भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनकहे इतिहास के कुछ पहलू - भाग 31

लोकमान्य तिलकजी के देहान्त का समाचार अक्षरश: वायु की गति से पूरे भारत में फैल गया। सन 1920 में दूरसंपर्क के साधन बहुत ही कम थे और इसके बावजूद भी अपने प्यारे नेता के देहान्त का समाचार भारत के कोने-कोने में बसे भारतीयों को केवल दो घंटों में मिल चुका था।
तिलकजी के अंतिम दर्शन करने लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गयी। भारत के कोने-कोने से कई नेता और सामान्य भारतीय भी अंत्ययात्रा में सम्मिलित होने के लिए निकल पड़े। परंतु यात्रा करने के लिए उपलब्ध सीमित साधनों (ट्रेन, बसेस, प्लेन्स) के कारण सभी का समय पर आकर पहुँचना संभव ही नहीं था।
एक ब्रिटिश पत्रकार ने दर्ज किये अनुसार वह वर्णन इस प्रकार है - ‘समाचार मुंबई और महाराष्ट्र में सबसे पहले फैल गया और सरदारगृह के बाहर मानो पूरी मुंबई ही इकट्ठा होने लगी। कौन किसे रोकेगा?
भारतीय वंश के कई पुलिस अधिकारियों के लिए भी आँसू और सिसकियाँ रोकना मुश्किल हो गया था। उस भीड़ में उपस्थित हर एक स्त्री-पुरुष रो रहा था, लोकमान्य तिलकजी के नाम का जयकार कर रहा था और शरीर की पूरी ताकत लगाकर दर्शन करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था।

भारी भीड़ के कारण दर्शन रोकने का निर्णय लिया गया, परंतु ‘उस दिन’ सामान्य भारतीय नागरिक भी ब्रिटिश कॉन्स्टेबल्स को ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश वंश के बड़े-बड़े ओहदों पर रहनेवाले पुलिस ऑफिसर्स की बात तक बिलकुल भी नहीं मान रहा था।
दर्शन रोक दिया जाने के कारण आहत हुई भारतीय जनता का गुस्सा और प्रचंड क्रोध इनकी तेज़ आँच ब्रिटिश ऑफिसर्स को सहनी पड़ रही थी।
मुंबई प्रांत के गव्हर्नर ने व्हाईसरॉय से संपर्क किया और सारी जानकारी दी। ब्रिटिश समझ चुके थे कि अंतिम दर्शन करने से और अंत्ययात्रा में शामिल होने से एक भी भारतीय को यदि रोका गया तो भारी दंगे भड़क उठेंगे और इस प्रचंड गुस्सायी बड़े जनसमूह के सामने ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश ऑफिसर्स और ब्रिटिश सैनिक भी कमज़ोर पड़ जायेंगे और यदि गोलीबारी की, तो पूरे भारत भर में ब्रिटिशों को ‘घोर संकट’ की स्थिति का सामना करना पड़ सकता था। उन्हें मुख्य रूप से डर लग रहा था कि ऐसी घटनाओं से भारतीय जनता को अपने सामर्थ्य की अच्छे से पहचान हो जायेगी और इसके दूरगामी परिणाम ‘स्वराज’ की स्थापना में ही होंगे और तिलकजी का प्रकट वचन - ‘स्वराज्य यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और वह मैं अवश्य ही प्राप्त करूँगा’, तिलकजी के निधन के कारण जल्द से जल्द सच होगा और इस कारण कपटी एवं धूर्त स्वभाव वाली ब्रिटिश सरकार ने अचानक अपनी भूमिका बदल दी और भारतीय नेताओं और समाज में जिससे क्रोध उत्पन्न हो जाये, ऐसी बात बिलकुल भी न करने के आदेश ऊपर से लेकर नीचे तक दिये गये।
ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर्स और सार्जंट्स्, तिलकजी के अंतिम दर्शन करने में और अंत्ययात्रा के दौरान जनता की सहायता कर रहे दिखायी दिये। उसमें प्रेम, अपनापन और सम्मान नहीं था, बल्कि भविष्य की चिंता थी। यह एक भारी कपटी चाल थी।
लोकमान्य तिलकजी के अंतिम दर्शन करने बड़े-बड़े दिग्गज नेता, समाज सुधारक, पत्रकार, लेखक, वकील, उद्योगपति इनका ताँता लगा रहा।

मुंबई के गुजराती और मारवाड़ी समाज ने तो लोगों की सुविधा के लिए जगह-जगह पीने के पानी और नींबू-शर्बत का प्रबंध किया।
अनेक धनिकों ने, कतार में घंटों खड़े रहे लोगों के लिए पानी, दूध और केलों का प्रबंध किया और मुख्य बात यह थी कि इनमें से कोई भी धनिक व्यक्ति, समाज या संस्था अपने बोर्ड लगाकर शान नहीं दिखा रहे थे।
उस भीड़ में उपस्थित मराठी, गुजराती, मारवाड़ी, उत्तर प्रदेशी, बंगाली, कन्नड, तेलगु, सिख ऐसे विभिन्न भारतीयों की भीड़ देखकर, उन-उन समाजों के जनसमूह की फोटोज़ ब्रिटिश पुलीस ने खींचीं और व्हाईसरॉय को तुरंत भेज दीं।`
लोकमान्य तिलकजी का मृतदेह उनके समर्थकों के लिए कोई साधारण मृत शरीर बिलकुल भी नहीं था। उनके लिए वह लोकमान्यजी की संजीवन समाधि थी। दिव्य योगारूढ़ अवस्था थी, कर्मयोग की अंतिम स्थिति थी और इस कारण तिलकजी के देह को पद्मासन में बिठाया गया था।
न. चिं. केलकरजी ने सुस्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘मंडाले जैसी भीषण जेल में भी ब्रिटिशों के सामने कभी भी न झुके हुए लोकमान्यजी के मृतदेह को भी लेटी हुई स्थिति में नहीं रखा जायेगा।’
भारी भीड़ होने के बावजूद भी अंत्ययात्रा शांति से आरंभ हुई। जगह-जगह, चौकों-चौराहों पर तिलकजी पर पुष्पवर्षा की जा रही थी। सभी सार्वजनिक गणेशोत्सवों के कार्यकर्ता बहुत बड़ी मालाएँ लेकर जगह-जगह खड़े थे। तिलकजी द्वारा स्थापित ‘छत्रपति शिवाजी महाराज कमिटी’ के दमदार कार्यकर्ता (व्हॉलेंटियर्स) अनेक सड़कों पर ब्रिटिशों के विरोध में खुलेआम नारे लगा रहे थे और यह विशेष खबर भी गव्हर्नर ने व्हाईसरॉय को और ब्रिटन की पार्लमेंट को तुरंत दे दी
और तिलकजी की अंत्ययात्रा में शामिल हुए महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना शौकत अली इन नरम दल के नेताओं को अंत्ययात्रा में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया और ‘उनके नेतृत्व में ही अंत्ययात्रा चल रही है’ ऐसा जनता को दिखाया गया और इस एक बात के कारण गांधीजी का महत्त्व सामान्य प्रजा को बहुत बड़ा लगने लगा।
अंत्ययात्रा में शामिल होनेवालों में महिलाओं का प्रमाण भी बहुत अधिक था। उस समय घर में ही रहनेवाली महिलाएँ आज महज़ घर से बाहर नहीं निकली थीं, बल्कि अंत्ययात्रा में शामिल भी हुई थीं, नारे भी लगा रही थीं और अंतिम संस्कार के समय भी उपस्थित रही थीं। यहाँ तक कि बाल मुंडवाई हुई बेवा महिलाएँ भी सभी नियमों को ठुकराकर इन महान युगपुरुष की अंत्ययात्रा में शामिल हुई थीं।
यह पूरा चित्र ब्रिटिश राजसत्ता को दहला देने वाला था। तिलकजी की अंत्ययात्रा भारतीयों को अधिक सशक्त, बलवान एवं निर्भय बनाती रहने वाली थी और इसी बात का डर ब्रिटिशों को अधिक लगने लगा।
तिलकजी के निधन की खबर से खुश हो चुकी ब्रिटिश गव्हर्न्मेंट अंत्ययात्रा के वर्णनों के कारण ज़बरदस्त सावधान हो गयी।

व्हाईसरॉय ने तुरंत संदेश भेज दिया कि - ‘सभी प्रजाजनों के लिए सुविधाजनक हो, इस कारण, सभी नियमों को बाजू में रखकर लोकमान्य तिलकजी के अंतिम संस्कार गिरगाँव की शानदार चौपाटी पर होने चाहिए।’ (उस समय की गिरगाँव चौपाटी कई एकर्स की थी।)
‘लोकमान्यजी की चिता साधारण लकड़ियों से बनी होनी ही नहीं चाहिए’ ऐसा निर्णय सच्चे भारतीय होनेवाले उद्योगपति-वर्ग द्वारा लिया गया और लोकमान्यजी की चिता पूर्ण रूप से चंदन की लकड़ियों से बनायी गयी।
परंतु एक अजीब एवं विलक्षण बात घटित हुई। अंत्ययात्रा में शामिल हुए कई लोग अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार चंदन की लकड़ी के टुकडे ले आये थे और उनके बड़े-बड़े ढेर तैयार हो गये थे।
जिस पारसी समाज के पास चंदन का व्यापार था, उस समाज के प्रमुखों ने बैलगाड़ियाँ भरकर चंदन अर्पण किया।
सनातन वैदिक धर्म पर प्रखर गर्व करनेवाले और उसके लिए ज़रूरत पड़ जाने पर आक्रामक भी बननेवाले लोकमान्य तिलकजी की अंत्ययात्रा को हर एक बड़े मंदिर के सामने रुकना ही पड़ा; क्योंकि वहाँ का पुजारी समाज और उपाध्याय वर्ग सभी शास्त्रों को दूर रखकर बड़ी-बड़ी मालाएँ लेकर तिलकजी के चरणों की पूजा कर रहे थे।

कई दरगाहों ने तिलकजी के मृतदेह पर फूल बरसाये और पाठ किया। ब्रिटिश गव्हर्नर के अनुमान के अनुसार चार लाख पुरुष और एक लाख महिलाएँ उस अंत्ययात्रा में शामिल हुई थीं और इनमें से हर एक जन ‘लोकमान्य तिलकजी अमर रहें, ब्रिटिश राज मुर्दाबाद, लाला लजपतरायजी ज़िंदाबाद’ ऐसे नारे लगा रहा था।
‘तिलकजी की तरह ही आक्रामक स्वभाव वाले लाला लजपतरायजी के पास यदि नेतृत्व चला जायेगा, तो तिलकजी के गरम दल और क्रांतिकारियों की विजय हो जायेगी’ ऐसा अभिप्राय व्हाईसरॉय ने व्यक्त किया और लाला लजपतरायजी को लोगों की नज़रों से दूर रखते हुए, तिलकजी के तीखे विचारों का प्रभाव कम करने के लिए ब्रिटिशपरस्त (ब्रिटिशों की चापलूसी करनेवाले) जवाहरलाल नेहरू को साथ लिया गया और गांधीजी को आगे लाने का निर्णय हुआ; क्योंकि पहले विश्वयुद्ध के समय तिलकजी ने सेना भर्ती का विरोध किया था, जब कि गांधीजी ने समर्थन दिया था। तिलकजी की चिता लगातार सात दिन जल रही थी, क्योंकि भारत के विभिन्न प्रांतों से लोग आ ही रहे थे और चंदन अर्पण किया जा रहा था।
आनेवाले समय में गांधीजी का नेतृत्व स्थापित हुआ, परंतु उसकी शक्ति तिलकजी के श्रमों से ही निर्माण हुई थी।
(कथा जारी है)
