भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 13

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 13

कमर कसकर और सीने को फौलाद की तरह बनाकर लड़ने के लिए तैयार रानी लक्ष्मीबाई के दुर्गादल ने और महादेवशिवदल ने ब्रिटिशों के हमले का करारा जवाब देना शुरू किया। युद्ध में जिस तरह झांसी के क़िले पर से रानी लड़ रही थीं, उसी तरह पहले ही योजनाबद्ध तरीके से झांसी शहर और झांसी राज्य के विभिन्न इलाकों में छिपाकर तैयार रखे गये रानी लक्ष्मीबाई के सैंकड़ों सैनिक, मेजर एरस्किन की सेना पर कई बाजुओं से और कई स्थानों पर हमले करने लगे। 

 

     ब्रिटीश सेना के डेढ़ हज़ार सैनिक पहले चार दिनों में ही मारे गये और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना के ज़्यादा से ज़्यादा दो-चार सैनिक ही हम मार सके होंगे’ ऐसा स्पष्ट संदेश, मेजर जनरल ह्यूज रोज के गुप्तचरों ने, एरस्किन को भी पता न चलने देते हुए ह्यूज रोज और लॉर्ड डलहौसी को दे दिया और इसी के साथ अलग अलग स्थानों से ब्रिटिशों के सैनिक झांसी के बाहर इकट्ठा होने लगे।

 

      रानी लक्ष्मीबाई अपने करीबी सहयोगियों के साथ चर्चा कर महल में रहनेवाले पूजाघर (देवगृह) में जाने निकलीं। चारों तरफ से हमले बढ़ते जा रहे थे। पहले चार दिनों के बाद के हर एक दिन झांसी की सेना का और झांसी राज्य का अपरिमित नुकसान हो रहा था।

 

 

          क़िले से बाहर रहकर और छिपकर (गुरिल्ला पद्धति से) हमले करके ब्रिटीश सेना को परेशान करनेवाली लक्ष्मीबाई की सेना के लगभग 50% सैनिक मारे गये थे। रानी लक्ष्मीबाई यही सोचते हुए देवगृह की ओर निकली थीं कि क़िले के बाहर से लड़नेवाली हमारी छिपकर आक्रमण करनेवाली (गुरिल्ला युद्ध रणनीति) सेना को रोकना है या उन्हें लड़ने देना है और उन तक संदेश किस तरह पहुँचाना है? क्योंकि उन तक वह संदेश पहुँचानेवाले, झांसी के क़िले से आसपास के प्रदेश में जानेवाले सातों सुरंगी रास्तों को ब्रिटिशों ने ध्वस्त कर दिया था।

 

      रानी लक्ष्मीबाई ने देवगृह में प्रवेश कर भगवान के दर्शन किये, देवगृह में अपने हाथों से ज्योति प्रज्वलित की (दीया जलाया) और ‘यह शायद मेरी आपसे अंतिम मुलाकात होगी’ ऐसा भगवान से साफ़ साफ़ कहकर रानी लक्ष्मीबाई एक बार भी पीछे मुड़कर न देखते हुए देवगृह से निग्रहपूर्वक बाहर आ गयीं। क्योंकि देवगृह में भगवान तो थे ही (देवताओं की मूर्तियाँ तो थीं ही), मग़र साथ ही वहीं की एक दीवार पर उनके (रानी लक्ष्मीबाई के) पति, पुत्र और रानी लक्ष्मीबाई की स्वर्गस्थ माता के, पुरनसिंग कोरी ने बनाये हुए बिलकुल हूबहू रहनेवाले बड़े बड़े चित्र थे। वे एक भी आँसू बहाना नहीं चाहती थीं। उन पतिव्रता भारतीय नारी ने देवगृह के दरवाज़े से बाहर आते हुए अपने पति का स्मरण कर उनसे इतना ही कहा - शायद जल्द ही आपसे मुलाक़ात होगी। आप दोनों से मुलाकात होना खुशी की ही बात होगी। परन्तु झांसी आपकी माता थी। उसकी रक्षा के लिए भगवान से कहिए।’  

 

      रानी लक्ष्मीबाई देवगृह से बाहर निकलकर गढ़ की दूसरी मंज़िल की तरफ निकलीं, जहाँ पुरणसिंग कोरी और दीवान रघुनाथसिंग कोई विशेष समाचार लेकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

 

      रानी लक्ष्मीबाई अकेली ही उस बहुत बड़े बरामदे में से चल रही थीं। उस पूरे क़िले में एक भी सेवक नहीं था। सभी सेवक, यहाँ तक कि खाना बनानेवाले और पानी भरनेवाले भी युद्ध में सहायता करने में व्यस्त थे। कभी जब लड़नेवाले सैनिकों को खाने-पीने तक के लिए भी समय नहीं मिलता था, तब ये खाना बनानेवाले और पानी भरनेवाले लोग सैनिकों को अपने हाथों से खाना खिलाते थे और पानी भी पिलाते थे और सैनिक लड़ते ही रहते थे। कोई भी सैनिक दो या तीन घंटों से पल भर के लिए भी ज़्यादा सोया नहीं था।

 

      रानी लक्ष्मीबाई सोच में डूबकर एक-एक कदम आगे बढ़ रही थीं। उनके साथ हमेशा रहनेवाली अंगरक्षिका मुंदरबेगम का पूरा ध्यान केवल और केवल रानी लक्ष्मीबाई पर ही था। मुंदरबेगम भी रानी लक्ष्मीबाई के पीछे पीछे चल रही थीं।

 

      आधे रास्ते में सैनिक की पोशाक में रहनेवाला एक व्यक्ति अचानक से रानी लक्ष्मीबाई के सामने आकर खड़ा हो गया। उस व्यक्ति के शरीर पर रहनेवाली ब्रिटीश सैनिक की पोशाक को मुंदरबेगम ने उस घने अंधेरे में भी अचूकता से पहचान लिया और पल भर में उस शेरनी ने उस ब्रिटीश सैनिक के शरीर पर छलाँग लगायी। इसी के साथ वह व्यक्ति नीचे गिरने ही वाला था कि उतने में उस सैनिक के सिर पर रहनेवाली ब्रिटीश टोपी (सिपॉय हॅट) नीचे गिर गयी और मुंदरबेगम चौकन्नी हो गयीं, अचंभित होकर ही, अरे! झलकारी तुम!

 

      हाँ, मैं झलकारीबाई।” तीनों तेज़ी से पास के ही कक्ष में गयीं। रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारी का हाथ (अपने) हाथ में लेकर झलकारीबाई को प्यार और सम्मान के साथ अपने पास बिठाया, बहन झलकारी! तुम यह भेस पहनकर क्या हासिल कर रही हो? तुम्हारे शरीर पर कितनी जगह चोटें आयी हैं! हमारे लिए एक भी सुरंगी रास्ता नहीं बचा है। फिर तुम क्या करके और कहाँ जाकर आयी हो?

 

      झलकारीबाई ने शांति से लक्ष्मीबाई को सम्मानपूर्वक अभिवादन करते हुए कहा, झांसी के क़िले की उत्तर दिशा में होनेवाली चहारदीवारी की खड़ी ढ़लान से उतरना बहुत ही मुश्किल है, यह मानकर वहाँ पर एक भी सुरंगी रास्ता नहीं बनाया गया था और सीधे सीधे उतरने के लिए तो रास्ता ही नहीं था।

 

      लेकिन कल मैंने एक बिल्ली को उस खड़ी ढ़लान से नीचे छोड़ दिया और वह जिस तरह उतरती गयी, उसे देखती गयी। उसी रास्ते से आज रात के समय मैं क़िले के नीचे तक जा सकी। वहाँ ब्रिटीश सेना की गश्त भी नहीं है; क्योंकि वहाँ अकराल-विकराल पत्थरों का जंजाल फैला हुआ है। उसमें से आप निश्चित रूप से रास्ता निकाल सकती हैं। 

 

     

मेरी विनती है कि आप चुनिंदा निष्ठावान सैनिकों को साथ लेकर इस छिपे रास्ते से क़िले से नीचे उतर जाइए और कालपी की दिशा में प्रस्थान कीजिए; क्योंकि ‘हमारे क़िले को दुश्मन के हाथों में जाने से हम तीन दिनों से अधिक अवधि तक नहीं रोक पायेंगे’ ऐसा मुझे लगता है। आप यदि जीवित रहती हैं, तो ही यह जंग चलती रहेगी, अन्यथा तात्या टोपे को भी इसी तरह अलगथलग कर मार दिया जायेगा। देखिए ना! तात्या टोपे से भेजी जा रही सैनिकों की मदद को ब्रिटिशों ने ‘कॉनपुर’ (Kawnpoor) (यानी वर्तमान समय का कानपुर) की सीमा पर ही रोककर रखा है। लेकिन यदि आप बाहर से हमला करती हैं, तो कॉनपुर शहर में से तात्या टोपे लड़ सकेंगे। आपका प्रस्थान करना ही उचित होगा।” 

 

      रानी लक्ष्मीबाई ने दृढ़तापूर्वक कहा, मेरा भाग जाना असंभव है! सामने से तेज़ी से आ रहे दीवान रघुनाथसिंग ने भी उतनी ही दृढ़ता से कहा, मैं आपके पिता की उम्र का हूँ। आपका यह ‘पलायन’ (भाग जाना) नहीं होगा, बल्कि यह तो वास्तविक ‘रणनीति’ है। जीतने की यह एक ही उम्मीद बची है।” 

 

      रानी लक्ष्मीबाई ने प्रश्न पूछा, क्यों? दीवान रघुनाथसिंग और नाईक पुरनसिंग कोरी ने एकसाथ ही जवाब दिया, हमारा एक सेनापति दुल्हेराव अपनी टुकड़ी के साथ हाल ही में ब्रिटिशों से जाकर मिला है और उसे क़िले की पूरी जानकारी है और हमारी सेना की भी। वह दगाबाज़ गद्दार सारी जानकारी ब्रिटिशों को देने ही वाला है। उसे ब्रिटीश मेजर जनरल ह्यूज रोज ने बड़ी जागीर दी है। आप प्रस्थान करें यही उचित है। सोचने के लिए समय नहीं है।”

 

      रानी लक्ष्मीबाई रात के अंधेरे में ही क़िले से नीचे उतर जायें’ यह तय हुआ। स्वयं लालाभाऊ बक्षी, मोतीबाई, खुदाबक्ष और मुंदरबेगम रानी के साथ रवाना हुए। रानी लक्ष्मीबाई उस अत्यधिक मुश्किल रास्ते से क़िले से नीचे उतरने लगीं 

 

      और ठीक उसी पल झलकारीबाई रानी लक्ष्मीबाई की पोशाक पहनकर दो सौ सैनिकों के साथ लड़ते-लड़ते क़िले से उतरने लगीं। झलकारीबाई का एक ही उद्देश्य था, ब्रिटीश सेना का ध्यान केवल उन पर ही केंद्रित हो। रानी लक्ष्मीबाई बिना किसी भी रुकावट के कालपी तक पहुँच सकें।’ 

 

     

क़िला आधा उतरकर लड़नेवाली झलकारीबाई दिखायी देते ही ब्रिटीश सेना का ह्यूज रोज बहुत खुश हुआ। उसने सैनिकों से हमले की तीव्रता कम करने के लिए कहा। उसे रानी लक्ष्मीबाई को ज़िंदा पकड़ना था। 3 अप्रैल 1858 की रणचंडी की रात थी। झलकारीबाई की नज़रों के सामने उनके पति पुरनसिंग कोरी ब्रिटिशों की गोली से हुतात्मा हो गये। उन्हें प्रणाम कर और उनके खून से अपने पूरे माथे पर तिलक लगाकर झलकारीबाई ब्रिटिशों के शिविर के पास जा पहुँचीं। वे पूरे चौबीस घंटों तक छावनी के चारों ओर लड़ते हुए घूमती रहीं। अंत में केवल वे (झलकारीबाई) और उनकी दो साथी राजकुंवर और कमलकुमारी बचीं।

 

      4 अप्रैल की रात शुरू हो गयी। ब्रिटिशों की गोलियों से बायाँ हाथ पूरी तरह ज़ायबंदी हुई झलकारीबाई घोड़े के साथ छावनी में ही घुस गयीं। कमलकुमारी ने उन्हें संदेश दिया था कि रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर पहुँच गयी हैं।

 

      बायाँ हाथ लटक रही झलकारीबाई ने रानी लक्ष्मीबाई के आवेश में ही मेजर जनरल ह्यूज के तंबू पर ही आक्रमण किया।

 

      झलकारीबाई ने इन दोनों को चुपचाप से वापस भेज दिया और वे अकेली ही आगे चली गयीं।

 

      4 अप्रैल रात बारह बजे झलकारीबाई अपने घोड़े को जनरल ह्यूज के सामने ले गयीं और मेजर जनरल ह्यूज के कंधे पर ही वार किया। लेकिन एक पल में कई ब्रिटिश सैनिकों ने झलकारीबाई पर हमला किया और झलकारीबाई ने अंतिम शब्द कहे, मैं सिर्फ़ झलकारी हूँ। प्रत्यक्ष सूरज लक्ष्मीबाई तो क़िले में तैयारी कर रही हैं।”

 

      झलकारीबाई की बंद हो रही आँखों के सामने केवल लक्ष्मीबाई का ही चेहरा दिखायी दे रहा था। उन झलकारीबाई ने इस दुनिया से जाते-जाते भी मेजर जनरल ह्यूज रोज की तलवार तोड़कर ही आखिरी साँस ली।

 

      वर्तमान समय में विद्यमान उनकी समाधि पर लिखी गयी ये पंक्तियाँ कितनी अर्थपूर्ण हैं!

 

      आकर रण में ललकारी थी

      वह झांसी की झलकारी थी

               गोरो को लड़ना सीखा गई

               रानी बन जोहर दिखा गई

      है इतिहास मे झलक रही,

      वह भारत की सन्नारी थी।

                                                      “मैथिली शरण गुप्त”  

 

(कथा जारी है)