भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 20

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दुल्हेराव को हमारे लोगों द्वारा कब्जे में लिये जाते ही काशीबाई और सुंदरबाई ये दोनों, ‘वहाँ पर उपस्थित किसी की भी समझ में न आयें’ इस तरह से अपने अपने घोड़े के साथ वहाँ से निकल चुकी थीं और रामदीन वाल्मीकि द्वारा दिये गये नक्शे के अनुसार, जंगल के एक मुश्किल रास्ते से स्मिथ की छावनी की दिशा में रवाना हो चुकी थीं।
स्मिथ की छावनी के पास पहुँचने का यह एक ही रास्ता उन्हें जल्द से जल्द वहाँ लेकर जा सकता था। काशीबाई ने इस रास्ते के बारे में, पहले शिकार करनेवाले और उस जंगल में आने-जानेवाले गाँव के कुछ वृद्ध लोगों से पता कर लिया था और वह भी उन वृद्ध लोगों से उनके द्वारा की गयी शिकार की बहादुरी की कथाएँ सुनने के लिए उन्हें महुए की शराब पिलाकर। यह शराब पिलाने काम और उन्हें बातें करने के लिए प्रवृत्त करने का काम लालाभाऊ बक्षी करते थे और उनसे पहले यह काम सरदार मंजुनाथ पहाडी करते थे।
इस कारण सरदार मंजुनाथ पहाडी, लालाभाऊ बक्षी ये दोनों तुरंत जान चुके थे कि काशीबाई और सुंदरबाई कहाँ गयी होगीं। लेकिन बाह्यत: वे दोनों शांत ही रहे। क्योंकि काशीबाई ने उन दोनों से कुछ भी छिपाया नहीं था और इस कारण वे दोनों भी अच्छी तरह जानते थे कि स्मिथ की छावनी पर बड़ा जमाव लेकर हमला करना असंभव है।
ब्रिगेडियर स्मिथ अत्यधिक चालाक और षड्यंत्रकारी था। उसने अपनी छावनी रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु के बाद पास ही के ऐसे स्थान पर स्थानान्तरित की थी कि वह वास्तव में बहुत सुरक्षित रह सकता था। यह स्थान चार पहाड़ों के बीचोंबीच रहनेवाली एक छोटी सी घाटी थी और उसकी छावनी के चारों तरफ़ रात-दिन पचास पचास सैनिक गश्त लगाते रहते थे। गश्त लगानेवाले उस हर एक सैनिक के पास रायफल भी होती थी और उनके मुखिया के यानी कोतवाल के पास दूरबीन भी होती थी। रात के समय भी कोई पहाड़ उतरकर न आयें, इसलिए यह व्यवस्था की गयी थी।
काशीबाई ने इसके पीछे रहनेवाले कारण खोज लिये थे और वह भी दुल्हेराव के गाँव का एक मनुष्य, जो रोज सुबह स्मिथ की छावनी में विभिन्न जीवन-आवश्यक चीज़ें लेकर जाता था, उसकी पत्नी से। यह मनुष्य दुल्हेराव का सब से भरोसेमंद और करीबी साथी था और स्मिथ ने जब रानी लक्ष्मीबाई पर हमला किया, तब यह उसके साथ ही था और इसी ने बादल अश्व (घोड़े) के पैरों में गोली मारने की तरकीब स्मिथ को सुझायी थी और इस कारण स्मिथ के लिए यह दुल्हेराव से भी ज़्यादा करीबी बन गया था।
गाँव की महिलाओं और वृद्ध लोगों से बातें करते करते काशीबाई को यह जानकारी मिली थी कि दुल्हेराव ने इस ‘शंभुराव’ को इसी कारण दूर किया है और शंभुराव और दुल्हेराव में एक मूक प्रतियोगिता आरंभ हुई है।
काशीबाई ने शंभुराव की पत्नी से बातें कर-करके सारी जानकारी इकट्ठा कर ली थी।
इन दोनों के घोड़ों के साथ ही एक तीसरा घोड़ा भी उनके पीछे पीछे चल रहा था और उस घोड़े पर मुँह और हाथ-पैर बाँधकर रखा गया शंभुराव था। उसकी बलि स्मिथ के सामने ही चढ़ानी थी।
दोनों कार्यों के लिए पूर्णिमा की रात जानबूझकर ही चुनी गयी थी। क्योंकि रात का फायदा भी मिल सकें और पूर्णिमा की रात में रहनेवाली चाँद की रोशनी में ये सज़ाएँ सब को दिखायी दें इसलिए।
दिन के समय यह काम करने में एक ख़तरा था कि उस संबंधित स्थान से फिर से निकल जाना संभव नहीं हो सकता था और यदि और कुछ दिनों तक राह देखते तो कोई ना कोई गद्दार इन लोगों की जानकारी कंपनी सरकारको दे ही देता और वैसा होना उचित नहीं होता।
बिलकुल भोर होने के थोड़े ही समय पहले ये दोनों स्मिथ की छावनी से बिलकुल सटकर रहनेवाले, दर असल छावनी का मानो प्रवेशद्वार ही रहनेवाले दर्रे में जा पहुँचीं। (दर्रा यानी दो पहाड़ियों के बीच रहनेवाला सँकरा रास्ता।) वहाँ पहुँच जाते ही काशीबाई ने, शंभुराव से ही हस्तगत की हुई दूरबीन बाहर निकाली और गश्त लगानेवाले सैनिक, ठीक उस दर्रे के सामने आते ही घोड़ों को भगाते हुए और रायफलें चलाते हुए उन्होंने दर्रा उतरना शुरू किया।
दोनों का निशाना अचूक था और ज़िद और प्रतिशोध की भावना अत्यधिक तीव्र थी। उन दोनों के सीने में सुलग रही स्वतंत्रता युद्ध की ज्योति उन दोनों को बल दे रही थी और रानी लक्ष्मीबाई के आख़िरी पलों की याद इन दोनों के मस्तक और हृदय में असीम धैर्य एवं शौर्य उत्पन्न कर रही थी।
दर्रा उतरने तक के ही समय में गश्त लगानेवाले सभी के सभी 50 सैनिकों को मार गिराया गया था। क्योंकि उन दोनों के पीछे पीछे आये हुए सरदार मंजुनाथ पहाडी और लालाभाऊ बक्षी के पास भी रायफलें थीं ही।
उन दोनों ने घोड़े के पाँव के सबसे निचले हिस्से से ज़मीन पर बने निशानों से पता लगाते हुए प्रवास किया था और ऐन वक़्त पर वहाँ आ पहुँचे थे।
इन चारों ने मिलकर स्मिथ की छावनी पर ठेंठ हमला किया। स्मिथ के सभी सैनिक गहरी नींद से हड़बड़ाकर जाग गये थे। परन्तु उनके कपड़े पहनकर और हथियार उठाकर तंबू से बाहर आने से पहले ही ये चारों, स्मिथ के तंबू के चारों रक्षकों को मारकर, एक वेश्या के साथ सोये हुए स्मिथ के पैरों को पकड़कर उसे घसीटते हुए बाहर ले आये थे और उसकी आँखों के सामने ही शंभुराव की गर्दन उड़ा दी थी।
सरदार मंजुनाथ पहाडी ने अपनी पहाड़ी आवाज़ में स्मिथ के सभी सैनिकों को सूचना दी कि ‘कोई भी यदि दु:साहस करेगा तो आसपास के पहाड़ों में छिपे हुए हमारे चार सौ सैनिक तुम्हें गोलियों से भुन डालेंगे। हमें केवल ब्रिगेडियर स्मिथ चाहिए। दूसरे किसी को भी हम कोई हानि नहीं पहुँचायेंगे।’
इस कारण वे सभी सैनिक चुप ही रहे। कोई भी किसी भी प्रकार की गतिविधि करने की मन:स्थिति में नहीं था।
काशीबाई ने ही ब्रिगेडियर स्मिथ की टाँग में रस्सी बाँधी थी। स्मिथ मदद के लिए पुकार रहा था। लेकिन बिलकुल भी न रुकते हुए वे बाकी तीनों, अपने घोड़ों के पैरों के निचले हिस्से के नीचे स्मिथ को अक्षरश: रौंद रहे थे।
हर एक घोड़े की हर एक लात के साथ स्मिथ की चींख इन चारों को भी अधिक बल दे रही थी।
सरदार मंजुनाथ पहाडी ने ब्रिगेडियर स्मिथ को भाले से चुभा-चुभा कर एक पेड़ के सहारे खड़ा कर दिया।
काशीबाई ने भी घोड़े से उतरकर अपने हाथों से स्मिथ को, उनके पास रहनेवाली रस्सी से उस पेड़ से कसकर बाँधकर रखा।
उनके पीछे पीछे घोड़े से नीचे उतरी सुंदरबाई ने स्मिथ के दोनों पैरों में, हर एक पैर में चार-चार इस तरह गोलियाँ मारीं और मारी गयी हर एक गोली के साथ ‘जय रानी लक्ष्मीबाई! जय बादल!’ इस तरह ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थीं और इन तीनों ने भी उनका साथ दिया था।
सबसे अन्त में घोड़े से नीचे उतरे लालाभाऊ बक्षी ने स्मिथ के हर एक हाथ में चार-चार गोलियाँ मारीं।
हमारे ये लोग स्मिथ को जान से मारना नहीं चाहते थे। उसे आसान मौत नहीं देनी थी। उसकी दुर्गति होकर उसका मर जाना पूरी ब्रिटीश सेना को और भारतीय गद्दारों को पता चलना आवश्यक था।
इस कारण वे चारों फिर से घोड़े पर चढ़ गये और काशीबाई ने स्मिथ की पीठ पर तलवार से एक गहरा ज़ख्म कर दिया, जैसा ज़ख्म रानी लक्ष्मीबाई की पीठ पर हुआ था, वैसा ही।
उन चारों को भी बहुत शांति महसूस हो रही थी और उन चारों की आँखों के सामने सर्वत्र रानी लक्ष्मीबाई दिखायी दे रही थीं।
ये चारों लौटने ही वाले थे कि तभी एक ब्रिटीश सैनिक ने चिल्लाकर कहा, “मैंने पड़ताल कर ली है कि आसपास के पहाड़ों पर कोई भी नहीं है”
और इसी के साथ उन सभी सैनिकों की रायफलें एक ही समय पर गोलियों की बौछार करने लगीं। इन चारों ने पूरे शरीर में प्रविष्ट हो चुकीं रायफलों की गोलियों के कारण जैसे तैसे पुन: जंगल में प्रवेश किया और ज़ोरदार कोशिश करके घोड़े पर से विरुद्ध दिशा में जाने लगे।
लगभग एक घंटे बाद उनकी मुलाक़ात, उन्हीं को खोजते हुए आ रहे हमारे अन्य लमाणों के साथ हुई और उन सभी को ‘क्या हुआ’ यह बताते बताते ही उन चारों ने भी एक-एक करके प्राण त्याग दिये। स्मिथ की सेना इनके पीछे आयी ही नहीं थी। स्मिथ के सैनिक स्मिथ की जान बचाने के पीछे पड़े हुए थे और उन्हें इनके पीछे पड़ना ही नहीं था। क्योंकि हमले का आदेश देनेवाले उस ब्रिटीश सैनिक ने सुस्पष्ट रूप से सबसे इस समय कहा था कि ‘पहाड़ पर सैनिक नहीं हैं, ऐसा मैंने केवल सरासर झूठ कहा है। हम हमारी और स्मिथ की सुरक्षा के बारे में देखते हैं।’
हमारे सभी लमाणों ने इन चारों के भी मृत शरीर लेकर जंगल के ही एक दूसरे रास्ते से एक अलग ही घाटी में प्रवेश किया, जहाँ घने पेड़ थे।
उन चारों के अंतिम संस्कार करते समय किसी की भी आँखों के आँसू थम नहीं रहे थे। मोतीबाई और गंगाबाई इन दोनों ने उन चारों का अग्निसंस्कार किया। गीता का पठन करने इस समय रामचंद्रराव नहीं थे।
इसके बाद मोतीबाई ने निर्णय लिया और सभी जन छोटे-छोटे गुट बनाकर तात्या टोपे से मिलने रवाना हो गये और रानी लक्ष्मीबाई, मोरोपंत और ये चारों इन छह जनों की अस्थियाँ लेकर मोतीबाई अकेली काशी जाने निकलीं।
(कथा जारी है)
