हमें एकदंत की शरण में जाना चाहिए (We must surrender to Ekadanta) - Aniruddha Bapu
परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने २८ एप्रिल २०१६ के पितृवचनम् में ‘हमें एकदंत की शरण में जाना चाहिए', इस बारे में बताया।
हमें ये जानना चाहिये कि भगवान अपने वचन को कभी नहीं तोडता, एक इन्सान अपने वचन को तोडता रहता है, और इसीलिये उसके जीवन में हमेशा ये युद्ध रहता है। जब तक उसने भगवान को जो वचन दिया है, उस वचन के अनुसार वो अपनी जिंदगी में कोशिश करता रहता है, पूरा का पूरा यशस्वी ना हो, हम ऐसा नहीं सोचें कि भगवान हमारे सामने खडे हैं और हम से वचन माँग रहे हैं, लेकिन जो वचन हम उसे देते हैं, उसका पालन करने की कोशिश तो करो।
समझो आप खुद भी बोलते हैं, मंदिर में जाकर कि घर में शांति नही है, हमे शांती चाहिये तो मैं हर रोज आपका स्तोत्र पाँच बार पठन करुँगा, हमारे घर में सिर्फ शांति लाना। मन्नत की बात नही कर रहा हुँ। तो घर में शांति हो गई है, एक साल ये करने के बाद अब शांति आ गई तो, मराठी में एक अच्छी proverb है, गरज सरो वैद्य मरो। After you get cured, let the doctor die. हम लोग ठीक है तो डॉकटर को मरने दो। ये ही हमारे चलता है। जिस दिन घर में शांति होगी, दूसरे दिन हम लोग भूल जाते है कि भगवान का स्तोत्र बोलना था। भगवान अशांति नही लाता। लेकिन हम सामर्थ्यहीन रहते हैं।
मनुष्य के पास, हमारी औकात ही क्या होती है भगवान के सामने। इतने सारे जो कलियुग में हम लोग जी रहे हैं। हमारे पास बहोत सारी ताकद होगी, भगवान की होगी तो हमें जानना चाहिये अपने जीवन में भगवान के साथ संघर्ष में रहो, युद्ध में नही। भगवान का वचन निभाना ये विकास का मार्ग है। भगवान को दिया वचन तोडते रहना ये युद्ध का विनाशत्व का मार्ग है।
और इसलिये ये जो ‘लं बीज’ है, अभी हम चारों बीज देखने के बाद ‘लं बीज’ पर आ रहे है। ये ‘लं बीज’ basically मुल बीज है। हमारी पूरी कि पूरी हर एक पूरे सारे विश्व में जो भी प्रकट है, उन सब का मूल बीज क्या है, ये ‘लं बीज’ है। ये ‘लं बीज’ जो है, ये क्या करता है, हमारा भगवान के साथ जो युद्ध चलता रहता है, उसे खत्म कर देता है। जब हम लोग प्रदक्षिणा करते है ना, ‘ॐ लं’ ‘ॐ वं’ ‘ॐ रं’ याद आयी?
तब ध्यान में रखिये के ये हर समय ॐ लं का उच्चारण हमारा जो भगवान के साथ युद्ध चल रहा है, सदियों से उसे खत्म कर देता है। संघर्ष के लिये हमें ताकद देती है। भगवान के साथ फाईट करने के लिये, भगवान को कोसने के लिये नहीं, दूसरों को तकलीफ देने के लिये नही तो खुद के जिंदगी का वर्धन करने के लिये, उसका विकास उसकी प्रगति करने के लिये, उस एकदंत को हमे शरण जाना है।
हमें एकदंत की शरण में जाना चाहिए, इस बारे में सद्गुरु अनिरुद्ध बापू ने अपने पितृवचनम् में बताया, जो आप इस व्हिडिओ में देख सकते हैं।
॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥