रामरक्षा प्रवचन २० - जीवन का वास्तविक यज्ञ कौनसा है? और क्या अध्यात्म वाक़ई कठिन है? । Aniruddha Bapu

दिनांक ३१ मार्च २००५ को किये रामरक्षा पर आधारित प्रवचन में, सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ‘घ्राणं पातु मखत्राता’ यह रामरक्षा कवच की अगली पंक्ति समझाकर बताते हैं। ‘यज्ञ (मख) की रक्षा करनेवाले श्रीराम मेरे घ्राणेंद्रिय (नाक) की रक्षा करें’ यह इस पंक्ति का सरलार्थ वे पहले बताते हैं।
अब ‘यज्ञ’ और ‘नाक’ इन दोनों के बीच क्या संबंध हो सकता है, ऐसा विचार यह सरलार्थ सुनने के बाद मन में आता है। ‘यज्ञ’ कहें तो ऐसे किसी चौकोर में समिधा, गोबर के उपले आदि रखकर प्रज्वलित की अग्नि, उसमें मंत्रोच्चारण के साथ घी, समिधा तथा अन्य हवनद्रव्य अर्पण किये जा रहे हैं, ऐसा दृश्य आँखों के सामने आ जाता है और यह कुछ तो बहुत ही कठिन, जो करने के लिए बहुत सारे प्रयास करने पड़ते हैं, ऐसी बात प्रतीत होती है। लेकिन ऐसा एक यज्ञ है, जो हमारे जीवन के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है और जो हम दरअसल हमारे दैनंदिन जीवन में निरंतर और बिना किसी परिश्रम के करते रहते हैं, मग़र उसकी हमें कल्पना तक नहीं होती है। यह सहज-आसान, लेकिन अत्यंत प्रभावशाली यज्ञ कौनसा है, इस रहस्य को सद्गुरु अनिरुद्ध यहाँ उजागर करते हैं और उस अनुषंग से - ‘अध्यात्म यह ज़रा भी कठिन नहीं है, हम बस्स् ग़लत संकल्पनाओं को मन में पकड़कर उस आसान अध्यात्म को ख़्वामख़्वाह कठिन बनाकर रखते हैं’ इसका एहसास वे हमें करा देते हैं।
प्रभु श्रीराम हर एक के जीवन में होते ही हैं, लेकिन वे किस रूप में रहते हैं, यह सद्गुरु अनिरुद्ध यहाँ, भोर के ब्राह्ममुहुर्त का तथा संध्यासमय का सुंदर उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं।
ऐसा जो यज्ञ हमारे जीवन में अव्याहत रूप से चालू रहता है, उसकी रक्षा ये श्रीराम कैसे करते हैं यह बताते समय, इस यज्ञ का भक्ति में अधिक से अधिक फ़ायदा कैसे उठा सकते हैं, इस बारे में मार्गदर्शन भी सद्गुरु अनिरुद्ध बापू यहाँ करते हैं।