भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 14

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झलकारीबाई ने अंतिम साँस लेते समय भी ब्रिटीश सेना के सामने ज़ोर से चिल्लाकर कहा था कि रानी लक्ष्मीबाई यानी वास्तविक सूर्य झांसी के क़िले में ज़ोर-शोर से तैयारी कर रही हैं; क्योंकि मुंदरबेगम ने स्वयं जानकारी प्राप्त करके झलकारीबाई को दी थी कि जनरल ह्यूज रोज का इन पाँच तत्त्वों (Principles) पर ज़बरदस्त भरोसा है। १) राजा के बजाय अथवा राज्यप्रमुख के बजाय पूरी सेना को मार भी दिया जाये, तब भी विशेष उपयोग नहीं होता; क्योंकि जीवित बचा हुआ राजा अथवा नेता पुन: सैनिकों को इकट्ठा करता ही है। २) भारतीय राजा और रानियाँ ऐशो-आराम करने का मार्ग अपना चुके होने के कारण उन्हें जनता से सहानुभूति (हमदर्दी) प्राप्त नहीं है और जनता से सहायता भी प्राप्त नहीं है। ३) ब्रिटिशों की तुलना में भारतीय सभी मामलों में अत्यधिक निकृष्ट (हीन) दर्जे के हैं। ४) ‘अहिंसा’ इस तत्त्व को भारतीयों के मन में बहुत ऊँचा स्थान होने के कारण और ‘सभी में भगवान का अंश होने की’ बात हिंदु मानते हैं, इस कारण ज़ाहिर सी बात है कि अमीर और ताकतवर ब्रिटिशों को तो वे भगवान ही मानेंगे। ५) दुनिया के किसी भी धर्म का मनुष्य और विशेष रूप से भारतीय मनुष्य मृत्यु के समय कभी भी झूठ नहीं बोलता।
रानी लक्ष्मीबाई ने इसी जानकारी का उपयोग कर गुप्त रूप से सभी कार्रवाइयाँ की थीं और झलकारीबाई ने भी आज मृत्यु होते समय, ‘रानी लक्ष्मीबाई क़िले में ही होने’ की सरासर झूठी बात कहकर जनरल ह्यूज को रानी के पीछे जाने से रोका था
और उससे लगभग बारह घंटे पहले झलकारीबाई ने ‘वे स्वयं ही रानी लक्ष्मीबाई हैं’ यह बात ब्रिटिशों के गले उतारी थी और इस कारण ब्रिटिश सेना का सारा ध्यान केवल उन पर (झलकारीबाई पर) ही केंद्रित हुआ था और रानी लक्ष्मीबाई अपने खास साथियों के साथ, तात्या टोपे जहाँ निवास कर रहे थे, उस कालपी गाँव तक जा पहुँची थीं और मुंदरबेगम ने भी ‘रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर पहुँची हैं’ यह संदेश एक गद्दार सैनिक के सामने झलकारीबाई को देकर (संदर्भ : कथामंजिरी ४-३-१३) ब्रिटिशों को वैसे भी गुमराह किया था।
ब्रिटिशों की आधी सेना ग्वालियर से रवाना हुई थी और आधी सेना केवल झलकारीबाई पर बारह घंटे नज़र रखे हुए थी।
इस कारण रानी लक्ष्मीबाई भी निर्विघ्न रूप से कालपी पहुँच सकीं और क़िले में दीवान रघुनाथसिंग, सरदार मंजुनाथ पहाडी, राजकुंवरबाई और कमलकुमारी ये चारों प्राप्त अवधि का उपयोग कर आगे की लड़ाई के लिए अधिक सक्षमता से तैयार हुए थे; क्योंकि चाहे कुछ भी हो जाये, ह्यूज के नेतृत्व में रहनेवाली ब्रिटिशों की सेना तीन स्थानों पर बँट जानी चाहिए, यही व्यूहरचना थी।
एक हिस्सा क़िले के पास लड़ते रहना चाहिए और क़िले को कम से कम तीन दिनों तक दुश्मन के हाथों में जाने से बचाना चाहिए।
दूसरी बात थी कि ब्रिटिश सेना का दूसरा हिस्सा ग्वालियर के रास्ते जाना चाहिए और तीसरा हिस्सा झांसी के आसपास के गाँवों की नाकाबंदी करने के काम में उलझ जाना चाहिए।
रघुनाथसिंग दीवान के नेतृत्व में प्रशिक्षित हुआ शिवमहादेवदल, झांसी के आसपास के गाँवों में विभिन्न स्थानों पर समय समय पर गतिविधियाँ कर ब्रिटीश सेना को अलग अलग स्थानों पर बिखेरकर रख रहा था। यही था वह ब्रिटिश सेना का तीसरा हिस्सा और उस पर भी आक्रमण ज़ोरदार ही हो रहे थे।
रानी लक्ष्मीबाई सुरक्षित रूप से कालपी जा पहुँचीं। तात्या टोपे के साथ उनकी मुलाक़ात भी बिलकुल प्रदीर्घ चर्चा के साथ सुव्यवस्थित रूप से हुई। रावसाहब पेशवा और तात्या टोपे ने भी उन्हें पूरी तरह सहकार्य करने का आश्वासन दिया।
रानी लक्ष्मीबाई के दुर्गादल के और शिवमहादेवदल के महिला-पुरुष विभिन्न भेस लेकर और अलग अलग रास्तों से झांसी की रानी की सेना में आकर शामिल हो ही रहे थे।
इन तीनों की मिलाकर सेना लगभग बाईस से पच्चीस हज़ार हुई।
पूरी योजना बारीकी से बनाकर जनरल ह्यूज की सेना पर ज़बरदस्त आक्रमण करने की ज़ोरदार तैयारी हुई। केवल आधुनिक शस्त्र-अस्त्रों की कमी का तीव्रता से एहसास हो रहा था।
रानी लक्ष्मीबाई का गुप्तचर विभाग बिलकुल ज़ोर-शोर से काम में जुट गया था। उनके द्वारा प्राप्त की गयी खबरों के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई ने एक साहसी निर्णय लिया। उनका जन्मगाँव ‘वाराणसी’ था। (उनके मायके के ‘तांबे’ घराने का वास्तव्य पिछले सौ सालों से वाराणसी में ही था और पुणे के साथ उनका करीबी रिश्ता था। तांबे घराने के कई हितैषी वाराणसी और आसपास के प्रदेश में थे। वर्तमान समय में भी वाराणसी में कई मराठी परिवार कई शतकों से रह रहे हैं।)
रानी लक्ष्मीबाई ने कुछ समय के लिए वाराणसी में ही वास्तव्य किया, परन्तु गुप्त रूप से किया और ‘कितने भारतीय रियासतदार इस युद्ध में शामिल हो सकते हैं’ इस बात का अनुमान लगाना शुरू किया, लेकिन उनके हाथ कुछ खास नहीं लगा।
रानी लक्ष्मीबाई ने लगभग अड़तीस रियासतदारों से प्रत्यक्ष रूप से मुलाक़ात की। करीब करीब महीने भर के लिए उन्होंने इसके लिए अविश्रान्त प्रयास किये। लेकिन दो-तीन रियासतदारों द्वारा दिये गये आश्वासनों से अधिक विशेष कुछ हासिल नहीं हुआ।
अन्तत: रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे की दस हज़ार की सेना की मदद से झांसी क़िले पर आक्रमण कर झांसी पर पुन: अधिकार स्थापित करने का निर्णय लिया।
क्योंकि कालपी आकर पहुँचने के बाद केवल सात दिनों में ही रानी लक्ष्मीबाई को जानकारी मिली थी कि ‘झांसी क़िले को ब्रिटिशों ने जीत लिया है’ और उसे किसी भी हाल में पुन: प्राप्त करना ही है, ऐसा दृढनिश्चय रानी ने कर लिया था।
लेकिन ब्रिटिशों के आक्रमण से जैसे तैसे बची हुई कमलकुमारी चौहान, राजकुंवर यादव और उनका भाई बिहारीलाल यादव ये तीनों रानी लक्ष्मीबाई से ११ मई १८५८ के दिन कालपी आकर मिले। दीवान रघुनाथसिंग ने किस प्रकार से युद्ध किया और किस तरह वे वीरगति को प्राप्त हुए, यह समाचार रानी लक्ष्मीबाई ने दिल पर पत्थर रखकर सुना। वे रघुनाथसिंग दीवान को पिता समान ही मानती थीं।
लेकिन उससे भी बड़ा झटका बाद की बातचीत में लगा। झांसी क़िले की ब्रिटिशों ने की हुई दुर्दशा के बारे में उन तीनों ने सविस्तार बताया। झांसी क़िले में स्थित हर एक वास्तु को भग्न (ध्वस्त) कर दिया गया था। कई घर जलाये थे और सैंकड़ों महिलाओं-पुरुषों की निर्ममता से हत्याएँ की गयी थीं। इन तीनों की राय थी कि रानी लक्ष्मीबाई झांसी लौटने का विचार छोड़ दें। रावसाहब पेशवा ने भी यही सलाह दी थी।
लेकिन झांसी की रानी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं थी। उन्होंने सेना की विभिन्न टुकड़ियों को अलग अलग रास्तों से आगे भेजना शुरू किया। २४ मई के दिन रानी लक्ष्मीबाई अपने, पीछे रहे एक हज़ार सैनिकों के साथ मध्यरात्रि में कालपी से रवाना होनेवाली थीं।

लेकिन गद्दारों ने अपना काम किया था और रानी लक्ष्मीबाई कालपी से बाहर निकलने से पहले ही, बहुत बड़ी सेना के साथ मेजर जनरल ह्यूज रोज ने कालपी पर भीषण हमला किया।
घमासान युद्ध हुआ। रानी लक्ष्मीबाई की ९०% सेना पहले ही कालपी से बाहर जा चुकी थी। तात्या टोपे की सेना का भी यही हाल था। लेकिन दोनों भी पूरी बहादुरी से लड़े।
आखिरकार तीन दिन के घमासान युद्ध के बाद रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने गुप्त तरीके से कालपी छोड़ने का फैसला लिया - ज़ाहिर सी बात है कि अलग अलग रास्तों से।
क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई की ग्यारह हज़ार की सेना, कालपी से झांसी तक के प्रदेश में उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। उन्हें अनाथ कर असहाय बनाने की कल्पना तक रानी लक्ष्मीबाई को मंज़ूर नहीं हुई होती।
रानी लक्ष्मीबाई जब अपने इन तीन सहयोगियों के साथ गंगा नदी से प्रवास करते हुए आगे बढ़ रही थीं, तब उनके पूरे बदन पर ५९ ज़ख्म थे।
युद्धनीति और राजनीति के मामले में रानी की महत्त्वपूर्ण सलाहकार मोतीबाई तो रानी लक्ष्मीबाई के भेस में ५०० सैनिकों के साथ जंगल के मुश्किल रास्ते से झांसी की दिशा में निकलीं - अर्थात् ब्रिटिश सैनिकों को भटकाकर रखते हुए और रानी लक्ष्मीबाई का प्रवास निर्विघ्न रूप से हो इसी लिए। उनके द्वारा ही लिखे गये एक पत्र में, रानी लक्ष्मीबाई के बदन पर हुए ५९ गहरे ज़ख्मों का उल्लेख किया गया है।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने आधे रास्ते में मोतीबाई से मुलाक़ात की और ग्वालियर पर आक्रमण कर, ग्वालियर को जीतने का निर्णय लिया गया। ग्वालियर यह रियासत भी ब्रिटिशों के अधिकार में थी और रियासतदार बस नाम के ही रियासतदार थे।
ग्वालियर की दिशा में निकली रानी लक्ष्मीबाई का घायल शरीर, घायल मन और हथियारों के बिना होनेवाली सेना इन सबके बावजूद भी उन्होंने ज़िद नहीं छोड़ी। रानी लक्ष्मीबाई ने नयी ही योजना बनायी।
(कथा जारी है)
