आध्यात्मिक वातावरण से परिपूर्ण बापू का घर (Atul Mahajan)

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- अतुल महाजन (Atul Mahajan)

Atul Mahajan Profile picसन २००३ से बापू के जो कार्यक्रम होते हैं उनमें मैं पुरोहित की सेवा करता हूं। दिसम्बर २००३ से पाठक गुरुजी के साथ मुझे भी बापू के घर पर दत्तयाग की पूजा करने का मौका मिला। जुईनगर में एक कार्यक्रम के दौरान हमें बापूजी की जानकारी मिली थी। तब मैंने और पाठक गुरुजी ने जुईनगर में बापू द्वारा स्थापन किए हुए धर्मचक्र के दर्शन किए। हमारे मन में बापूजी के प्रति विशेष श्रद्धा नहीं थी, मगर वहां पर अध्यात्मिक वातावरण का अहसास होता था। हम कई जगहों पर पुरोहित का कार्य करते हैं मगर इस स्थान पर कुछ अनोखी बात महसूस हो रही थी। इसके बाद ’साई सत्संग रत्न’ नामक मासिक में बापू पर विशेष लेख, पुस्तकें छ्पवाने हेतु मैं और पाठक गुरुजी नवनीत में सुचितदादा से मिलने गए। शाम का वक्त था और हम बाहर बैठे हुए थे। हमारे अगलबगल बैठे हुए लोग अचानक एक ओर सरक गए और कोई धीमी आवाज में बोला कि बापू आ रहे हैं। हमें ऐसी कोई जानकारी नहीं थी। हम केवल इतना ही जानते थे कि एक डॉक्टर हैं जो शर्ट,पैंट पहनते हैं और अध्यात्मिक विशयों पर बोलते हैं।

हम नवनीत के बाहर एक तरफ खडे हुए थे। बापू आशिर्वाद का हाथ उठाते हुए अनेकों के सामने से गुजर रहे थे। वे नवनीत की पहली पायदान चढे और पीछे मुडकर देखा तभी उनकी नजर हम दोनों पर पडी। बापू के देखने पर थोडासा कुछ अनोखा महसूस किया। तब तक हमें अध्यात्म क्या होता है इसकी जानकारी नहीं थी। मंदिर में क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इसके बारे में जरासी जानकारी थी। मंत्र आदि की जानकारी थी मगर मंत्रों के भाव के बारे में जानकारी पाने में रुचि नहीं थी। मगर बापू की उस एक नजर से बहुत परिवर्तन हुआ।

bapu homeउस दिन के बाद सुचितदादा से भेंट होती रही। प्रत्यक्ष बापू से मिलने का अवसर थोडी से मिला। लगभग सन २००१ की गुरुपूर्णिमा को हम ने बापू पर एक अंक प्रकाशित किया। वही अंक बापू को देने के लिए मैं और पाठक गुरुजी बापू के केबिन में गए थे। बापू ने बहुत प्रेम से वह अंक देखा और हम से कहा कि, ऐसे ही काम करते रहो, इन चीजों की जरुरत है। इससे डेढ साल पहले से हम ’साई सत्संग रत्न’ प्रकाशित किया करते थे। एक अध्यात्मिक मासिक चलाते हुए सब चीजें संभालना मुश्किल हो रहा था। फिर बापू ने जो ऊर्जा भरी और जब संस्था से अनुमति प्राप्त की तब हर महीने पंचशील परीक्षा के पेपर, बापू के भक्तों को आए हुए अनुभव जैसी बातें हम प्रकाशित करने लगे। और ऐसे ही एक अंक में यज्ञ के आयोजन के बारे में सारी जानकारी ’साई सत्संग रत्न’ के अंक में दी गई थी। वह जानकारी बापू और सुचितदादा ने पढी और सुचितदादा ने हम से पूछा कि आप पुरोहित का कार्य करते हैं? हम दोनों ने हॉं कहा तो हमें १६ दिसम्बर २००३ को बापू के घर पर दत्तयाग करने का आमंत्रण मिला। उस यज्ञ के लिए पौरससिंह थे और उस यज्ञ में हमारा दिल बेचैन था। हम इतनी पूजाएं करते हैं उन में सत्य-असत्य, सात्विकता पूजा अर्चना करते हुए जो अवडंबर चलते हैं वे अब बापू के समक्ष कैसे कर सकते हैं? क्योंकि हमें पता था कि बापू अत्यंत विज्ञाननिष्ठ हैं, तो हम जो पूजापाठ करते हैं क्या वे उन्हें पसंद आएंगे? ऐसा सबकुछ सोचते हुए ही हम ने यागा आरम्भ किया।

पहले ही दिन आचार्यपद स्वीकारने के बाद, आचार्य जैसा कहेंगे वैसा ही यजमान को करना होता है ऐसी एक समझ है। मगर बापू के घर पर यज्ञ के लिए बैठे हुए यजमान को इसकी पूरी जानकारी दी गई थी कि गुरुजी जैसा कहेंगे वैसा ही करना है। यज्ञ की शुरुआत करते समय बापू और उनका पूरा परिवार यज्ञ के पास इकठ्ठा हो गए और निरीक्षण करने लगे कि पूजा किस तरह से की जा रही है। पूजा के प्रति जिज्ञासा की वजह से प्रत्येक प्रश्न पूछा जा रहा था। यज्ञ के ३ स्टेप्स कौनसे हैं? ऐसे कई प्रश्न पूछे जा रहे थे और यज्ञ के लिए जरुरी सारी की सारी चीजें लाकर जगह पर रखी हुई थीं। पूजा के आवश्यक चीजें पूजा की थाली से लेकर फूलों तक सबकुछ लाकर वहां पर रखा हुआ था। यह देखकर मन थोडासा रिलैक्स हो गया। यज्ञ आरम्भ होने पर नंदामाता खुद प्रत्येक बात सुन रही थी। बीच बीच में उनके मन में जो प्रश्न उठ रहे थे वह पूछ रही थी। तत्पश्चात औक्षण के समय नंदामाता ने खुद आकर औक्षण किया। पुण्यवान किया। ऐसे में दोपहर के सत्र में बापू ने दत्तमालामंत्र का विशेष हवन, विशेष अधिष्ठान करने को कहा। वह भी हो गया। इस यज्ञ के बाद जो एनर्जी मिलनी चाहिए वह वास्तव में हमें यहां मिली।

Atul mahajan article 3पौरोहित्य करने के अनुभव में बापू के पास यज्ञ करने का अनुभव बहुत कुछ सिखा जाता था। अन्य जगहों पर पौरोहित्य करने जाते थे तो यजमान बैठे रहते हैं तब आसपास में शोर होता रहता है। पर बापू के घर का अनुभव ध्यान में लें तो यहां पर अनोखी एनर्जी मिल रही थी। जो अन्य पुरोहित आए हुए थे उन्हें भी इस तरह का यज्ञ देखकर अचरज में पड गए थे। यहां पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति परमात्मा की उपासना कर रहा था। पहले ही दत्तयाग के दूसरे दिन दोपहर के सत्र में सदगुरु के चरणों पर माथा टेकने का अवसर मिला और वह पल बहुत ही अनोखा था। वहां पर उपस्थित सभी पुरोहित नंदामाता-बापू-दादा के चरणस्पर्श ले रहे थे अर्थात हम किसी वैदिक वातावरण का अनुभव कर रहे थे। हम मुंबई में सातवीं मंजिल पर यह यज्ञ कर रहे थे फिर भी हमें ऐसा अनुभव हो रहा था कि हम किसी जंगल में एक आश्रम में यह यज्ञ कर रहे हैं।

उस आश्रम में पुरोहितों का आदरातिथ्य किसी श्रेष्ठ ऋषि द्वारा किया जा रहा है ऐसे स्वरुप की हमारी भावना थी। समय समय पर बापू ने कई यज्ञों पर हमारा मार्गदर्शन किया। किस तरह के बदलाव करने हैं यह भी सुझाया। हम जो पूजाएं कर रहे थे उनके भाव और अर्थ भी बापू ने हमें समझाए। बापू ने हमें यह भी समझाया कि, ६४ योगियों की स्थापना कैसे की जाती है, मुख्य पीठ क्या होता है? मुख्यत: यज्ञ्पुरुष संकल्पना क्या है?

क्योंकि इससे पहले कई दिनों का यज्ञ संपन्न हो चुका था, पौरोहित्य किया था, आचार्यपद पाया था मगर बापू के यहां जो यज्ञ होता है उस यज्ञ में वास्तव में यज्ञपुरुष समझ में आया। जो यज्ञसंस्था होती है वह यज्ञ में अर्पण किए हुए हरिद्र्व्य हैं, हवनसामग्री जो होती है वह यज्ञ में पहुंचती है यानी क्या होता है वह हम ने वास्तव में देखा। विभिन्न तरह की स्तुतियों और स्तोत्रों के दौरान सारा परिवार उपस्थित हुआ करता था। वाद्य, शंखनाद सबकुछ हर्ष से किया जाता था। खास तौर पर माता की पूजा के दौरान नंदामाता खुद देवी को साडी, आदि अर्पण किया करती थी। हम देखते थे कि लोग नंदामाता को भक्तिपूर्ण नजरों से देखा करते हैं और नंदामाता भी एक भक्त की तरह बडे प्रेम से बडी मां की पूजा किया करती थी। अन्य लोगों के पास केवल पूजा निपटाने की भावना होती थी वहीं इस स्थान पर हर कोई पूजा का आनंद उठाते हुए दिखाई दिया। आज नौ वर्ष बीत चुके हैं हर वर्ष बापू के घर में होनेवाले दो दत्तयागों पाठक गुरुजी और मैं आचार्यपद पर रहते हैं।

इस दौरान अवधूत चिंतन उत्सव के दौरान हम दोनों से तीन दिनों का सार्वजनिक दत्तयाग कराया गाया। बापू ने स्वयं उनके घर पर गायत्री यंत्र सिद्ध कराया। वह यंत्र सिद्ध कराने हेतु विशेष तरीके से पुरोहितों की जरुरत, उनकी उम्र क्या होनी चाहिए और उनका आचरण कैसा हो, वे क्या क्या खाएं ऐसी कई बातों पर बारीकी से गौर करके यंत्र की सिद्धता कराई। यंत्र पंचधातु का हो या सोने का हो या तांबे का हो इस बात के लिए मीटिंग बुलाकर बापू ने सबको अच्छी तरह से समझाया। और सबकुछ अच्छी तरह से कराने के पश्चात वह गायत्री मंत्र सिद्ध हुआ। इस सिद्धी के दौरान विभिन्न तीर्थक्षेत्रों से जल यहां पर मंगवाया गया। उस तीर्थ के ब्राह्मणों को यहां पर बुलाया गया और उस यंत्र को सिद्ध करके बापू के सुपूर्द किया गया।

उचित समय बाद थ्री-डायमेन्शन के श्रीयंत्र की स्थापना कराई गई। यह श्रीयंत्र लगभग ६५ किलो वजन का है। इस श्रीयंत्र की स्थापना से पहले कम से कम १६-१७ मीटिंग बापू के साथ हुईं। उन में छोटी से छोटी चीजें किस तरीके से करने से श्रीयंत्र परफेक्ट बनेगा। बापू ने यह जिम्मेदारी हमें सौंपी थी और उन्होंने वह हम से करा लिया। यंत्र की स्थापना के बाद बापू ने हमें बताया कि इस स्वरूप के यंत्र आद्याचार्य गुरु शंकराचार्यजी ने जो चार आश्रम स्थापन किए थे उन में से द्वारका के आश्रम में ऐसा श्रीयंत्र है।

बापू को इस श्रीयंत्री की पहले से ही जानकारी थी कि वह किस प्रकार का है? फिर हम एक बार द्वारका गए थे और वहां पर श्रीयंत्र देखने का मौका मिला। द्वारका का श्रीयंत्र और यहां पर बनाए हुए श्रीयंत्र में रत्तीभर भी फर्क नहीं था। बिना देखे बापू ने उसी तरह बनवा लिया और उसकी सिद्धता अच्छी तरह सोलह ब्राह्मणों से कराई।

FI - moolark ganeshमांदार गणेश की पूजा और स्थापना कराई। उस वक्त बापू ने हम पर दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी थी। गुरुक्षत्रम में मांदार गणेश की जो स्थापना हुई है उस गणपती की प्रतिष्ठापना की सारी जिम्मेदारी बापू ने मुझ पर और पाठक गुरुजी पर सौंपी थी। मांदार गणेश क्या होता है? कैसा होता है? सबकुछ सुना था। रूई का पेड जब २१ साल का हो जाता है तब उसकी जडों से उत्पन्न होनेवाला गणपती ही मांदार गणेश है। यह गणपती स्वयंसिद्ध होता है। यह मूर्ति जमीन से कैसे निकाली जाती है इसकी कोई जानकारी नहीं थी। बापू से चर्चा करके यह जानकारी खोजी गई। सन २०१२ के पौष महीने की संकष्टी चतुर्थी के बाद गुरुवार के दिन यह मूर्ति जमीन से निकाली गई। तत्पश्चात निरंतर ११ महीने विभिन्न प्रकार के अधिष्ठान करके चंदन के अष्टगंध में रखकर, तेल, घी में रखकर मूर्ति सिद्ध की गई। हम पुरोहित होने की वजह से बापू ने हम से पूछा कि इस मूर्ति को सिद्ध करते समय किस तरह के मंत्रों का पाठ करना है, किस तरह का अनुष्ठान करना है यह? बापू हर कार्य खुले दिल से करते हैं और जब वे हम से कुछ पूछ्ते हैं तो हमारी दी हुई जानकारी की सत्यता/सच्चाई पर गौर करते हैं।

हर वर्ष रामनवमी के दिन हमें बडी मां के दर्शन होता है। यह रेणुकामाता हमारे महाजन परिवार में सदियों से है। हम समझते थे कि वह हमारी ३-४ पीढियों से होगी। मूर्ति का फोटो देखकर बापू ने छोटीमोटी बातें समझाईं। मूर्ति का जो मुख है उस मुख का ऊपरी भाग ढका हुआ होना चाहिए, इसके परिणाम क्या होते हैं और ढका हुअ नहीं होगा ओ उसके परिणाम क्या होते हैं ऐसी सारी जानकारी दी और प्रत्यक्ष बापू ने वह मूर्ति लाई, उसकी सिद्धता की, अभिषेक किया। सबसे पहले सहस्त्राधार अभिषेक में २७ प्रकार के धारापत्र नए बनाए गए थे। यह एक अल्टिमेट बात है। इस तरह का धारापत्र उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में है। और फिर अपने यहां है। दो बरसों से इस माता पर अभिषे किया जा रहा है। नंदामाता ने इस मूर्ति के अभिषेक के लिए खास संदेसा भेजा था। यह मां बहुत दूर से आई है, इसका स्वागत दिल से किया जाना चहिए। नंदामाता ने कहा यह मूर्ति कम से कम तीन दिन हमारे घर पर रहे। तत्पश्चात यह मूर्ति बापू के घर पर रखी गई। और उस देवघर (मंदिर) से मां को फ़िर से हमारे गांव ले जाया गया। तभी बापू ने हम से खुद कहा कि यह जो मूर्ति है वह हमारे (महाजन परिवार) घर में पिछले १५ पीढियों से है और यह कि मेरी १६वी पीढी है। और हमारे घराने में यह विशेषता है कि घर का जो मूल पुरुष (कर्ताहर्ता) होता है उसके घर में बारी बारी से यह मूर्ति सौंपी जाती है। ऐसे करते करते यह मूर्ति मुझ तक आ पहुंची है।

FI - mahadurgeshwarमुझे ऐसी ही श्री महादुर्गेश्वर की स्थापना याद आती है। महादुर्गेश्वर लिंग सर्वप्रथम बापू ने हमारे पास दिया। यह महादुर्गेश्वर लिंग बहुत ही श्रेष्ठ और पवित्र लिंग है। यह कलयुग का आद्य ज्योतिर्लिंग है। यह स्त्रीअंबिकेश्वर है। इसकी पूजा योग्य तरीके से ही होनी चाहिए। और हमेशा बापू के प्रवचन में कार्य की सिद्धी और शुद्धता यह दोनों बातें बताते हैं। मगर वह ज्योतिर्लिंग कम से कम एक महीने तक किसी पुरोहित के पास रखा जाना चाहिए इस उद्देश्य से हमें दिया गया था। हमें समझाया गया था कि इस लिंग की पूजा कैसी की जानी चाहिए। इस तरह पूजा सिद्ध हुई और जिस दिन इसकी स्थापना करनी थी प्रात: साढेतीन बजे ज्योतिर्लिंग हमारे घर से बापू के घर पर लाया गया। बापू और नंदामाता ने ज्योतिर्लिंग का औक्षण किया और जिस स्थान पर इसकी स्थापना करनी थी उस स्थान से मुख्य द्वार तक अर्थात गुरुक्षत्रम के मुख्य द्वार तक समीरदादा, पौरससिंह और स्वप्नीलसिंह इन तीनों को सात बार दंडवत करते हुए आना है और फिर दरशन लेना है ऐसा कहा गया।

वह ज्योतिर्लिंग लाकर उसे हल्दीकुंकुं लगाने के बजाय उसकी जो विधी थी वह विधी अच्छी तरह से करके सात बार दंडवत करके वे तीनों आए। तत्पश्चात धोती और साडियां बिछाकर उस ज्योतिर्लिंग को उसके स्थान पर स्थापन किया गया। जब उस ज्योतिर्लिंग की परिक्रमा करनी थी तब बापू खुद नंगेपांव हमारे समक्ष आए और ज्योतिर्लिंग को स्थापन करने से पहले हर तरफ ढोल-ताशों की गूंज में उसे पूरे हैपी होम के परिसर में परिक्रमा कराई गई।

ज्योतिर्लिंग की स्थापना हो गई। बापू के घर में पौरसिंह और निष्ठावीरा ने नवचण्डि याग का अनुष्ठान किया। उस याग के प्रति जरुरी बातें बापू से पूछकर की जाती रहीं। यह याग किस तरीके से करना है इसकी जानकारी ली जा रही थी। ३-४ दिन पहले ही मीटिंग लेकर इस याग के लिए हर चीज मंगाई जा रही थी। उन मीटिंग्ज में लिस्टिंग की जाती थी। किस तरह की सामग्री मंगवानी है और कैसे मंगवानी है यह उद्देश्य हुआ करता था। नंदामाता ने एक बार कहा भी कि हमारा यही उद्देश्य है कि पूजा के समय सभी बैठकर पूजा का आनंद उठा सकें। अगर कोई चीज रह जाती है तो सभी का ध्यान उसी चीज में लग जाता है। इसलिए लिस्टिंग की जा रही है कि सभी को सामग्री जुटाने का काम बांटा जाए और फिर वे चीजें इकठ्ठी की जाएं ताकि कोई भी सामग्री ढूंढने में समय बरबाद न हो और पूजा में सभी पूरी तरह से शामिल हो सकें। इसी हेतु की वजह से सभी उस पूजा का आनंद उठाते हुए दिखाई दिए।

Atul mahajan article 1देवी की पूजा क्या होती है, सप्तशती का पाठ क्या होता है? जब वह पाठ हो रहा था तब नंदामाता खुद पोथी लेकर बैठी थी। बापू भी सप्तशती के हवन के दौरान खुद आकर बैठे थे। पुरोहित जो पाठ कर रहे थे उसका निरीक्षण किया जा रहा था। पूजा के दौरान हर कोई पूजा की प्रत्येक विधी देख रहा था। पंचोपचार पूजन, षोडषोपचार पूजा क्या होता है? उसके उपचार क्या होते हैं? देवी पर ६१ तरह के उपचार कैसे किए जाते हैं? इन सब बातों की हमें जानकारी मिली। कुल पूजा में कई बारीकियां होती हैं या पूजा में जो अग्नि निर्माण किया जाता है उसे आर्णि कहते हैं। किसी भी पूजा में जो तीन या चार दिनों की होती है तो वहां आर्णि मंथन किया जाता है। लकडी पर लकडी घिसकर अग्नि निर्माण किया जाता है। इस तरह से जब अग्नि निर्माण होता है तब किस तरह से वैदिक मंत्र उत्पन्न होता है इसे वे बारीकी से देख रहे थे। निचली लकडी कौनसी होनी चाहिए और उपरवाली लकडी कौनसी होनी चाहिए, किस तरीके से अग्नि निर्माण होता है, इस अग्नि का क्या मतत्व है, किस तरह से सौभाग्यवती के हाथों वह अग्नि स्थापन होता है नंदामाता भी खुद वहां उपस्थित अपनी सखियों को समझा रही थी। इस यज्ञ की सिद्धता कैसे होती है, यह यज्ञ क्या है इसकी सारी जानकारी नंदामाता सभी महिलाओं को दे रही थी। अन्य जगहों पर हम ने देखा है कि यजमान और वहां उपस्थित अन्य लोगों को पूजा और यज्ञ से कोई सरोकार नहीं होता। किसी ने कहा है, या पंचाग में आदि पढा है इसलिए विधी कराया जाता है। मगर बापू के पास वास्तव में इन विधियों का शास्त्रीय कारण जानने की कोशिश की जाती है। वह विधी श्रेष्ठतम करने के लिए इस में और किन मंत्रों का अनुष्ठान संलग्न किआ जाए इसकी कोशिश रहती है। इससे पहले जो दत्तयाग किए जाते थे उस दत्तयाग में पुरूषसुक्त के एक हजार आवर्तन किए जाते थे। बापू ने साक्षात दत्तमाला मंत्र सिखाया और यह दत्तमाला मंत्र और इसके अनोखेपन की जानकारी हम सब पुरोहितों को दी। इतना ही नहीं बापू ने उन पुरोहितों से दत्तमाला मंत्र याद कराके सिद्ध कराया।

वह मंत्र जपते समय बापू, नंदामाता, दादा से लेकर परिवार के सभी सदस्य एक साथ अनुष्ठान के लिए बैठते हैं। पुरोहित भले ही यज्ञ के लिए बैठे हों फिर भी पास में बैठनेवाले लोगों के मन यज्ञ से जुड जाते हैं। इन लोगों का जो सात्विक भाव होता है वह दिखाई देता है। उपस्थित लोग इस बात का खयाल रखते हैं कि यज्ञ के दौरान किसी का भी मोबाईल नहीं बजता। उस समय कोई भी व्यक्ति घर से बाहर नहीं जाता। अत्यंत शुद्ध भावना से अनुष्ठान किया जाता है। और अनुष्ठान करके योग्य समय पर बापू उपस्थित भक्तों को समझाते हैं। यह वैदिक मंत्र क्या है, मंत्र का अनुष्ठान किसे तरह से किया जाता है। मंत्र का विधान क्या है यह सभी उपस्थित भक्तों को समझाते हैं। पुरोहितों को किन किन नियमों का पालन करना है और उनका भोजन क्या होगा यह सारी व्यवस्था अच्छी तरह से की जाती है।

बापू ने पुरोहित एवं सेवाधारियों के खाने में प्याज और लसण वर्ज्य कराया। उत्सव के वक्त यज्ञ कैसा हो, किस प्रकार के साधन वहां पर होने चाहिएं इन सभी बातों पर बापू का ध्यान रहता। यज्ञ के स्थान पर किस तरीके से किस स्थान पर कौनसी वस्तुएं रखी जाएं इन सभी बातों पर बापू का ध्यान हुआ करता है। इसकी वजह से बापू से कई बातें सीखने को मिलीं। यह सीखते हुए हम ने जाना कि इस क्शेत्र में उनका ग्यान अगाध है। ऐसी कोई बात नहीं है जो बापू नहीं जानते। अनुष्ठान के समय जो मंत्र उच्चारा जाता है। अब ५-५ बरसों तक पुरोहित एक मंत्र का अनुष्ठान करते हैं तब उन्हें एक वेद के जो चालीस अध्याय होते हैं वे केवल उतना ही जानते हैं। परंतु बापू को सभी वेदों के मंत्रों का पता है। अलग अलग वेदों में निपुण पुरोहित जब मंत्र पढते हैं तब बापू भी वे मंत्र जपते हैं। कभी कभी वे उंची आवाज में पढते हैं। जब कभी कोई मंत्र, या मंत्र का उच्चार, स्वर, अनुरोध, आगाध पुरोहित से गलते पढे जाते हैं तब बापू उसे एक तरफ ले जाकर उस मंत्र का उच्चारण समझाते हैं, क्योंकि वैदिक मंत्र मुक्त मंत्र होते हैं। वैदिक मंत्र को किसी भी तरह से बंदिस्त किया हुआ नहीं है, इसलिए वह मंत्र उच्चारते समय उसका उच्चार सही होना चाहिए, उसका पालन सही किया जाना चाहिए इसलिए बापू ध्यान रखते हैं। मंत्र उच्चारते समय वस्त्र किस तरह के हों? गणपती के कुछ मंत्रों के समय विशिष्ट तरीके के लाल रंग का अंतर्भाव होना चाहिए, इसलिए पुरोहित को कौनसे वस्त्र पहनने हैं इसकी सूचना की जाती है या दत्तयाग में पीले वस्त्रों का अंतर्भाव होना चाहिए। इस तरह बापू पुरोहितों को सभी बातें अध्यात्मिक और विज्ञान के आधार पर उसका महत्व समझाते हैं। आप जो कुछ कर रहे हैं उसका फलाना भाव है और उसे विज्ञान का आधार है। अर्थात बापू के यज्ञ में जो पुरोहित एक बार कार्य करते हैं वे सभी पुरोहित अगले साल होनेवाले यज्ञ का बेसब्री से इन्तजार करते हैं। वे चाहते हैं कि अगले साल भी बापू के घर पर गणेश उत्सव के दौरान यज्ञ होगा तब भी मुझे पौरोहित्य का मौका मिले।

हम भले ही पिछले १०-१२ सालों से पौरोहित्य करते आए थे और उनमें कुछ पुरोहित अन्य जगहों से भी होते हैं, जैसे नासिक, पुणे तो कुछ काशी से भी आए होते हैं। वे बापू के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानते, परंतु यज्ञ संपन्न होने पर कुल जो माहौल होता है वह खुशी उन पुरोहितों के चेहरों पर स्पष्ट दिखाई देता है। बापू के पास आके इतना अच्छा यज्ञ करने को मिला, इतना फायदा हुआ कि आज से पहले किसी भी यज्ञ में महसूस नहीं हुआ था। इस तरह के भाव प्रकट होते हैं। साथ ही साथ सदगुरु बापू के चरणों पर माथा टेककर जो शांति मिलती है उसका भी वे अनुभव करते हैं।

अन्य स्थानों पर पौरोहित्य करते समय मिलनेवाला फल और बापू के पास पौरोहित्य का फल कई गुना बडा होता है। अपने घर पर होनेवाली नवचण्डिका याग बिलकुल वैसा ही गुरुक्षेत्रम में बापू ने कराया। बापू के यज्ञ में की जानेवाली प्रार्थना, साधना अपने तक ही सीमित न रहते हुए वह समस्त भारत के हित के लिए होती है। बापू ने स्पष्टरूप से कहा है, पौरोहित्य करते समय पुरोहित जो संकल्प करते हैं उस संकल्प में भारत देश की सीमाओं की सुरक्षा हो, वर्धन हो। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की रक्षा हो।

हम जब अन्य स्थानों पर पौरोहित्य करते हैं तब हम बापू द्वारा कहे गए मंत्रों का और उनका अनुष्टान करने को कहते हैं और वे मंत्र क्यों जपने चाहिएं इसके उदाहरण भी बताते हैं। यज्ञ वापू का बीज है इसलिए जो कोई पुरोहित बापू के पास आता है वह जो कुछ सीखता है उन्हें अन्य लोगों को जाकर बताने की कोशिश करता है। इस तरह से वास्तव में बापू का वृक्ष फ़ैल रहा है।

 ॥ हरि ॐ ॥ ॥ श्रीराम ॥ ॥ अंबज्ञ ॥

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