रामरक्षा प्रवचन २१ - लक्ष्मणमाता सुमित्रा - श्रेयस तथा प्रेयस को चुनने की शक्तिदात्री | Aniruddha Bapu

श्रद्धावान की सकल रक्षा के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होनेवाले रामरक्षा-कवच की एक-एक पंक्ति धीरे से समझाकर बताते हुए सद्गुरु अनिरुद्ध हमें आगे-आगे ले जा रहे हैं। दिनांक ७ अप्रैल २००५ को किये रामरक्षा पर आधारित प्रवचन में, सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ‘मुखं सौमित्रिवत्सल:’ इस रामरक्षा कवच की अगली पंक्ति पर विवेचन कर रहे हैं। ‘सौमित्र’ यानी ‘सुमित्राजी की कोख से जन्मे लक्ष्मण’ यह बताकर ‘सौमित्र से (लक्ष्मण पर) जी-जान से प्रेम करनेवाले श्रीराम मेरे मुख की रक्षा करते हैं’ यह इस पंक्ति का सरलार्थ वे पहले बताते हैं।
सुमित्राजी दरअसल संपूर्ण रामायण में हमें क्वचित् ही दिखती हैं। फिर भी लक्ष्मणजी के लिए यहाँ ‘सौमित्र’ इसी विशेषण का प्रयोग क्यों किया गया है, यह समझने के लिए सद्गुरु बापू पहले सुमित्राजी की जानकारी बताते हैं और उनका हमारे जीवन से कितना गहरा संबंध है, इसे भी उजागर करते हैं।
हमें कई बार जीवन में खेद होता है कि ‘इस फलाना-फलाना प्रसंग में हम दरअसल ‘ना’ कहना चाहते थे, लेकिन हम वह नहीं कर सके। हम हमारी प्राथमिकता ठीक से तय नहीं कर सकते। हम ठीक से चयन नहीं कर पाते।’ इस सटीकता से चयन करने की क्षमता का इन सुमित्राजी से कैसा गहरा संबंध है, यह सद्गुरु अनिरुद्ध यहाँ समझाकर बताते हैं। अन्त में, हमें जीवन में सबकुछ ‘श्रेयस’ (आध्यात्मिक अच्छी बातें) और ‘प्रेयस’ (व्यावहारिक अच्छी बातें) प्राप्त होने में इन सुमित्राजी की भूमिका किस प्रकार अहम है, यह भी वे स्पष्ट करते हैं।