे भारत में इस घटना के विरोध में प्रदर्शन होने लगे।
पुणे से लौट आये खुदीराम बोस ने, इस निर्मम किंग्जफोर्ड का ख़ात्मा करने का तय कर लिया। ऐसे में ब्रिटीश सरकार ने किंग्जफोर्ड को मुजफ्फरपुर में ही मॅजिस्ट्रेट के तौर पर काम करने का हुक़्म दिया - कलकत्ता में हो रहा जनक्षोभ (लोगों का गुस्सा) शांत हो इसलिए।
लेकिन खुदीराम और प्रफुल्ल को वह तबादला (ट्रान्सफर) सुविधाजनक लगा। कलकत्ता जैसे अत्यधिक भीड़-भाड़वाले शहर में किंग्जफोर्ड पर बम फेंकना मुश्किल होता और शायद उसमें बेगुनाह नागरिकों की भी बिना वजह मृत्यु हो जाती और इसी कारण किंग्जफोर्ड मुजफ्फरपुर रहने गया, इस बात से ये दोनों बहुत खुश हो गये। मुजफ्फरपुर यह कलकत्ता की तुलना में बहुत छोटा शांत शहर था और यह मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड हर शाम नियमित रूप से ‘युरोपियन क्लब’ जाता था।
३० मार्च १९०८ की शाम का मुहूर्त तय किया गया। वे दोनों छात्रों के युनिफॉर्म में उस क्लब के सामने रहनेवाले बस स्टॉप पर मानो बस के आने की राह देखते हुए बैठे रहे।

क्लब में मौजमस्ती करने के बाद किंग्जफोर्ड उसकी बग्गी से घर जाने निकला। उसके साथ ही दूसरे एक ब्रिटीश अफसर प्रिंजल केनेडी (Pringle Kennedy) की पत्नी और युवा बेटी थी। ऐन वक़्त पर किंग्जफोर्ड ने इन दोनों से उसकी आलीशान बग्गी में बैठने की विनती की; क्योंकि उनकी बग्गी छोटी थी और उनके साथ अफसर प्रिंजल केनेडी और अन्य दो ब्रिटीश महिलाएँ थीं। किंग्जफोर्ड खुद केनेडी की छोटी बग्गी में बैठ गया। उस जमाने में घोड़ों की बग्गियाँ अधिकार के अनुसार छोटी-बड़ी होती थीं और चारों तरफ़ से बंद होती थीं।
इस ऐन वक़्त पर हुए बदलाव की ख़बर खुदीराम और प्रफुल्ल को मिलना संभव ही नहीं था और इस कारण ‘हर्बर्ट ब्रूम’ की (Herbert Broom) ‘कमेंट्रीज ऑन द कॉमन लॉ’ इस एल.एल.बी. की छात्रों की पुस्तक में छिपाया गया छह औंस का डायनामाईट, डिटोनेटर और ब्लॅक पावडर फ्यूज से बना बम खुदीराम ने खुद बग्गी पर फेंका।
लेकिन किंग्जफोर्ड दूसरी ही बग्गी में होने के कारण पूरी तरह बच गया। खुदीराम और प्रफुल्ल ने किंग्जफोर्ड की बग्गी का अच्छे से अध्ययन किया था। लेकिन किंग्जफोर्ड की खुद की बग्गी में उस दिन केनेडी परिवार था और उनमें से दो महिलाओं की मृत्यु हो गयी।
खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों भी कुछ ही समय बाद पकड़े गये। लेकिन ब्रिटीश सरकार को भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम को बदनाम करने का साधन मिल गया और ‘युरोपियन महिलाओं पर हमला’ इस शीर्षक के अंतर्गत ब्रिटिशों ने सभी सच्चे नेताओं की बदनामी करना शुरू किया।
लेकिन लोकमान्य तिलकजी ने अपने ‘मराठा’ और ‘केसरी’ में सुशीलसेन के मामले को मज़बूती से उछाला और खुदीराम का ज़ाहिर रूप से समर्थन भी किया। तिलकजी की तोंप गरजती ही रही और ब्रिटिशों की दलीलों की धज्जियाँ उड़ने लगीं और ठीक इसी वक़्त साऊथ आफ्रिका से भारत लौटकर स्वयं का नेतृत्व स्थापित करने की इच्छा होनेवाले ‘मोहनदास करमचंद गांधी’ इन नये नेता ने खुदीराम की कृति का कड़े शब्दों में निषेध किया और खुदीराम को ‘महिलाओं पर अत्याचार करनेवाला’ ठहराया
और यहीं पर ‘तिलकजी के विरुद्ध गांधीजी’ इस नये युग का प्रारंभ हुआ। क्योंकि तिलकजी के शत्रु होनेवाले गोपाळ कृष्ण गोखलेजी के गांधीजी शिष्य थे।
(कथा जारी है)
