कथामंजिरी ४ - ‘वही’ ही मेरा मार्ग एकमात्र - भाग १-४५ में दी गई प्रार्थना

कथामंजिरी ४ - ‘वही’ ही मेरा मार्ग एकमात्र - भाग १-४५ में दी गई प्रार्थना

गुरुवार, दिनांक २० फ़रवरी २०२५ को हुए प्रवचन में सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध ने बताए अनुसार, मंगलवार, दिनांक १८ फरवरी २०२५ को दैनिक प्रत्यक्ष में प्रकाशित ’कथामंजिरी-४’ के ‘१-४५’ भाग में दी गई प्रार्थना यहाँ दे रहा हूँ।
 

कथामंजिरी ४ - ‘वह’ ही मेरा मार्ग एकमात्र - १-४५

 

काशिनाथराव ने उनकी हमेशा की आदत के अनुसार गले से जपमाला निकालकर उससे मंत्रगजर करना शुरू किया। जब उनका एक माला जाप करके पूरा हो रहा था, उसी समय दूसरों के द्वारा भी किये जा रहे जाप पूरे हो रहे थे। क्योंकि उनमें से हर एक ने मानो घड़ी देखकर ही काशीनाथराव के साथ गजर करना शुरू किया था।

काशीनाथराव ने अपनी जपमाला फिर से अपने गले में पहन ली और दोनों हाथ जोड़कर माथे पर लगाकर स्वयंभगवान को प्रणाम किया और अचानक उनके मन के सारे बाँध टूट गये।

काशीनाथराव भगवान को पुकारते हुए बोलने लगे –

प्रार्थना

‘हे भगवान! हे त्रिविक्रम! यह सब क्या हो रहा है! ऐसा लग रहा है कि घर के छत में अक्षरश: सैंकड़ों छेद हुए हैं और बारिश ज़ोर से हो रही है। किस छेद को पहले बंद करना चाहिए और किस छेद को बाद में?

कैसे भी करें और कुछ भी करें, तब भी सारे छेद बंद करने तक घर पूरी तरह पानी से गीला हो ही जानेवाला है - घर की चीज़ें भी और लोग भी।

हे भगवान! आपके चरणों के सिवा हम भक्तों को भला अन्य कौन सा सहारा और आश्रय है!

हे भगवान! आपका नाम और आपके मंत्रगजर जितना वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ (Superior and Best) ऐसा भला अन्य कौन सा उपाय है!

कहते हैं कि हर एक मनुष्य की हर एक क्षमता की एक मर्यादा होती है। उसी तरह मनुष्य के मन की उड़ान चाहे कितनी भी दूर तक क्यों न हो, मग़र फिर भी जहाँ बुद्धि भी हार जाती है, ऐसे प्रसंगों में मन उड़ान भी कितनी भरेगा और कहाँ तक भरेगा?

हे दीनदयाल! दादासाहब, मेरा और लक्ष्मण भैया का घर, बानुबाई का घर, आनंदीबाई का घर इनके साथ ये डॉक्टर दंपति भी संकट में आ गये हैं

और अहम बात यह है कि हम सभी की समस्याएँ एक-दूसरे के सवालों में उलझी हुई हैं। इस गुत्थी को सुलझाने की शुरुआत करने के लिए, इस गुत्थी का एकाद तो सिरा यानी कुछ तो पता होना आवश्यक है।

हे समर्थ सद्गुरु! आपके सिवा दिशा कौन दिखायेगा! आप ही वास्तविक मार्गदर्शक हैं। कुछ तो कीजिए महाराज!

हे परमकृपालु महाराज! सच में, आपात स्थिति का समय है। इस पल हमारी परीक्षा मत लीजिए, दर असल हम सभी अनुत्तीर्ण (Fail) हुए ही हैं, हम अनुत्तीर्ण हुए हैं, यह जान लीजिए और हमें पास करवाने के लिए आप ही आकर हमारा प्रश्नपत्र (क्वेश्चन पेपर) हल कीजिए।

हे प्रभु रामभद्र! आपके नाम में यह समूचा विश्व समाया हुआ है और आपके मंत्रगजर में भक्तों की सहायता करने के लिए आवश्यक रहनेवाली समस्त यंत्रणाएँ हैं, ऐसा सभी संत कहते आये हैं और मैंने स्वयं इस बात को कई बार अनुभव भी किया है।

फिर आज क्या हो रहा है? हम निश्चित रूप से कहाँ गलती कर रहे हैं अथवा हम गलती कर चुके हैं, इसका भी पता नहीं चल रहा है और इतने बड़े ताकतवर दुश्मन के साथ लड़ने की ताकत हम में नहीं है; दरअसल उस लड़ाई के लिए आवश्यक साधन भी हमारे पास नहीं हैं।

हे सद्गुरुसमर्थ! ऐसे ताकतवर लोगों से लड़ने के लिए हमारा भी उतना ही ताकतवर होना आवश्यक है। हम सब सीधे-सादे लोग हैं। किसी बड़े राजनीतिक नेता या प्रभावशाली अफसर से हमारी जान-पहचान तक नहीं है अथवा हमारे पास बहुत बड़ी संपत्ति भी नहीं है।

उन दुष्टों के पास बंदूकें हैं, पिस्तौलें हैं, देहाती बम हैं। शिंट्या का बंदोबस्त करने के लिए हे सखाराम! आपने ही स्क्रू-ड्रायव्हर्स की आपूर्ति की थी (संदर्भ : कथामंजिरी ४-१-१८) और हमारे पास होनेवाले चाकू भी काफ़ी थे।

उस समय सहायता करनेवाले आप और आज के आप क्या अलग हैं? बिलकुल भी नहीं! आप हमेशा भक्तों पर गर्व करनेवाले ही हैं। (नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी - संत रामदास स्वामीजी। हिंदी अर्थ- अपने दासों पर गर्व करनेवाले श्रीराम कभी भी अपने दासों की उपेक्षा नहीं करते।) फिर यक़ीनन ही हमसे ही कुछ गलत हो रहा होगा अथवा पहले ही कोई बड़ी गलती हो चुकी होगी।

हो सकता है! वैसा भी हो सकता है! परन्तु हे आत्माराम! हमारे हृदय में रहकर सभी खेल करनेवाले आप ही हैं।

जीवन के खेल के, क्रीड़ा के नियम तय करनेवाले भी आप ही हैं, हमें खेल सिखानेवाले अध्यापक भी आप ही हैं और हमें ‘आऊट’ (Out) करार देनेवाले अंपायर भी आप ही हैं।

हे प्रेमसागर! हो सकता है कि सातों सागर सूख जायें, परन्तु आपकी एक बूँद तक कभी समाप्त नहीं होगी, ऐसे आप एकमात्र हैं।

देवाधिदेव! आप ही सागर हैं, आप ही मेघ हैं, आप ही बारिश का पानी हैं, आप ही नदी हैं, आप ही कुआ हैं और अहम बात यह है कि आप ही हमारे हाथ में रहनेवाला पानी से भरा हुआ प्याला हैं - ऐसा अक्षय्य (अविनाशी) प्याला हैं - कभी भी समाप्त न होनेवाला - आपके अक्षय्य तरकश की तरह।

हे हरिहर! समय बिकट है। हमारी कोई ख़ैर नहीं दिखायी दे रही है। आप कमर पर हाथ रखकर हमेशा खड़े होते हैं। लेकिन हम आप तक पहुँच नहीं पाते हैं। आप ही दौड़कर आ जाइए।’