रामरक्षा प्रवचन १९ - भक्ति प्रगल्भ करने की मास्टर-की | Aniruddha Bapu | Ram Raksha Pravachan

रामरक्षा प्रवचन १९ - भक्ति प्रगल्भ करने की मास्टर-की | Aniruddha Bapu | Ram Raksha Pravachan

 

दिनांक २४ मार्च २००५ को किये रामरक्षा पर आधारित प्रवचन में, सद्गुरु अनिरुद्ध बापूजी ‘विश्वामित्रप्रिय: श्रुति’ यह रामरक्षा कवच की अगली पंक्ति समझाकर बताते हैं। ‘विश्वामित्र को प्रिय रहनेवाले श्रीराम मेरी श्रुति की रक्षा करें’ यह इस पंक्ति का सरलार्थ पहले बताकर, यहाँ ‘श्रुति’ यानी महज़ ‘कान’ यह इंद्रिय नहीं, बल्कि ‘श्रवण अर्थात् सुनने की शक्ति’ भी उसमें अंतर्भूत है, यह वे स्पष्ट करते हैं। 

 

हमारी श्रवणशक्ति की रक्षा करनेवाले श्रीराम के लिए, ‘विश्वामित्र को प्रिय रहनेवाले श्रीराम’ इस विशेषण का प्रयोग क्यों किया गया है, यह समझने के लिए सर्वप्रथम सद्गुरु बापू विश्वामित्रजी की जानकारी बताकर उनकी महानता से परिचित कराते है। विश्वामित्र ही बुधकौशिक ऋषि हैं, यह सद्गुरु बापूजी ने पहले के रामरक्षा प्रवचनों में स्पष्ट किया ही है।

 

‘विश्वामित्र’ यानी ‘विश्व का मित्र’ ऐसा सीधासरल अर्थ कई लोग निकालते हैं। लेकिन ‘विश्वामित्र’ शब्द को अगर व्याकरण के सही नियमों के अनुसार तोड़ा जाए, तो वह ‘विश्व+मित्र’ न होकर ‘विश्व+अमित्र’ होगा; यानी ‘विश्व का अमित्र’ ऐसा उसका अर्थ होगा, यह सद्गुरु बापूजी समझाकर बताते हैं। ‘अमित्र’ मतलब ‘जो मित्र नहीं वो’, यानी इसका मतलब ‘शत्रु’ है क्या, ऐसा हमें लगता है। लेकिन वैसा न होकर इस ‘अमित्र’ शब्द में कितना गहरा अर्थ भरा है और वह कैसे हमारे जीवन से जुड़ा है, यह वे समझाकर बताते हैं और इस पक्ति का श्रवणभक्ति के साथ क्या संबंध है, यह भी वे स्पष्ट करते हैं।

 

नवविधा भक्ति में होनेवाला श्रवणभक्ति का अनन्यसाधारण महत्त्व अधोरेखांकित करते समय सद्गुरु अनिरुद्ध बापूजी इस रहस्य को भी यहाँ उजागर करते हैं कि प्रभु श्रीराम जब मानवी अवतार लेकर आते हैं, तब स्वयं भी नवविधा भक्ति का पालन कैसे करते हैं, और उसकी शुरुआत वे श्रवणभक्ति से कैसे करते हैं।