रामरक्षा ३० | निर्गुण भगवान की सगुण आराधना : रामप्रिय भरतजी की प्रेमोपासना अर्थात् वंदनभक्ति
सद्गुरु अनिरुद्ध बापू - कण्ठ अर्थात् गर्दन यह जिस प्रकार सिर एवं बाक़ी का शरीर इन्हें जोड़नेवाली कड़ी है, वही काम भक्त और भगवान के मामले में भरतजी का है।

सद्गुरु अनिरुद्ध बापू - कण्ठ अर्थात् गर्दन यह जिस प्रकार सिर एवं बाक़ी का शरीर इन्हें जोड़नेवाली कड़ी है, वही काम भक्त और भगवान के मामले में भरतजी का है।

सद्गुरु अनिरुद्ध बापू यहाँ भरत जी ने किये हुए इस विश्व के पहले पादुकापूजन के सर्वोच्च महत्त्व को विशद करते हैं | वास्तविकता का भान कभी भी न छोड़नेवाले भरत जी ये अनुकरण के हिसाब से हमारी ‘पहुँच में आ सकनेवाले’ हैं |

सद्गुरु बापू हमें बिलकुल आसान शब्दों में समझाकर बताते हैं - धर्म यानी वास्तविक रूप से क्या है? हमारा मूल धर्म कौनसा है? ‘धर्म और भगवान के बीच निश्चित रूप से क्या नाता है?

‘हे सौमित्रिवत्सल राम, आप मेरे मुख की रक्षा कीजिए’ - यह प्रार्थना हमारे के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों है, तो वह हमें संकट में धकेलनेचाली किसी भी अनुचितता से हमारे रक्षा करती है इसलिए; लेकिन उसके लिए मर्यादायुक्त भक्ति का पालन ही कैसे आवश्यक है, यह विभिन्न उदाहरणों सहित सद्गुरु अनिरुद्ध बापू समझाकर बताते हैं

सद्गुरु अनिरुद्ध बापू - रामरक्षा के इस प्रवचन में बताते हैं की भक्ति एवं बुद्धि का संबंध क्या है? और मुख एवं जीभ का भक्तिमार्ग में महत्त्व क्या है?